बेचने की शुरुआत ‘हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स’ से कैसी रहेगी?

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने हाल ही में कहाः “लगभग डेढ़ दशक बाद सरकारी स्वामित्ववाली एयर इंडिया लि. के विनिवेश (Disinvest) का भारत को दूसरी बार ऐतिहासिक मौका मिला है। इससे उड्डयन सेक्टर को आगे बढ़ाने में मदद मिलेगी। ”

एयर इंडिया का विनिवेश होता है कि नहीं, यह देखने वाली बात होगी। वह इसलिए कि एयर इंडिया के विनिवेश का विषय राजनीतिक रूप से काफी गरमागरम मुद्दा है। विनिवेश की तरफ कदम बढ़ाने से काफी हंगामा होने का अंदेशा हैः पहला, भारत के पेशेवर श्रमिक संगठन के नेताओं की तरफ से, जिनके बारे में और कहा भी क्या जा सकता है। दूसरा, विपक्षी राजनीतिक दलों की तरफ से-इधर, ये मृतप्राय हालत में हैं।

एक खास बात यह है कि आज की तारीख तक केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार कोई भी आर्थिक सुधार कार्यक्रम लेकर नहीं आ पायी है। इससे देश की जनसंख्या के एक हिस्से में इस सरकार के अलोकप्रिय होने का खतरा है। सरकार ने कुछ अलोकप्रिय फैसले लिए हैं, जिनके अंतर्गत खासतौर से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) और भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के तथाकथित सांस्कृतिक एजेंडे को लागू करना है। ऐसी पृष्ठभूमि में, एयर इंडिया का विनिवेश करने से पहले सरकार को ऐसी कंपनियों का विनिवेश कर सकती है, जिनको करना आसान है, पर सरकार उनसे ढेर सारा पैसा बचा सकती है, जैसे कि हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स मैन्युफैक्चरिंग कं. लि...

तालिका-1 पर नजर डालें..

तालिका-1: 10 Major Loss Making CPSEs during 2015-16

तालिका-1 के अनुसार साल 2015-16 में सर्वाधिक घाटा देने वाली सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों में हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स चौथे नंबर पर रही। इससे लगभग 2, 528 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ। जिन तीन कंपनियों ने हिंदुस्तान फोटो से अधिक घाटा दिया, उनका कोई बिज़नेस मॉडल भले न हो, लेकिन कारोबार के नाम पर कुछ तो किया है।

भारतीय इस्पात प्राधिकरण लि. के देश भर में संयंत्र हैं और यहाँ हजारों लोग काम करते हैं। लेकिन इसने इस प्रक्रिया में काफी आर्थिक नुकसान किये हैं, क्योंकि यह कीमत के मामले में चीन की कंपनियों के साथ मुकाबला नहीं कर सकती है।

भारत संचार निगम लि. देश भर में दूरसंचार सेवा प्रदान करती है। एयर इंडिया की हैसियत कुछ भी हो, लेकिन यह भारत की राष्ट्रीय एयरलाइन तो है ही और राष्ट्रीय-अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हवाई सेवाएं उपलब्ध कराती है। देश के प्रधानमंत्री को उनकी अंतरराष्ट्रीय ट्रिप पर ले जाती है। लेकिन हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स के बारे में क्या कहा जाये? यह कंपनी करती क्या है ? फोटो फिल्म्स का कारोबार कुछ समय पहले ठप हो गया। सवाल हैः सरकार अभी भी फोटो फिल्म्स कंपनी क्यों चला रही है? फोटो फिल्म्स को पहले डिजिटल कैमरे ने मारा और उसके बाद मोबाइल फोन ने। सचाई ये है कि अब यह कंपनी फोटो फिल्म बनाती ही नहीं है। साल 2012-13 की अवधि ( बमुश्किल प्राप्त नवीनतम सालाना रिपोर्ट) में कंपनी ने कुल 3.6 करोड़ रुपये का उत्पादन किया, बिक्री 3.7 करोड़ की हुई। अब आप कल्पना कर सकते हैं कि कौन ऐसा सूझ-बूझ वाला होगा जो 4 करोड़ से भी कम की बिक्री और 1500 करोड़ रुपये से अधिक का नुकसान ( साल 2012-13 की तरह) झेलनेवाली कंपनी का संचालन करेगा। पहले उल्लेख किया जा चुका है कि साल 2015-16 में कंपनी को 2,528 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था। कंपनी में 217 लोग काम करते थे। इसका मतलब कि हर कर्मचारी के पीछे कंपनी को 11.65 करोड़ रुपये का घाटा उठाना पड़ा। ऐसे में कंपनी को जिंदा रखना बेतुका लगता है। सिर्फ 2015-16 में ही हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स घाटे में नहीं रही- यह एक दशक से अधिक समय से घाटे में चल रही है। साल 2004-05 और 2015-16 के बीच कंपनी को कुल 15,000 करोड़ रुपये का नुकसान हुआ।

तालिका-2: हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स का घाटा

तालिका-2 से स्पष्ट है कि सालों से कंपनी ने एक पैसा भी नहीं बनाया। ऐसे हालात में कंपनी उधारी के पैसे से चलायी जाती रही है। 31 मार्च 2016 तक कंपनी का लंबी अवधि का लोन 23, 752 करोड़ रुपये हो चुका था। स्वाभाविक है कि इस पर कंपनी को ब्याज देना पड़ता है। मेरा अनुमान है कि कंपनी का यह सबसे बड़ा खर्च है। मैं अनुमान शब्द का प्रयोग इसलिए कर रहा हूँ कि मेरे पास कंपनी के बारे में कोई नवीनतम आँकड़ा नहीं है। हिंदुस्तान फिल्म्स जैसी मृतप्राय कंपनी को बैंक लोन देते रहते हैं क्योंकि उन्हें पता है कि आखिरकार वे सरकार को पैसा दे रहे हैं। इससे सुरक्षित उधारी और कहाँ हो सकती है।

यहाँ पर यह उल्लेख सही होगा कि सरकार के पास असिमित पैसा नहीं होता है। सरकार हिंदुस्तान फोटो फिल्म्स जैसी घाटे में चल रही कंपनियों में जो पैसा लगाती है, वह पैसा अधिक जरूरी चीजों जैसे कि शिक्षा, स्वास्थ्य या सस्ती आवास सुविधा उपलब्ध कराने जैसी सरकारी सेवाओं में नहीं लगता है। घाटा देने वाली कंपनियों को जिंदा रखने की एक बेदम -सी दलील यह दी जाती है कि इन कंपनियों में काम करने वाले लोग कहाँ जायेंगे।

प्रत्यक्ष नौकरियां देने के अलावा ये सार्वजिनक क्षेत्र की कंपनियाँ एक ऐसी प्रणाली का हिस्सा होती हैं, जिस पर ये निर्भर होती हैं और जिनको जिंदा रखने में मददगार भी होती हैं।

लेकिन इस मामले में दलील बेकार है,क्योंकि कंपनी में केवल 217 कर्मचारी हैं। इन्हें अच्छा-सा स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति पैकेज देकर कंपनी को बंद किया जा सकता है। कंपनी की भौतिक परिसंपत्ति बेचकर बकाये ऋण का भुगतान किया जा सकता है। कंपनी की टाउनशिप में 472 आवास हैं। शुरुआत इनको बेचकर की जा सकती है। यदि केंद्र सरकार चाहती है, तो इससे आसानी से किया जा सकता है। अभी तक ऐसा क्यों नहीं किया गया। इसका अनुमान लगाना मुझे उतना ही आसान है, जितना आपके लिए।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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