बैंकों के निजीकरण से टूटेगा नेता-उद्योगपतियों का गठजोड़

विगत सप्ताहांत भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने एक बात कही, " कुछ राष्ट्रीयकृत बैंकों का पुनःनिजीकरण करने का शायद यह सही समय है ... इससे सरकार को बैंकों में कम पूँजी लगाने की जरूरत होगी।“ ‘द विवेक कौल डायरी’ के नियमित पाठकों को मालूम होगा कि हमने कई बार अतीत में कहा है कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का निजीकरण होना चाहिए और सरकार को बैंकिंग व्यवसाय से खुद को बाहर निकाल लेना चाहिए। लेकिन सरकार इसके प्रति हमेशा उदासीनता दिखाती रही है।

बेशक, सवाल यह है कि आचार्य ने ‘निजीकरण’ के बजाय ‘पुन: निजीकरण’ शब्द का क्यों इस्तेमाल किया। पूर्व प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने 1 9 जुलाई, 1 9 6 9 को 14 निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया था। इन बैंकों में 50 करोड़ रुपये या इससे अधिक की जमा राशि थी और बैंकिंग कारोबार में इन बैंकों की 90 % हिस्सेदारी थी। मजे की बात यह है कि जब ऐसा हुआ, तो रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर एल.के. झा पूरी स्थिति से बिलकुल अनजान थे।

टीसीए श्री निवास राघवन Dialogue of the Deaf - The Government and the RBI में लिखते हैं : " रिजर्व बैंक के अधिकृत इतिहास की तीसरी पुस्तक में वर्णन है कि 17 जुलाई को उन्होंने [इंदिरा गांधी ] रिजर्व बैंक के गवर्नर एल.के. झा को दिल्ली बुलाया। झा ने सोचा कि उन्हें सामाजिक नियंत्रण पर चर्चा के लिए बुलाया गया है और इस तरह वे इस विषय पर एक विस्तृत नोट तैयार कर दिल्ली पहुँचे। झा ने श्रीमती गांधी को अपना नोट देना चाहा। इस पर श्रीमती गांधी ने झा से उनका नोट अपनी मेज पर रखवा लिया । फिर उन्हें पास के कमरे में जाने और वहाँ बैंकों के राष्ट्रीयकरण पर कानून का प्रारूप तैयार करने में मदद करने को कहा। "

वर्ष 1 9 80 में, छह अन्य निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण किया गया। इस बार राष्ट्रीयकरण की सिफारिश रिजर्व बैंक के तत्कालीन गवर्नर आईजी पटेल ने की थी। अब मौजूदा डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने जो कहा है, उस पर आते हैंः “ फिर-से-निजीकरण जैसी बात की वकालत हम अतीत में कर चुके हैं। कई स्तरों पर यह बात सार्थक भी लगती है। हमारे पास लगभग दो दशकों का लंबा उदाहरण है, जिससे संकेत मिलता है कि 1 99 0 के दशक में पहली बार स्थापित नई पीढ़ी के निजी-क्षेत्र के बैंक अपने सार्वजनिक क्षेत्र के समकक्षों के मुकाबले में कहीं अधिक कुशलतापूर्वक चल रहे हैं। हाँ, ग्लोबल ट्रस्ट बैंक जैसे मामले भी सामने आये हैं, लेकिन कुल मिला कर देखें तो निजी बैंक, अपने सार्वजनिक क्षेत्र के समकक्षों की तुलना में बेहतर ढंग से संचालित हैं । यहां तक कि पुरानी पीढ़ी के निजी क्षेत्र के बैंक, जो आकार में बहुत छोटे हैं, काफी अच्छा प्रदर्शन कर रहे हैं।”

खराब ऋण का मामला ही लेंः वर्तमान में सामान्य तौर से भारतीय बैंकिंग क्षेत्र और विशेष रूप से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को यह अपनी जकड़ में ले रखा है। 31 दिसंबर 2016 तक, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्ति-एनपीए) का कुल खराब ऋण 6.46 लाख करोड़ रुपये के करीब था। निजी क्षेत्र के बैंकों का खराब-ऋण 86,124 करोड़ रुपये रहा। इनमें से दो बैंकों - आइसीआइसीआइ बैंक और एक्सिस बैंक की खराब-ऋण में हिस्सेदारी 58,184 करोड़ रुपये की रही। बेशक, चूँकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक अधिक ऋण देते हैं, ऐसे में आश्चर्य नहीं है कि उनके खराब ऋण अधिक हैं।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कुल ऋण निजी क्षेत्र के बैंकों के कुल ऋण का 2.9 गुना है। लेकिन उनका खराब ऋण निजी बैंकों का 7.5 गुना हैं। अगर दोनों तरह के बैंकों को एक ही तरह से चलाया जाये तो ज्यादा फर्क नहीं मिलेगा।

वर्ष 2013-2014 और 2015-2016 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने कुल 56,567 करोड़ रुपये का शुद्ध लाभ कमाया और दूसरी तरफ निजी बैंकों ने 1,13,801 करोड़ रुपये। हालांकि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक देश के निजी बैंकों की तुलना में काफी बड़े हैं।

इन आंकड़ों से पता चलता है कि भारत के सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का कितना अकुशल संचालन हो रहा है । और इस अकुशलता के कारण सालों से सरकार को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा है। वर्ष 200 9 और मार्च 2017 के बीच सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को चलाये रखने के लिए सरकार को इन बैंकों में करीब 1.5 लाख करोड़ रुपये का निवेश करना पड़ा ।

सचमुच में, जो पैसा सरकार को इन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में झोंकना पड़ा है, उनका उपयोग कहीं ज्यादा जरूरी कामों में हो सकता था। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मूल समस्या उनके कामकाज में राजनीतिक दखलंदाजी है। हर सरकार अपने पसंदीदा उद्योगपतियों को ऋण देने में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का उपयोग करती है। अंततः देश के करदाता ही इन राजनेताओं-उद्योगपतियों के गठजोड़ का बिल भरते हैं।

आचार्य ने Is State Ownership in the Indian Banking Sector Desirable? नामक आलेख में लिखा है: " एक, सरकारी स्वामित्व भारी नैतिक खतरे जो जन्म देता है- बैंकों को राजनीतिक रूप से अनुकूल लक्ष्यों को हासिल करने के लिए ऋण देने का निर्देश दिया जाता है और जब यह खराब-ऋण में तब्दील हो जाता है, तब आर्थिक मदद दी जाती है। दूसरा, सरकारी स्वामित्व के कारण सरकारी बैंक सरकारी हिस्सेदारी बेचकर पूँजी नहीं जुटा सकते। जिससे इन बैंकों का उत्थान नहीं होता और इस तरह बढ़ नहीं पाते। इसका क्या अर्थ है? अर्थशास्त्री एलन ब्लेंडर ने अपनी किताब After the Music Stopped में लिखा है , " नैतिक खतरे का मतलब यह है कि जो लोग किसी भी तरह की जोखिम से बिलकुल सुरक्षित होते हैं, इस जोखिम से बचने के लिए उनके द्वारा तकलीफ ( और खर्च का भार) उठाने की संभावना कम रहती है।'' इस प्रकार देखते हैं कि सरकारी बैंकों के प्रबंधक जानते हैं कि यदि राजनेता के करीबी उद्योगपति को दिया गया ऋण खराब होता है तो सरकार उसकी भरपायी कर देगी। इस कारण से बैंक मैनेजर ऐसे लोगों को भी ऋण देने में नरमी बरतते हैं, जिनके डिफाल्टर होने का अंदेशा रहता है। बेशक, उन पर तबादले का खतरा मंडराता रहता है। जो उनके लिए बहुत बड़ी बात नहीं है। ऐसा सालों से होता रहा है।

दूसरे, बैंकों में अपनी एक निश्चित हिस्सेदारी सरकार कायम रखेगी, इसे देखते हुए बैंक अपनी जरूरत के मुताबिक पूँजी नहीं बढ़ा सकते। पूँजी के लिए इन्हें सरकार पर निर्भर रहना पड़ेगा। सरकार के पास भी बेशुमार नकदी नहीं है। ऐसे में सरकारी बैंकों को पास नकदी की दिक्कत बनी रहेगी।

ऐसी स्थिति में, आचार्य के सुझाव के अनुसार सरकार द्वारा कुछ सार्वजनिक बैंकों का फिर से निजीकरण करने की कितनी संभावना है ? शून्य। आचार्य, मैं और अन्य सोच सकते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मूल समस्या सरकारी स्वामित्व है, लेकिन नेता ऐसा नहीं सोचते। क्योंकि उनका मानना है कि बैंकों का मालिक होने से आप अपने मन के मुताबिक ऋण दिलवा सकते हैं। हम देख चुके हैं कि इन सबके लिए कीमत अदा करनी पड़ती है-सरकारी बैंकों का ग्रोथ इसीलिए नहीं हो पा रहा है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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