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विवेक कौल


विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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भारत में नौकरियों की चाबी है ‘मुद्रा-ऋण’?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते अपने स्वतंत्रता-दिवस के भाषण में कहा : "सरकार ने रोजगार से संबंधित योजनाओं और 21वीं सदी की जरूरतों के मद्देनजर मानव संसाधन के विकास के लिए प्रशिक्षण में कई पहलें की हैं। हमने इस सिलसिले में युवाओं को गिरवी आधारित निःशुल्क ऋण प्रदान करने के लिए एक विशाल कार्यक्रम का शुभारंभ किया है। हमारे युवा आत्म-निर्भर हों, उन्हे

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कृषि-ऋण माफी : खजाने की कीमत पर सिंकतीं राजनीतिक रोटियाँ!

पिछले कुछ महीनों के दौरान कई राज्य सरकारों ने किसानों का कृषि-ऋण माफ कर दिया। देर से जारी आर्थिक-सर्वेक्षण (दूसरा खंड) में इसके आर्थिक-प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। सर्वेक्षण में इन बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है:- क) कृषि-ऋण माफी के अंतर्गत किसानों का ऋण राज्य सरकारों को स्थानांतरित हो जाता है। राज्य सरकारें फिर किसानों की तरफ से ऋण देने वाले

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‘नोटबंदी’ के बाद भी कर-संग्रह जैसा-का-तैसा ही रहा है

8 नवंबर, 2016 से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ‘नोटबंदी’ को सफल सिद्ध करने के लिए कई कोशिश कर चुकी है। नोटबंदी के बचाव में तर्क और आर्थिक सिद्धातों की दुहाई दी है। हालिया महीनों में सरकार ने नोटबंदी को सार्थक और सफल साबित करने के क्रम में आँकड़े भी पेश किये हैं। नोटबंदी की सफलता के सबूत के तौर पर सरकार की तरफ से प्रस्तुत नवीनतम आँकड़ा यह है कि नोटबंदी के परि

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रिटेल इन्वेस्टर आज भी आसानी से झाँसे में आ जाता है

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी इंडेक्स ने हाल ही में पहली बार 10,000 के अंकों का आँकड़ा पार किया। इसको लेकर काफी जश्न मनाया गया। इनसान सचमुच में बड़े आँकड़ों से काफी प्यार करता है। यही वजह है कि जब शेयर मार्केट (शेयर बाजार) संबंधी सूचकांकों के एक निश्चित सीमा पार जाने के बाद की खबरें आती हैं, तो हम लट्टू हो जाते हैं। पिछले 10 दिनों से बीएसई सेंसेक्स भी 32,000

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खुदरा-ऋण की भी खराब हालत , मतलब आर्थिक-मंदी कायम है

इधर बैंकों द्वारा ऋण देने के क्रिया-कलापों में आयी मंदी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है। इस सिलसिले में नीचे दिये गये चित्र-1 पर एक नज़र डाली जा सकती है: मूलरूप से इसमें मई 2016 से मई 2017 और मई 2015 से मई 2016 के बीच की अवधि में बैंकों द्वारा वितरित ऋण के बारे में बताया गया है। तालिका-1 : Type of Loan Total Loans Given Between May 2016 and May 2017 (in Rs Crore) Total Loans Given Between May 2015 and May 2016 (in Rs Crore) Non-Food Credit 4,

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