और भी दुख हैं, जमाने में स्टॉक मार्केट के सिवा...

प्रिय पाठक,

स्टॉक मार्केट 30,000 के आसपास मँडरा रहा है। हमेशा की तरह कुछ पाठकों ने मुझसे फिर वही पुराना सवाल किया हैः “यदि स्टॉक मार्केट अच्छा प्रदर्शन कर रहा है, तो आप देश की अर्थ-व्यवस्था को लेकर नकारात्मक बातें क्यों लिख रहे हैं ? ”

डॉयरी के इस अंक में उसी पुराने यानी दोहराये जानेवाले सवाल का जवाब देने जा रहा हूँ। इस क्रम में बताऊँगा कि देश की अर्थ-व्यवस्था के हालात और स्टॉक मार्केट के बीच बहुत नाजुक संबंध है। कम-से-कम आजकल तो ऐसा ही है। यह आलेख पहली बार 7 अप्रैल 2017 को Vivek Kaul Letter में प्रकाशित हुआ था। Letter को आप इस तरह सब्सक्राइब कर सकते हैं।

पढ़ना सुखदायी रहे ! विवेक

ध्यान दें : आज के आलेख का शीर्षक उर्दू के प्रसिद्ध शायर फैज़ अहमद फैज़ की पंक्तियों से लिया गया है। उन्होंने लिखा थाः “और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा।” जिस समय यह आलेख मैं लिखने बैठा हूँ, सेंसेक्स 30,000 के आसपास मँडरा रहा है। इसी के साथ फिर वहीं पुराना सवाल उठ खड़ा हुआ है: यदि स्टॉक मार्केट अच्छा कर रहा है, तो फिर आप अर्थ-व्यवस्था के बारे में नकारात्मक बातें क्यों लिख रहे हैं? कुछ पाठकों ने यह सवाल किया है। मेरा मानना है कि स्टॉक मार्केट में पैसा लगाने वालों ने सही सवाल किया है। क्योंकि वे स्टॉक मार्केट और अर्थ-व्यवस्था के बीच के अंतर को शायद नहीं समझते हैं।

पाठकों के उपर्युक्त सवाल का जवाब देने से पहले यहाँ दो मूलभूत सवालों का जवाब दे देना जरूरी हैः पहला, क्या स्टॉक मार्केट ‘सचमुच’ में अच्छा प्रदर्शन कर रहा है ? इसे जरा और स्पष्ट करें- यह देखते हुए कि प्रदर्शन का कोई भी पैमाना हमेशा पिछली तारीख पर आधारित होता है, क्या विगत कुछ सालों में स्टॉक मार्केट ने अच्छा प्रदर्शन किया है। दूसरा, और ज्यादा महत्वपूर्ण सवाल कि क्या स्टॉक मार्केट अर्थ-व्यवस्था का प्रतिबिंब होता है यानी क्या स्टॉक मार्केट किसी अर्थ-व्यवस्था का आइना होता है ?

सेंसेक्स रिटर्न पर हम पहले नज़र डालते हैं : 8 जनवरी 2008 और 5 अप्रैल 2017 के बीच सेंसेक्स ने लगभग 43.6 प्रतिशत का कोरा रिटर्न दिया है- मतलब 4 प्रतिशत वार्षिक ( सही ढंग से 3.98 प्रतिशत)। बेशक, इसमें सेंसेक्स के घटक लाभांश की कमाई ( dividend yield ) शामिल नहीं है। इस कारण से आप एक या दो प्रतिशत और जोड़ सकते हैं। लेकिन इससे मेरे निष्कर्ष पर कोई उल्लेखनीय फर्क नहीं आने जा रहा है।

लाभांश की कमाई को जोड़ने के बाद भी देखें तो 2008 के बाद सेंसेक्स रिटर्न नाममात्र रहा है। आप कह सकते हैं कि जनवरी 2008 में सेंसेक्स में आसामान्य रूप से तेजी आयी हुई थी। हाँ, मैं भी मानता हूँ। लेकिन उचित यही होगा कि हम शेयर मार्केट के सबसे तेजी के दौरों के बीच तुलना करें। यहाँ पर मैं बिलकुल वहीं कर रहा हूँ। कुछ भी हो, मेरे कहने का यह मतलब नहीं कि विगत 10 सालों में निवेशकों ने स्टॉक मार्केट से कोई पैसा नहीं बनाया।

लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि स्टॉक मार्केट का प्रदर्शन अच्छा रहा है। पैसा बनाना और स्टॉक मार्केट का अच्छा प्रदर्शन करना, दो बिलकुल भिन्न बातें हैं। इनको समझना बहुत महत्वपूर्ण है।

अब हम दूसरे बिंदु पर आते हैः स्टॉक मार्केट देश की अर्थ-व्यवस्था की स्थिति को प्रतिबिंबित करता है कि नहीं? कुछ साल पहले मैंने Stern School of Business, New York University के प्रोफेसर और इक्विटी वैल्यूएशन के विश्व विख्यात विशेषज्ञ प्रोफेसर अस्वथ दामोदरन से पूछा था कि आर्थिक प्रगति और स्टॉक मार्केट के बीच कितना गहरा रिश्ता है ? उनका यह जवाब था: “ साल-दर-साल इनके बीच रिश्ता कमजोर होता जा रहा है।

ऐसा होने की एक प्रमुख वजह यह थी कि सितंबर 2008 में आर्थिक-मंदी छाने के बाद दुनिया भर में ढेर सारी ईज़ी मनी की भरमार हो गयी थी। यह पैसा घूम-फिर कर दुनिया के स्टॉक-मार्केटों और बॉण्ड-मार्केटों में पहुँच जाता है। भारत का ही उदाहरण लें- जनवरी 2017 के अंत से सेंसेक्स में 8.4 प्रतिशत की तेजी रही है। इस तेजी में सबसे बड़ा योगदान विदेशी संस्थागत निवेशकों ने दिया है; जिन्होंने फरवरी 2017 के आरंभ से भारतीय स्टॉक मार्केट में 40,000 करोड़ रुपये से अधिक का निवेश किया। इसी अवधि में घरेलू संस्थागत निवेशकों ने 3,600 करोड़ रुपये से अधिक के स्टॉकों की बिक्री की।

विगत दो माह के दौरान भारतीय अर्थ-व्यवस्था में किसी भी तरह का आधारभूत बदलाव देखने में नहीं आया है। कम-से-कम घरेलू संस्थागत निवेशक ऐसा ही सोचते लगते हैं। इसी वजह से इन्होंने थोक के भाव स्टॉक की बिक्री की है। लेकिन इसके विपरीत विदेशी पैसों का आना जारी है, खासकर पहले उत्तर प्रदेश में भारतीय जनता पार्टी के जीतने की उम्मीद में। लेकिन जब से भाजपा ने उत्तर प्रदेश का चुनाव जीता है, इन विदेशी संस्थागत निवेशकों के पैसों के आने का सिलसिला जारी है। उनको इस बात की आशा है कि उत्तर प्रदेश का चुनाव जीतने के बाद शायद पार्टी भारतीय संसद के माध्यम से आखिरकार कुछ आर्थिक सुधार लाये।

कुछ हालिया घटनाएं साबित करती हैं कि स्टॉक मार्केट और अर्थ-व्यवस्था के बीच कितना नाजुक संबंध है। हर माह लगभग 10 लाख युवा देश के कामकाजी समूह (कार्यबल) का हिस्सा बन रहे हैं। ऐसे में भारत को सबसे बड़ी जरूरत इस समय नौकरियों की है और ये नौकरियाँ निचली श्रेणी की हों, जो मुख्य रूप से अकुशल भारतीय कामकाजी वर्ग की काम की जरूरत को पूरी कर सकें।

भारत के कामकाजी वर्ग का बड़ी हिस्सा अकुशल श्रेणी का है,क्योंकि भारतीय शिक्षा-प्रणाली में व्यावसायिक-शिक्षा पर कभी जोर नहीं दिया गया। इससे भी बड़ी बात यह रही कि जो लोग पढ़ने के लिए स्कूल गये, वे भी निराश होकर बीच में स्कूल छोड़ दिये।

प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन के माधव चौह्वाण कहते हैं कि वर्ष 2015 तक के पिछले 10 सालों की अवधि में 10 करोड़ बच्चों ने प्राथमिक शिक्षा पूरी की मगर वे न तो ठीक से पढ़ सकते थे और न ही उनको मामूली-सा जोड़-घटाना आता था। ऐसे में अगर भारत में कहीं काम न करने लायक लोगों यानी अकुशल कामकाजी वर्ग की फौज तैयार हो रही है, तो कोई आश्चर्य की बात नहीं है।

OECD Economic Surveys India नामक एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार 15 और 29 के बीच के भारतीय युवाओं में बेरोजगारी की दर 30 % से अधिक है। ये युवा बेरोजगार हैं- ये न तो पढ़ाई कर रहे हैं न ही ट्रेनिंग ले रहे हैं। भारतीय अर्थ-व्यवस्था के लिए यह बड़ी परेशानी वाली बात है। इसमें कोई दो राय नहीं कि बेरोजगारी की अधिकृत दर बहुत कम यानी मात्र 5 प्रतिशत है। लेकिन जैसा कि मैंने अक्टूबर 2016 के एक लेटर में स्पष्ट किया है कि इस आँकड़े को गंभीरता से नहीं लिया जा सकता है। इसके हिसाब-किताब के तरीके में गड़बड़ी है।

ज्यादा महत्वपूर्ण बात यहाँ पर यह है कि वर्तमान में चीजें जैसी चल रही हैं, भारत का बहुचर्चित जनसांख्यिकी बोनस (demographic dividend) देश के लिए जनसांख्यिकी विनाश साबित हो सकता है। स्टॉक मार्केट को इससे कोई परेशानी नहीं है। लेकिन इससे, कम-से-कम लंबी अवधि में स्टॉक मार्केट में सूचीबद्ध कंपनियों को और कुछ हो-न-हो, अच्छा-खासा नुकसान जरूर हो सकता है।

वास्तविकता ये है कि हम नौकरियाँ पैदा करने के बजाय उनको नष्ट करने में लगे हुए हैं। हाल के उस मामले को लें, जिसमें सर्वोच्च न्यायालय ने राष्ट्रीय और राज्य महामार्गों पर 500 मीटर के अंदर शराब की बिक्री पर प्रतिबंध लगाया है। यह सही है या गलत इस बात पर मैं नहीं जा रहा हूँ, लेकिन इसका अर्थ-व्यवस्था पर थोड़ा-बहुत असर पड़ना तय है।

The Hindu Business Line के एक संपादकीय के अनुसार इस प्रतिबंध से करीब 35,000 रेस्तराओं का कारोबार प्रभावित होगा। अनुमानों से संकेत मिलता है कि राज्य सरकारों को कर राजस्व के रूप में 50,000 करोड़ रुपये का नुकसान उठाना पड़ सकता है। बेशक, अनेकानेक नौकरियाँ तो जायेंगी हीः The Hindu Business Line का अंदाजा है कि लगभग 15 लाख नौकरियों से हाथ धोना पड़ सकता है। एक औसत परिवार में 5 सदस्यों का होना मानें तो इसका मतलब हुआ कि सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय से 75 लाख लोग प्रत्यक्ष रूप से प्रभावित होंगे।

ये नौकरियाँ भारत के अनौपचारिक सेक्टर से संबंध रखती हैं। महामार्गों पर स्थित शराब की दुकानों की इस तरह की नौकरी में ज्यादा हुनर की जरूरत नहीं पड़ती। एक कर्मचारी को अल्कोहल सिर्फ परोसना पड़ता है- बोतल का ढक्कन खोलना, गिलास या मग में शराब उड़ेलना और पीने वाले से पैसा वसूलना। भारत में कामकाजी वर्ग के बहुसंख्यक अकुशल कामगार के लिए इस तरह का काम काफी अनुकूल पड़ता है। सर्वोच्च न्यायालय के फैसले से यह वर्ग प्रभावित होने जा रहा है।

सर्वोच्च न्यायालय के फैसले का स्टॉक मार्केट पर शायद ही कोई असर पड़े- हाँ, यह हो सकता है कि चंद शराब के स्टॉक की कीमतें गिर जायें। इसी तर्ज पर कहा जा सकता है कि नोटबंदी के बाद शुरुआती कुछ महीनों के दौरान गयी कई नौकरियों का स्टॉक मार्केट पर मुश्किल से कोई असर पड़ा होगा।

भारतीय अर्थ-व्यवस्था और स्टॉक मार्केट के एक-दूसरे से कटे होने की एक प्रमुख वजह देश में विशाल अनौपचारिक-अर्थव्यवस्था का होना है।

आगे बढ़ने से पहले जरूरी है कि हम पहले ‘अनौपचारिक अर्थ-व्यवस्था’ को परिभाषित करें : यह किसी देश की अर्थ-व्यवस्था का वह हिस्सा होता है, जिस पर सरकार की निगरानी नहीं होती है। इसलिए इस पर कोई कर नहीं लगता। जैसा कि Asianomics के अर्थशास्त्री जिन वाकर अपने रिसर्च नोट में लिखते हैं : “ तात्विक रूप से इसमें ऐसा कुछ नहीं है, जो बताता है कि औपचारिक अर्थ-व्यवस्था की तुलना में औपचारिक अर्थ-व्यवस्था कार्य-व्यापार का कम प्रभावशाली है या लाभदायक स्रोत है।”

बहुत से भारतीय कारोबारी अनौपचारिक सेक्टर में काम करते हैं, इसकी मुख्य वजह है कि औपचारिक सेक्टर में काम करना फायदेमंद नहीं होता है- ढेर सारे नियम-कायदों का पालन करना होता है।

राष्ट्रीय विनिर्माण नीति-2011 के अनुमान के अनुसार औसतन विनिर्माण इकाई को लगभग 70 कानूनों और नियमों का पालन करना होता है। इसके साथ ही कभी-कभी इन इकाइयों को साल में 100 रिटर्न भरने होते हैं। इसके अलावा भारत में 150 राज्य स्तरीय और 44 केंद्रीय-स्तर के श्रम-कानून हैं। इससे किसी भी कंपनी के वैध तरीके से काम करने को काफी जटिल बना देता है।

इस नजरिये से देखें तो भारत में इतने विशाल स्तर पर अनौपचारिक सेक्टर के काम करने के लिए मुख्य रूप से सरकार जिम्मेदार है। एंबिट कैपिटल की रितिका मंकर मुखर्जी और सुमित शेखर ने हाल ही में एक रिसर्च नोट में लिखा : “भारतीय अनौपचारिक सेक्टर विशाल और श्रम-केंद्रित है। भारत के सकल घरेलू उत्पाद ( जीडीपी ) में अनौपचारिक सेक्टर 44 % का योगदान देता है और भारतीय श्रम बल ( labour force) के लगभग 75% को नौकरी देता है।”

इस प्रकार देखते हैं कि भारत में अधिकतर नौकरियों का निर्माण अनौपचारिक सेक्टर करता है। Economic Survey (2015-2016) उल्लेख हैः “देश में नौकरियों का निर्माण करने और बेरोजगारी कम रखने का श्रेय अनौपचारिक सेक्टर को दिया जाना चाहिए।” यह हमें बताता है कि अनौपचारिक सेक्टर पर डंडा बरसाने से पहले सरकार को इस आधार-भूत सचाई को ध्यान में रखना चाहिए कि यह लाखों लोगों को नौकरी देता है। इसके अलावा सरकार को नियमों और कायदों को इसी सीमा तक आसान बनाना चाहिए; जिससे कि अनौपचारिक सेक्टर में कार्यरत ये उद्यम धीरे-धीरे औपचारिक-सेक्टर का हिस्सा बन जायें।

जैसे कि पहले जिक्र किया गया है कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था का बड़ा हिस्सा अनौपचारिक-सेक्टर में आता है और यह भारतीय कामकाजी वर्ग के तीन-चौथाई हिस्से को नौकरी प्रदान करता है। अन्य आकलन के अनुसार भारत का अनौपचारिक-सेक्टर देश के कामकाजी वर्ग के 75% को नौकरी उपलब्ध कराता है। मैंने अपनी नयी किताब India's Big Government-The Informal State and How It is Hurting Us में भी लिखा है : “कामकाजी वर्ग का लगभग 92 % अनौपचारिक सेक्टर में काम करता है। इन काम करने वालों के बड़े हिस्से की कमाई बहुत कम होती है और इनकी सामाजिक सुरक्षा नहीं के बराबर है। इसका मतलब यह है कि कामकाजी वर्ग के लगभग 8 % मात्र के पास नियमित स्थायी नौकरी है और एक प्रकार की सामाजिक सुरक्षा उपलब्ध है। इस कोष्ठक में आनेवालों में भी अच्छी नौकरियों की हिस्सेदारी के मामले में उच्च जाति के हिंदुओं और इसाई, जैन और सिख जैसे अन्य अल्पसंख्यकों के बीच, उनकी उच्चतर शैक्षिक योग्यताओं को देखते हुए, गैर-बराबरी देखने को मिलती है। ”

इसलिए, इस क्षेत्र पर किसी भी प्रभाव का, समग्र अर्थ-व्यवस्था पर प्रभाव पड़ता है। लेकिन फास्ट मूविंग कंज्यूमर गुड्स स्टॉकों की कीमत को छोड़कर, स्टॉक मार्केट के बारे में ऐसा नहीं कहा जा सकता है, जो कभी-कभी प्रभावित होते हैं ; क्योंकि अनौपचारिक क्षेत्र में कम आय का इस क्षेत्र में संचालित कंपनियों की कमाई पर असर पड़ता है।

अब ‘अवैध’ कत्लखानों को बंद करने संबंधी उत्तर प्रदेश सरकार के निर्णय के विषय को लें। The Hindustan Times में छपी खबर में उल्लेख हैः “आर्थिक शब्दावली में कहें तो भारत के कुल मांस निर्यात में उत्तर प्रदेश की हिस्सेदारी लगभग 50 % है। यह एक बड़ा उद्योग है जो प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से 25 लाख लोगों को रोजी-रोटी प्रदान करता है,,,देश भर में, सरकार-मान्य 72 कत्लखानों में 38 उत्तर प्रदेश में हैं।”

राज्य सरकार के निर्णय का उत्तर प्रदेश की अर्थ-व्यवस्था पर बहुत अधिक असर पड़ेगा। The Hindustan Times की रिपोर्ट में ‘अखिल भारतीय मांस और पशुधन निर्यातक’ संगठन का हवाला देते हुए कहा गया है कि भारतीय मांस का निर्यात 27,000 करोड़ रुपये है, जिसमें उत्तर प्रदेश से 15,000 करोड़ रुपये का निर्यात होता है। बेशक, उत्तर प्रदेश सरकार के कदम से शेयर बाजार पर कोई असर नहीं पड़ा- यह देखते हुए कि कत्लखानें सूचीबद्ध नहीं हैं। लेकिन आप इस सचाई से इनकार नहीं सकते हैं कि यह सेक्टर बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्रदान करता है।

हालांकि, उत्तर प्रदेश सरकार शायद इस तथ्य को नजरअंदाज कर दिया है, लेकिन इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने नहीं, कि ये कत्लखानें ( जिनमें से कई अनौपचारिक हैं ) बड़ी संख्या में लोगों को रोजगार प्रदान करते हैं । 3 अप्रैल 2017 को इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ खण्डपीठ कहा, "वैध गतिविधियों पर तत्काल प्रतिबंध लगाने के साथ-ही-साथ वैध रूप से गतिविधियों को चलाने को भी सुगम बनाया जाना चाहिए। खासकर उन गतिविधयों को जिनका संबंध खाद्य-पदार्थों, खाने संबंधी आदतों और वेंडिंग से है; जिनका संबंध जीवन और आजीविका के अधिकार के साथ निर्विवाद रूप से है। "

आज के इस आलेख में, मैंने जिस अपनी बात पर जोर देने की कोशिश की है, वह यह कि भारतीय शेयर बाजार भारतीय अर्थव्यवस्था का प्रतिबिंब नहीं है।

और यह मुख्य रूप से इसलिए कि भारत के अनौपचारिक कारोबारों और अनौपचारिक श्रमिक बल की वजह से ।

कई बार देखा गया है कि शेयर बाजार और अर्थव्यवस्था ने एक दूसरे के खिलाफ व्यवहार किया। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का मामला लें : 200 9 से अब तक, सरकार ने इन बैंकों को चलाये रखने के लिए इनमें 1 लाख 30,000 करोड़ रुपये से ज्यादा का निवेश किया है। जितनी बार भी सरकार ने इन बैंकों में पैसा झोंकने का निर्णय लिया, उतनी बार इन बैंकों के शेयरों की कीमतों में तेजी आयी। लेकिन इस तरह के सरकारी फैसले समग्र अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे नहीं होते ; क्योंकि इन बैंकों में झोंका जाने वाला धन शिक्षा, स्वास्थ्य, बुनियादी ढांचा आदि जैसे अन्य क्षेत्रों से लिया गया होता है।

इसके साथ ही, जब भी सरकार इन बैंकों में पैसा झोंकती है, यह व्यवहार में इन बैंकों को चलाने वाले लोगों को वह बता रही होती है कि कुछ भी हो, सरकार इन बैंकों का तारनहार बनी रहेगी। और इस तरह यह सरकारी तरीका भी बैंक या अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने के लिए एक स्वस्थ प्रोत्साहन नहीं है।

यहाँ पर यह गौर करनेवाली बात है कि भारत में घरेलू वित्तीय बचत का नाममात्र का हिस्सा स्टॉक मार्केट में निवेश होता है। यही नहीं, इन्हीं घरेलू वित्तीय बचतों का मात्र 1.65 % ही शेयरों और डिबेंचरों में लगता है। शेयरों और डिबेंचरों के अंतर्गत ही कुल घरेलू वित्तीय बचत का महज 0.93 प्रतिशत म्युचुअल फंडों में निवेश होता है। इस प्रकार पाते हैं कि भारत में व्यक्तियों द्वारा शेयरों में प्रत्यक्ष निवेश, कुल घरेलू वित्तीय बचत का एक प्रतिशत से भी कम है- यह अंदाजन 0.5-0.6 % के आसपास है।

इससे कोई इनकार नहीं करता कि म्युचुअल फंड कंपनियाँ शेयरों में भी निवेश करती हैं। इसके अलावा कुल घेरलू वित्तीय बचत का 21.18 % जीवन बीमा कंपनियों में लगा हुआ है। जीवन बीमा कंपनियां एकत्र प्रीमियम का एक हिस्सा शेयरों में भी निवेश करती हैं। लेकिन इसका कोई हिसाब उपलब्ध नहीं है। एक और बात, अधिकतर मामलों में, इक्विटी-उन्मुख जीवन बीमा पालिसी खरीदने वाले लोगों को खुद नहीं पता होता कि उनका पैसा शेयरों में निवेश होने वाला है। कुल मिलाकर भारत की घरेलू बचत का एक बहुत ही छोटा-सा हिस्सा शेयर बाजार में लगता है।

निष्कर्ष में, प्रसिद्ध कवि फ़ैज अहमद फैज ने एक बार कहा था: "और भी दुख हैं जमाने में मोहब्बत के सिवा ।" भारतीय संदर्भ में संभवतः हमें यह कहने में दिक्कत नहीं है : "और भी दुख हैं ज़माने में, स्टॉक मार्केट के सिवा।"

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

Comments