भारत में कम ब्याज दर होने से उधारी की माँग नहीं बढ़ती

अधिकतर अर्थशास्त्रियों का यह दृढ़ विश्वास है कि ‘ब्याज दरें जितनी कम होंगी, लोग उतना ही अधिक ऋण लेते हैं। ’ वित्त मंत्रालय के मुख्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम भी इस धारणा में विश्वास करते हैं। ऐसे में आश्चर्य की बात नहीं कि कुछ दिनों पूर्व एक भाषण में रेपो रेट नहीं घटाने के लिए उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक को खूब खरी खोटी सुनायी।

[ रेपो रेट (Repo Rate) - रेपो दर वह दर है; जिस पर भारतीय रिजर्व बैंक, बैंकों को उधार देता है। यह उन ब्याज दरों के लिए एक बेंचमार्क का कार्य करता है, जो बैंक अपने यहाँ जमा राशियों पर ग्राहकों को देते हैं और दिये ऋण पर वसूलते हैं। हम यहाँ पर एक प्रकार का बेंचमार्क इसलिए कहते हैं ; क्योंकि ऐसे अन्य कई कारक होते हैं, जो तय करते हैं कि बैंक अपने दिये ऋणों पर कितना ब्याज लें।]

सुब्रह्मण्यम चाहते हैं कि भारतीय रिजर्व बैंक मौजूदा दर 6.25% के रेपो रेट में और कटौती करे। उन्होंने कहा : “ मुद्रा-स्फीति ( महँगाई) का दबाव काफी कम हो रहा है...ऐसा कई आर्थिक कारकों के कारण हुआ है..इस पृष्ठभूमि में अधिकतर सूझबूझ वाले अर्थशास्त्री मानते हैं कि देश की अर्थ-व्यवस्था के लिए सभी व्यापक आर्थिक नीति का समर्थन मिलना चाहिए- इसकी जगह वित्तीय और मौद्रिक-नीति दोनों सख्त हैं।”

यहाँ पर गौर करनेवाली बात ये है कि वर्तमान में मुद्रा-स्फीति नियंत्रण में है, और इसको देखने से लगता है कि भविष्य में भी मुद्रा-स्फीति नियंत्रण में रहेगी। इसे देखते हुए रिजर्व बैंक को रेपो रेट में कटौती करनी चाहिए। पिछली बार अक्टूबर 2016 में रेपो रेट में कटौती की गयी थी। रिजर्व बैंक चाहे जैसे और जब रेपो दर में कटौती करता है, उम्मीद की जा रही है कि बैंक अपने ऋण दर में कटौती करेंगे। तभी लोग और कारोबारी अधिक उधार लेंगे और खर्च करेंग।

जब ज्यादा खर्च करेंगे, तो देश की अर्थव्यवस्था को गति मिलेगी। सुब्रह्मण्मयम की बात अपनी जगह सही हो सकती है। लेकिन क्या उनकी बात का कोई व्यावहारिक वजूद है ? इसका जवाब तलाशने से पहले थोड़ा कुछ दूसरे बिंदुओं पर विचार कर लेते हैं। रिजर्व बैंक की मौद्रिक नीति अप्रैल 2017 के आरंभ में जारी की गयी थी। इसमें उल्लेख है कि अप्रैल और अक्टूबर 2016 के बीच बैंकों के एक-साल के मार्जिनल कास्ट आफ फंड्स बेस्ड लेंडिंग रेट्स (एमसीएलआर) में गिरावट मात्र 15 बेसिस पाइंट्स था। ऐसा तब था, जब रेपो रेट में 50 बेसिस पाइंट्स की कटौती की गयी थी।

इस प्रकार, देखते हैं कि रिजर्व बैंक द्वारा रेपो रेट में 50 बेसिस पाइन्ट की कटौती करने के बाद भी बैंकों ने ब्याज दरों में मात्र 15 बेसिस पाइन्ट की कटौती की।

[ एक बेसिस पाइंट एक प्रतिशत का 100वाँ हिस्सा।]

नोटबंदी के बाद “ सार्वजनिक क्षेत्र के 27 बैंकों ने अपने एक-साल के मेडियन एमसीएलआर में 50 से 105 बेसिस पाइंट घटा दी। और 19 सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों ने 25 से 148 बेसिस पाइंट ।” ऐसा तब हुआ है, रेपो रेट में किसी तरह की कटौती नहीं की गयी है। औसतन, बैंकों का एक साल एमसीएलआर 70 बेसिस पाइंट घटकर 8.6 प्रतिशत हो गया। यहाँ पर क्या हुआ ? रेपो रेट में कटौती का उस लागत पर बमुश्किल कोई असर पड़ता है, जिस पर अपनी लोन फंड के लिए पहले से बैंकों ने पैसा उधार लिया है।

लेकिन नोटबंदी का असर पड़ा। “ एससीबी सहित सकल जमाराशि में कम लागत वाले करेंट अकाउंट एंड सेविंग्स अकाउंट (सीएएसए) जमाओं की हिस्सेदारी ( 17 मार्च 2017) को 39.2 प्रतिशत हो गयी- नोटबंदी के पूर्व की तुलना में 4 प्रतिशत की वृद्धि। ” ऐसा इसलिए हुआ कि लोगों ने प्रतिबंधित नोटों को बैंकों में जमा किया और उनके अकाउंट में क्रेडिट हो गया। इसका मूल मतलब यह हुआ कि बैंकों के पास अचानक कम खर्चीली नोटबंदी की जमा-रकम हाथ लग गयी। इसके कारण उन्होंने लोन पर ब्याज दरें घटा दीं- हालाँकि रेपो रेट में कोई कटौती नहीं हुई।

इस अवधि में रिजर्व बैंक ने रेपो रेट 6.25 % बनाये रखा। ब्याज दर में कटौती समीकरण का मात्र एक हिस्सा है। बड़ा सवाल यह है कि क्या इससे उधारलेने वालों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है ? पूर्व की तुलना में ब्याज दर कम होने से क्या कारोबारी और लोग अधिक उधार लेने लगे हैं ? यहाँ पर स्थिति रोचक मोड़ ले लेती हैः बैंकों की कुल जमाएं 28 अक्टूबर 2016 ( नोटबंदी के पूर्व) और 30 दिसंबर 2016 ( प्रतिबंधित नोटों को बैंकों में जमा करने की अंतिम तिथि) के बीच 6.41 % की वृद्धि के साथ 10,56, 817 करोड़ हो गयीं। मात्र दो माह में यह जबरदस्त बढ़ोतरी थी।

लिक्विडिटी में इस अचानक वृद्धि के कारण बैंकों ने जमाओं पर ब्याज दरों और फिर उधारी पर ब्याज की दरों में कटौती की। रोचक बात ये है कि बैंकों के पास कुल जमायें स्थिर बनी रहीं और 30 अप्रैल 2017 को यह 1 करोड़ 5 लाख 9 हजार 337 करोड़ रुपये थी। दिसंबर 2016 से देखें तो मामूली गिरावट रही। अक्टूबर 2016 के अंत और अप्रैल 2017 के अंत के बीच बैंकों में आयी जमाओं में से मात्र लगभग 36 प्रतिशत को ही लोन पर दिया गया। ( यहाँ पर हम सिर्फ नान-फूड क्रेडिट पर ही नजर डाल रहे हैं। बैंकों द्वारा दिये वे लोन, जो फूड कार्पोरेशन आफ इंडिया और अन्य राज्य एजेंसियों को चावल और गेहूँ खरीदने के लिए दिये जाते हैं, से अलग होते हैं।

इसका मतलब यह हुआ कि ब्याज दरों में कटौती के बावजूद हर 100 रुपये की हर नयी जमा में बैंकों ने केवल 36 रुपया लोन के रूप में दिया। यदि हम अक्टूबर 2015 के अंत और अप्रैल 2016 के अंत के बीच के समान रेशियों पर नजर डालें, तो यह बिलकुल अलग तस्वीर पेश करता है। इस अवधि में बढ़ी जमाओं का 116 प्रतिशत लोन दिया गया। इसका मतलब कि 100 रुपये की हर नयी जमा पर बैंकों ने 116 रुपये का लोन दिया। इसका मतलब कि अवधि की शुरुआत से पहले की जमाओं को भी लोन पर दिया गया।

इस प्रकार देखते हैं कि अक्टूबर 2015 और अप्रैल 2016 के बीच बैकों ने ऊँची ब्याज दरों पर बड़ी मात्रा में ऋण बाँटे। यह, सुब्रह्मण्यम के उस विचार के बिलकुल खिलाफ जाता है, जिसमें वे चाहते हैं कि रिजर्व बैंक रेपो रेट में कटौती करे। यह उस विचार के भी खिलाफ जाता है कि कम ब्याज दर होने से बैंकों की उधारी का कारोबार बढ़ जाता है। यह देखते हुए कहा जा सकता है कि कम ब्याज दरें पूरी कहानी का एक अंगमात्र हैं। यदि कम ब्याज दरें उधारी की माँग में वृद्धि नहीं करती हैं, तो यह किसी काम का नहीं है। उधार में वृद्धि कई कारणों से नहीं होती है, इसकी चर्चा हम करते रहते हैं।

नोटबंदी ने इस मसले को बढ़ा दिया है। एक बात और, ब्याज दरों में गिरावट से उन लोगों को तकलीफ होती है, जो अपने खर्चों के लिए सावधि जमाओं से प्राप्त नियमित आय पर निर्भर होते हैं। इससे उन लोगों को भी चोट पहुँचती है, जो अपनी लंबी अवधि के लक्ष्यों को पूरा करने के लिए बचत कर रहे हैं। दोनों, मामलों में खर्च में कटौती करनी पड़ती है। पहले मामले में इसलिए कटौती करनी पड़ती है कि पर्याप्त नियमित आय नहीं पैदा हो रही हैं,, दूसरे मामले में, निवेश लक्ष्य को हासिल करने के लिए ज्यादा बचत करने हेतु। खर्च में ये कटौती कुल अर्थ-व्यवस्था को क्षति पहुँचाती है।

ब्याज दरों का संबंध भी बचतकर्ताओं और जमाकर्ताओं से है। हमें अभी तक कोई भी पेशेवर अर्थशास्त्री इस कोण से बात करता नजर नहीं आया है। उनके दिमाग में आज भी सिर्फ यही बात है कि कम ब्याज दर हों, तो बैंकों की उधारी का कारोबार बढ़ता है। यह सिर्फ इसलिए कि आजकल अधिकतर पेशेवर अर्थशास्त्री अमेरिका में प्रशिक्षित होते हैं, जहाँ पर सिस्टम बिलकुल अलग तरह का है और जहाँ कम ब्याज दरें होने से कारोबारी और लोग ज्यादा उधार लेने लगते हैं। लेकिन जरूरी नहीं कि वैसा ही भारत में भी हो। भारत में बिलकुल अलग ही मामला हो जाता है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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