भारत में नौकरियों की चाबी है ‘मुद्रा-ऋण’?

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले हफ्ते अपने स्वतंत्रता-दिवस के भाषण में कहा : "सरकार ने रोजगार से संबंधित योजनाओं और 21वीं सदी की जरूरतों के मद्देनजर मानव संसाधन के विकास के लिए प्रशिक्षण में कई पहलें की हैं। हमने इस सिलसिले में युवाओं को गिरवी आधारित निःशुल्क ऋण प्रदान करने के लिए एक विशाल कार्यक्रम का शुभारंभ किया है। हमारे युवा आत्म-निर्भर हों, उन्हें रोजगार मिले, वे रोजगार देने वाले बनें। पिछले तीन वर्षों में, 'प्रधानमंत्री मुद्रा योजना' से लाखों लाख युवा आत्मनिर्भर बने हैं। यही नहीं है कि एक युवा सिर्फ एक को, बल्कि दो या तीन लोगों को रोजगार दे रहा है।"

इसी क्रम में भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष अमित शाह ने हाल ही में कहाः “भारतीय युवा जो एक समय नौकरियाँ तलाशते थे, अब वही नौकरियाँ पैदा करने लगे हैं। “ प्रिय पाठक, जब इस आलेख के संदर्भों की विस्तार से चर्चा करते हुए आगे बढ़ूँ तो आप इन बिंदुओं को ध्यान में रखें। मैं, पूर्व में कई मौकों पर लिख चुका हूँ कि देश में हर माह 10 लाख भारतीय कामकाजी वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं। इसका मतलब कि एक साल में एक करोड़ 20 लाख। इन व्यक्तियों के पास कोई काम नहीं है, यानी बेरोजगार हैं।

इतने विशाल कामकाजी वर्ग के लिए नौकरियाँ निर्मित करना सरकार के लिए संभव नहीं है। लेकिन इनके लिए नौकरियाँ पैदा करने में प्राइवेट सेक्टर का काम आसान करना सरकार के लिए संभव है। ( मैं इसके विस्तार में नहीं जा सकता, क्योंकि यह विषय से भटकाव हो जायेगा। शायद, अन्य समय में इसकी चर्चा कर पाऊँ।)

तालिका-1 पर नजर डालें: इस तालिका का उपयोग मैंने दूसरे पूर्व मौकों पर भी किया है। लेकिन मुझे यहाँ पर इसको फिर से पेश करने की जरूरत है। यह इस आलेख के लिए आवश्यक है।

तालिका-1: Percentage distribution of persons available for 12 months

इस तालिका से हमें क्या जानकारी मिलती है ? पूरे साल नौकरियों की तलाश में लगे व्यक्तियों में से मात्र 60.6 % को ही नौकरी मिल पाती हैं। इसका कुल मतलब यही हुआ कि कामकाजी वर्ग में से हर 100 में से लगभग 40 व्यक्ति पूरे साल बेरोजगार रह गये। ग्रामीण क्षेत्र में लगभग आधे लोग उक्त-अवधि बेरोजगार बैठे रहे। उक्त तालिका भारत की बेरोजगारी की सच्ची तस्वीर पेश करती है। वास्तव में, बेरोजगारी की समस्या नहीं है-बल्कि समस्या इस बात की है या तो नियमित नहीं या कामकाजी व्यक्ति की क्षमता के अनुसार नहीं है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इसका समाधान यह बताते हैं कि भारतीय युवा आत्म-निर्भर हों और स्व-रोजगार करें। यह काफी जबरदस्त आइडिया नजर आता है। लेकिन यह सिर्फ चीजों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश करने से अधिक कुछ नहीं है। इस पहलू से उपलब्ध आँकड़ों पर नजर डालते हैं : - Fifth Annual Employment-Unemployment Survey, 2016 में लिखा है: “अखिल भारतीय स्तर पर 46.6 % कर्मचारी स्वरोजगारी थे.... 32.8% कैजुअल कर्मचारी थे। केवल 17 % कर्मचारी नियमित वेतन /मजदूरी पा रहे थे। बाकी 3.7% ठेके पर काम कर रहे थे। “

दरअसल, यहाँ पर गौरतलब बात यह है कि भारत के कामकाजी वर्ग का लगभग आधा हिस्सा पहले से ही स्व-रोजगार कर रहा है। लेकिन यह भी है कि नियमित नौकरियाँ करने वालों की तुलना में वे अच्छा नहीं कर रहे हैं। तालिका-2 पर नजर डालें:-

तालिका-2: Self-employed/Regular wage salaried/Contract/Casual Workers according to Average Monthly Earnings (in %)

तालिका-2 से हमें किस बात का पता चलता है?

यह स्पष्ट करता है कि स्व-रोजगार, नियमित वैतन प्रदान करनेवाली नौकरी जैसा अच्छी आय देनेवाला नहीं है। तालिक में दर्शाता गया है कि स्व-रोजगार करने वालों का लगभग दो-तिहाई हिस्सा 7,500 रुपये महीना कमाता है। लेकिन एक वैतनिक व्यक्ति इससे 38% से अधिक कमा लेता है। साफ है, एक नियमित नौकरीपेशा व्यक्ति औसतन काफी अधिक पैसा कमा लेता है।

यही नहीं, केवल 4% स्व-रोजगार ऐसे हैं, जो मासिक तौर पर 20,000 या इससे अधिक रुपये कमाते हैं।

तालिका-1 और तालिका-2 से स्पष्ट है कि भारत का युवा पहले से ही स्व-रोजगार को अपना रहा है। इस तरह यह प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के स्व-रोजगार संबंधी आइडिया में कुछ भी नया नहीं है। यह कामका नहीं साबित हो रहा है।

अभिजीत बनर्जी और इस्थर डफ्लो Poor Economics में लिखते हैः “गरीबों के बीच कारोबारी स्वामियों की संख्या बहुत ही शानदार है। आखिरकार, हर चीज बेचारे उद्यमियों के खिलाफ जाती दिखती हैः उनके पास अपनी खुद की कम पूंजी (लगभग परिभाषा के साथ) और ... औपचारिक बीमा, बैंकों और सस्ती वित्त के अन्य स्रोतों तक उनकी पहुँच बहुत कम है ...। औसतन गरीब और लगभग गरीब कारोबारी की एक अन्य विशेषता यह है कि सामान्य तौर पर वे ज्यादा पैसा नहीं बना रहे हैं। "

मुद्दे की बात यहाँ पर यह है कि कामकाजी वर्ग का एक बड़ा हिस्सा अपनी पसंद से स्व-रोजगारी नहीं है, वह स्वरोजगारी इसलिए है कि उसके पास कोई विकल्प नहीं है। अभिजीत बनर्जी और इस्थर डफ्लो इसे ‘अनिच्छुक उद्यमी’ कहते हैं। यह वाक्यांश हालात को बखूबी परिभाषित करता है।

अनिच्छुक उद्यमियों के अलावा कामकाजी वर्ग का 30 प्रतिशत से अधिक हिस्सा यदाकदा काम कर पाने वाले श्रमिकों का है। ये दिहाड़ी काम करते हैं। यह हमें बताता है कि कोई भी बेरोजगार रहना झेल नहीं सकता है।

इस तरह देखते हैं कि रोजगार की कमी नहीं है, बल्कि पर्याप्त आय देने वाले रोजगार की कमी है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने नयी पहल करने की बात कही है। इस पर विचार करते हैं। इस पहलू से Economic Survey of 2016-2017 के वाल्यूम-2 में लिखा हैः "शहरी गरीबों के लिए, दीनदयाल अंत्योदय योजना- राष्ट्रीय शहरी जीवन-वृत्ति मिशन (DAY-NULM ), ब्याज की सब्सिडी वाले दर पर ऋण प्रदान कर स्व-रोजगार उद्यमों की स्थापना के माध्यम से स्व-रोजगार के अवसरों के लिए कौशल प्रशिक्षण प्रदान करता है। । सरकार ने अब 790 शहरों से देश में 4,041 वैधानिक कस्बों तक का DAY-NULM का दायरा बढ़ाया है। अभी तक, 8,37,764 लाभार्थियों को कौशल-प्रशिक्षित किया गया है [और] 4,27,470 लोगों को रोजगार दिया गया है।"

भारत सरकार के कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की 2016-2017 की वार्षिक रिपोर्ट में वित्तीय वर्ष के दौरान विभिन्न मंत्रालयों द्वारा प्रशिक्षित लोगों की संख्या के बारे में अनुमान लगाया है। अप्रैल से दिसंबर 2016 की अवधि में करीब 1 9 .5 9 लाख लोगों को प्रशिक्षित किया गया। वार्षिक लक्ष्य 99.35 लाख का था। इसको देखते हुए कहा जा सकता है कि निर्धारित लक्ष्य और हासिल लक्ष्य के बीच भारी अंतर है।

इस पर गौर करने का दूसरा तरीका यह है कि 1.2 करोड़ भारतीय हर साल कर्मचारियों की संख्या (कामकाजी वर्ग ) में प्रवेश कर रहे हैं। उनके पास लगभग पांच साल की औसत शिक्षा होती है (यानी वे प्राथमिक विद्यालय पास कर चुके हैं)। इस आधार पर पाते हैं कि उनके पास वास्तव में किसी भी काम का कौशल नहीं है। अधिक-से-अधि वे जोड़-घटा सकते हैं, और संभवत: थोड़ा पढ़ सकते हैं।

इसलिए, उन्हें प्रशिक्षित होने की आवश्यकता है या फिर कम कौशल की पर्याप्त नौकरियों की जरूरत होगी।

रियल इस्टेट और भवन-निर्माण जैसे दो सेक्टर इस तरह की नौकरियों का निर्माण कर सकते हैं, लेकिन ये सेक्टर खुद गड़बड़झाले में हैं। यह गड़बड़झाला भी दूर किया जा सकता है।

लेकिन ऐसा करने के लिए कि काले धन पर कुछ गंभीर निर्णय लेने की आवश्यकता है। इसमें राज्य सरकार के स्तर पर राजनैतिक वित्तपोषण को साफ करना और भूमि उपयोग के नियमों में बदलाव शामिल है।

निम्न ग्राफिक ( चित्र-1) पर एक नजर डालें। यह कौशल विकास और उद्यमिता मंत्रालय की वार्षिक रोपर्ट में दिया गया है।

चित्र-1 :

चित्र-1 हमें बहुत स्पष्ट रूप से बताता है कि लोगों को प्रशिक्षित करने के लिए जरूरी व्यापक सुविधायें नहीं हैं। इसके कामकाजी वर्ग में प्रवेश करने वाले व्यक्तियों का एक बड़ा हिस्सा निम्न और स्व-रोजगार के काम की श्रेणी में शामिल हो जायेगा-ऐसा पहले भी हो चुका है। या फिर फिर लोग कृषि कार्य में लगे रहेंगे।

अपने भाषण में प्रधान मंत्री मोदी ने आगे कहा: "पिछले तीन वर्षों में, 'प्रधानमंत्री मुद्रा योजना' ने लाखों लाख युवाओं को आत्म-निर्भर बना दिया है। ऐसा नहीं है कि एक युवा एक, दो या तीन लोगों को रोजगार दे रहा है।"

आइए इस बयान को कुछ विस्तार से देखें। अप्रैल 2015 से 11 अगस्त 2017 के बीच, सरकार ने मुद्रा (माइक्रो यूनिट्स डेवलपमेंट एंड रीफिनेंस एजेंसी बैंक) को 3.63 लाख करोड़ रुपये के 8.7 करोड़ व्यक्तियों के लिए ऋण दिया था। यह लगभग 41,724 रुपये के औसत ऋण के लिए काम करता है अब तक कोई सबूत नहीं है कि यह काम कर रहा है या नहीं। क्या 42,000 रुपये से कम का ऋण एक, दो या तीन लोगों को रोजगार दे सकता है, यह एक सवाल है जो अब तक उत्तर नहीं दिया गया है।

एनडीटीवी ने मुद्रा के सीईओ से हाल ही में पूछा था कि मुद्रा-ऋण ने कितनी नौकरियाँ पैदी की हैं। उन्होंने कहा: "हम अभी तक उस पर एक आकलन नहीं कर रहे हैं ... हमारे पास अभी कोई संख्या नहीं है, लेकिन मैं समझता हूं कि ‘नीति आयोग’ आँकड़े एकत्रित करने का प्रयास कर रहा है। "

यह देखते हुए कहा जा सकता है कि प्रधानमंत्री जो विश्वास जता रहे हैं कि मुद्रा-ऋण लाखों युवाओं को आत्म-निर्भर बना रहा है, वैसा कुछ भी नहीं है। हालांकि उनका विश्वास जताने का हक है। कुछ आँकड़ों पर नजर डालने के बाद ही मैं इस निष्कर्ष पर पहुँचूँगा कि मुद्रा-ऋण भारत में नौकरियों के संकट का हल हैं।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

Comments