भारतःरियल-इस्टेट,बैंक,बेरोजगारी और नेताओं का एक मकड़जाल

प्रिय पाठक,

यह कॉलम मूल रूप से 21 अप्रैल, 2017 के ‘द विवेक कौल लेटर’ संस्करण में प्रकाशित हुआ था। मुझे लगता है कि किसी के लिए यह समझना काफी महत्वपूर्ण है कि भारत की आर्थिक समस्याएँ किस तरह एक-दूसरे के साथ जुड़ी हुई हैं। मैं इस स्तंभ में इसे स्पष्ट करने की कोशिश करूँगा। (Here is how you can subscribe to my Letter. )

आज तक लिखे सभी लेटरों में हमने बाकायदा डाटा यानी आँकड़ों को सामने रखते हुए और तर्कसम्मत ढंग से अपनी बात रखने की कोशिश की है। इस पृष्ठभूमि में देखें तो आज का यह लेटर पिछले लेटरों से बिलकुल अलग है। इस लेटर का आइडिया एक प्रिय मित्र से यूँ ही शुरू हुई एक बातचीत से प्राप्त हुआ है। मेरा यह मित्र मुंबई फिल्म इंडस्ट्री में एक लेखक के रूप में काम करता है।

प्रिय पाठक, आमतौर पर, जब मैं आपके लिए लिखता हूं, तो किसी एक विषय को समझाने के लिए आँकड़ों, ग्राफों और तालिकाओं के साथ उसके पूरे विस्तार में जाता हूँ। इसमें दो राय नहीं कि भारतीय अर्थ-व्यवस्था से संबंधित किसी समस्या की अच्छी समझ रखना अच्छी बात है, लेकिन इसके साथ ही किसी विषय (समस्या आदि) के ‘बिग पक्चर’ यानी उसके हर पहलू की समझ और उसके व्यापक असर की जानकारी भी होनी काफी महत्वपूर्ण होती है।

जैसी की एक कहावत है कि किसी मुद्दे के बहुत विस्तार में जाने से मूल मुद्दा ही गायब हो जाता है। इस आलेख में हमने जिस विषय को लिया है, उसकी व्याख्या करते समय वह स्थिति न आये इसलिए मैं सबसे बड़ी समस्याओं पर ही ध्यान केंद्रित करने की कोशिश करूँगा। ये वे समस्याएँ होंगी जिनकी वजह से आनेवाले सालों में भारतीय अर्थ-व्यवस्था के विकास में सबसे बड़ी रुकावट साबित हो सकती हैं। मैं यह भी बताऊँगा कि किस तरह ये समस्याएं एक-दूसरे से जुड़ी हुई हैं। भारतीय अर्थ-व्यवस्था की अधिकृत विकास दर भले ही 7-8 % हो पर समस्याएं बाधा खड़ी किये रह सकती हैं।

मैंने इस लेटर को अपने मित्र के साथ बातचीत के रूप में लिखा है । बेशक, यह एक काल्पनिक बातचीत है- असल बातचीत किसी आलेख की तरह सुगठित और सुव्यवस्थित नहीं हो सकती है। फिर भी, एक आदर्श दुनिया में अपनी इसी तरह की बातचीत के बारे में सोचता हूँ। मेरा मानना है कि इस तरह मैं भारतीय आर्थिक हालात के बारे में अपने मित्र को समझा पाने में समर्थ हुआ हूँ-यानी मैं अपने उद्देश्य में सफल रहा हूँ।

सिलसिला इस तरह शुरू होता है।

मुंबई के एक अनूठे उप-नगर, वर्सोवा की गलियों में चहलकदमी किये मुझे कई साल बीत चुके हैं। यह सितारों के साथ भारतीय फिल्म उद्योग के धनाढ्य स्ट्रगलरों का भी बसेरा है ( गरीब स्ट्रगलरों का ठिकाना ओशिवारा है )। एक काफी शॉप से 15 मिनट की दूरी पर अपने मित्र के आशियाने पर पहुँचता हूँ। जैसे ही वह दरवाजा खोलता है, उसकी दो बिल्लियों में एक मुझ पर झपट पड़ती है। फिलहाल, मुझे बिल्ली का नाम याद नहीं है। मेरा मित्र कहता है, "वह सिर्फ दोस्ताना होने की कोशिश कर रही है, सर!" एक समय तो बिल्लियों का डर मुझे बीमार-सा कर देता था। लेकिन बिल्लियों से भरी एक इमारत में रहने की आदत की वजह से वह डर अब जाता रहा। मैं अंदर गया और सोफे पर आराम से बैठ गया। दोस्त की ब्लैक काफी ने मुझे और राहत दी। किसी भी सामान्य भारतीय की तरह मुझे हल्की शक्कर वाली काफी अच्छी लगती है ( हालांकि मैं एकदम शक्कर-रहित चाय के साथ बिलकुल सहज महसूस करता हूँ।) । हालाँकि, मेरे मित्र को यह थोड़ा अजीब लगा। "ब्लैक काफी में भला चीनी कौल डालता है?" उसने जोश के साथ पूछा। आखिरकार मुझे उसकी दी हुई बगैर शक्कर वाली ब्लैक कॉफी से ही काम चलाना पड़ा। बगैर शक्कर का पेय पीना आदत की बात होती है। यहाँ, तो ऐसा ही हो गया कि जो आपको कुछ पसंद नहीं है, आप वह करने की कोशिश कर रहे हैं ।

फिल्मों और राजनीति के बारे में घंटा भर बात करने के बाद, हम पूरी तरह से भारतीय अर्थ-व्यवस्था के बारे में बात करने लगे। हालाँकि, जब मित्रों के साथ रहता हूँ, तो जानबूझकर इन विषयों को उठाने से बचता हूँ।

और ईमानदारी से कहूँ, तो मुझे याद नहीं कि मैं कब हर माह 10 लाख भारतीयों के कामकाजी- वर्ग में शामिल होने, भारत के जनसांख्यिकी-बोनस जैसे मुद्दों पर बात करने लगा।

मैंने कहा, “ तुम्हें मालूम है, हर माह 10 लाख भारतीय कामकाजी-वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं।”

                “इसका मतलब कि साल में 1.2 करोड़, जो कि आस्ट्रेलिया की आधी जनसंख्या है।”

इस पर मेरे मित्र ने कहा, “ इसमें बड़ी बात क्या है ? उम्र होने पर लोगों को काम करने की जरूरत पड़ती है और वे कामकाजी वर्ग का हिस्सा हो जाते हैं।”

“मैंने कहा, सच है मगर कामकाजी वर्ग में शामिल होते ही लोगों को काम की तलाश होती है, लेकिन इस समय वह काम है नहीं।”

मेरे मित्र ने थोड़ा नाटकीय अंदाज में कहा, “ अच्छा, नौकरी। तुम्हें मालूम है, कुछ समय पहले तक नौकरी करता था- एक अखबार में।

मैंन कहा, “ हाँ, तुम करते थे। “ इसी प्रकार देश में हर साल 1.2 करोड़ भारतीय कामकाजी-वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं। लेकिन इसकी तुलना में नौकरियों का निर्माण नहीं हो रहा है। यह एक बड़ी समस्या है।“

" लेकिन मुझे याद है, पिछले साल मैंने कहीं पढ़ा था कि भारत की बेरोजगारी की दर सिर्फ 5 % है।"

मैंने जवाब दिया "हां," ।

मेरे मित्र ने पूछा, "आप इस समस्या से कैसे निपटेंगे कि कामकाजी-वर्ग में प्रवेश करने वालों को नौकरी नहीं मिल रही है? " ।

"ओह, यही कारण है कि बेरोजगारी की गणना की जाती है। इसके दो तरीके हैः पद्धति-1, इसके अंतर्गत जो भी व्यक्ति 183 दिनों के लिए नियोजित होता है, यानी नौकरी करता है, उसे नियोजित माना जाता है। इस पद्धति के अनुसार बेरोजगारी की दर 5 प्रतिशत है । पद्धित-2, जो भी पिछले 30 दिनों के लिए नियोजित किया गया है, उसे नियोजित माना जाता है। इस पद्धति के अनुसार बेरोजगारी की दर 3.7 प्रतिशत कम है। इस प्रकार पाते हैं कि आपके वर्ष की एक बड़ी अवधि में बेरोजगार होने पर भी आपको नियोजित माना जा सकता है। "

"आह, ये क्लासिक आंकड़े बिकिनी पॉइंट की तरह हैं ..."

"हाँ, दिलचस्प बात यह है कि पूरे साल के लिए नौकरी तलाशने वाले केवल 60 फीसदी भारतीयों को ही नौकरी मिल पाती है। यह शहरी भारतीयों की स्थिति है। जबकि ग्रामीण भारत में करीब 52 % को ही साल भर के लिए नौकरी मिल पाती है। इससे आपको भारत में बेरोजगारी की वास्तविक स्थिति का पता चलता है- न कि बेरोजगारी की दर, जो स्पष्ट रूप से नहीं है। "

" भारत में बेरोजगारी की वास्तविक स्थिति क्या है । इसको कोई अनुमान लगाया गया है? " " ओईसीडी इकॉनमिक सर्वे इंडिया के अनुसार 15 से 29 की उम्र के बीच के भारतीय युवाओं में बेरोजगारी की दर 30 % से अधिक है। ये युवा बेरोजगार है। ये न तो पढ़ रहे हैं और न ही कोई प्रशिक्षण ले रहे हैं।“ मैंने जवाब दिया।

" भारत एक कृषि देश देश है। किसानों की दशा अच्छी नहीं है। ऐसा क्यों है ? " मेरे दोस्त ने वही घिसा-पिटा सवाल किया।

" पीढ़ी-दर-पीढ़ी खेतों के आकार छोटे होते गये हैं। आप जानते हैं कि वर्ष 1970-1971 में जहाँ खेतों का औसत आकार 2.82 हेक्टेयर (एक हेक्टेयर = 2.5 एकड़) था और वही 2010-2011 तक आते-आते 1.16 हेक्टेयर हो गया। नवीनतम आँकड़े 2010-2011 तक के हैं। तब से खेतों का आकार और भी भी छोटा हुआ होगा। " मैंने समझाया

"आपके इतने सारे आँकड़े कैसे याद रखते हैं," मेरे दोस्त ने पूछा।

"आप भूल जाते हैं यह एक अर्द्ध-काल्पनिक वार्तालाप है मेरे दोस्त " मैंने जवाब दिया।

"और हम दोनों लेखक के हाथों गढ़े चरित्र हैं। और यहाँ पर वह लेखक मैं खुद हूँ। "

विषय पर फिर वापस आते हुए मेरे मित्र ने कहा , “ तो कुल मिलाकर हम यह समझें कि खेतीबारी अब पहले जैसी करने लायक नहीं रही। इसलिए लोगों को दूसरी तरह के काम-धन्धों की जरूरत होती है।”

“हाँ, बिलकुल सही कहा।”

"दिलचस्प है कि इससे यह बात स्पष्ट होती है कि हरियाणा में जाट, गुजरात में पटेल, महाराष्ट्र में मराठा और आंध्र प्रदेश में कपूस समेत देश भर की कई जमीन-की-मालिक जातियाँ सरकारी नौकरियों में आरक्षण चाहती हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी खेतों के आकार छोटे होते जाने के कारण खेती पहले जैसी काम-लायक नहीं रही। इसलिए खेती करनेवाले सरकारी नौकरियों की माँग करने लगे हैं।" मेरे मित्र ने पूछा , "तो फिर, कामकाजी वर्ग में शामिल हो रहे अधिकतर व्यक्तियों को किस तरह की नौकरियां अच्छी रहेंगी।”

“यदि मैं एक अर्थशास्त्री की तरह बात करूँ, तो कम-हुनर की माँग करनेवाली नौकरियाँ बेहतर होंगी, और भारत इस मामले में स्वाभाविक है कि तुलनात्मक दृष्टि से लाभ की स्थिति में होगा।”

" अरे, मुझे पता है कि तुमने कभी अर्थशास्त्र की किताब को हाथ तक नहीं लगाया। सरल भाषा में बात करने की कोशिश करो। "

मुझसे जितना हो सका सरल शब्दों में बोलते हुए कहा, " विगत सालों में हमारी स्कूली शिक्षा-प्रणाली पूरी तरह से अस्त-व्यस्त हो गयी है। ज्ञानार्जन के नतीजों में नाटकीय रूप से गिरावट आ रही है।"

मैंने स्पष्ट किया, “ प्रथम शिक्षा फाउंडेशन के माधव चह्वाण ने अनुमान लगाते हैं कि 2015 तक दस साल की अवधि में, 10 करोड़ बच्चों ने प्राथमिक पढ़ाई पूरी की थी- लेकिन वे पढ़ने और गणित संबंधी मूल योग्यता भी हासिल नहीं कर पाये थे। इस वजह से अनेक लोग किसी तरह का कार्यालयी काम, यहाँ तक कि कम-हुनर वाले काम भी करने के काबिल नहीं होते, इस तरह के कामों में भी पढ़ने, लिखने या थोड़ी-बहुत गणित की जानकारी जरूरी होती है।”

“ऐसे हालात में तो कोई संभावना ही नहीं बचती- सिर्फ निम्न श्रेणी की मजदूरी वाली नौकरियाँ ही मिल सकती हैं।”

“यही वजह है कि जब लोग खेती का काम छोड़ते हैं तो सबसे पहले निचले स्तर की कंस्ट्रक्शन नौकरियाँ करते हैं।”

“लेकिन भारत में ऐसा देखने को क्यों नहीं रहा है?”

“क्योंकि अपेक्षा के अनुसार देश में कंस्ट्रक्शन के काम नहीं हो रहे हैं।”

“मतलब?”

“कंपनियाँ अपना विस्तार नहीं कर रही हैं; क्योंकि उन्होंने बैंकों से बहुत-सा पैसा उधार लिया हुआ है और बैंकों का यह कर्ज चुकाने में ये कठिनाई का सामना कर रही हैं। नतीजतन कंस्ट्रक्शन का काम कम हो रहा है। वास्तव में, कंपनियों द्वारा ली गयी इन उधारियों ने भारत सरकार के स्वामित्व वाले सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की भी हालत पतली करके रख दी है। अब ये बैंक भी कार्पोरेट यानी बड़ी कंपनियों को कर्ज देने के मूड में नहीं हैं।”

" कंस्ट्रक्शन सिर्फ कार्पोरेट जगत नहीं है। इस सिलसिले में सरकार क्या कर रही है। भारत में भौतिक बुनियादी ढाँचा निहायत खराब हालत में है। इस क्षेत्र में निर्माण और सुधार सिर्फ सरकार ही ला सकती है। ”

" हाँ आप सही कह रहे हैं। सरकार भौतिक बुनियादी ढांचे के विकास पर पैसा खर्च कर रही है और इससे कंस्ट्रक्शन क्षेत्र में जरूर नौकरियाँ पैदा होती हैं। लेकिन सरकार अपनी वित्तीय सेहत को ध्यान में रखते हुए पैसा खर्च कर सकती है। इसलिए भौतिक बुनियादी ढाँचे के विकास में पैसा लगाने की उसकी अपनी सीमाएँ हैं।"

“रियल-इस्टेट (जमीन-जायदाद) के बारे में क्या स्थिति है?” यह एक ऐसा सवाल है, जिसके बारे में अपने मित्र से पूछे जाने का इंतजार कर रहा था। “यहाँ कंस्ट्रक्शन (निर्माण कार्य) भी होता है।” “हाँ, रियल इस्टेट एक ऐसा सेक्टर है, जो वास्तव में कम-हुनर वाले कामगारों के लिए नौकरियाँ पैदा कर सकता है।”

“फिर समस्या क्या है?”

" भारतीय रियल इस्टेट बाजार में सबसे बड़ी हिस्सेदारी देश के 8 सबसे बड़े शहरों की है। इन आठ शहरों के रियल इस्टेट कीमतों की वृद्धि ने अधिकतर आवासों को बहुत महँगा कर दिया है। इस कारण से अधिकतर लोगों की हैसियत इन आवासों को खरीद सकने की नहीं है। वास्तव में हालात ये हो गये हैं कि रियल इस्टेट बिल्डर नयी इमारतें नहीं बना रहे हैं, यही नहीं, उन्हें पहले से निर्मित अपने आवासों को बेचना भी मुश्किल हो रहा है। इस तरह देखते हैं कि कुल मिलाकर चीजें ठहर-सी गयी हैं।"

मेरे मित्र ने कहा, “ असल में देखा जाये तो रियल इस्टेट सेक्टर मरणासन्न अवस्था में है।”

“हाँ, यह शब्द पूरी बात को बयाँ करता है।”

“आखिरकार रियल इस्टेट सेक्टर को पुनर्जीवित करने का उपाय क्या है?” “कीमतों में जबरदस्त गिरावट आये। लेकिन कुछ समय से ऐसा देखने को तो नहीं मिला है। कुछ सालों से कीमतें जहाँ-की-तहाँ अटकी हुई हैं।”

“ऐसा क्यों हो रहा है।?”

"इसके लिए कई कारण हैं," मैंने जवाब दिया।

"अधिकतर भारतीय रीयल-इस्टेट कंपनियाँ राजनीतिज्ञों के अवैध धन को खपाने का जरिया बनी हुई हैं। कंपनियों के मालिक यानी बिल्डर राजनीतिज्ञों को एक निश्चत रिटर्न देने का वादा किये होते हैं। इसलिए वे आवासों की कीमत कम करने में असमर्थ होते हैं। तुम्हारे सवाल का यह एक संभावित जवाब हो सकता है। एक बात यह भी कही जाती रही है कि लंबे समय में चूँकि बिल्डर और राजनेता इतना पैसा बना चुके होते हैं, इसलिए अनबिके पड़े आवासों की लंबी फेहरिश्त को बेचने की उन्हें जल्दी नहीं पड़ी होती। "

“यह बहुत-ही साधारण-सा जवाब है। तुम बात को ज्यादा स्पष्ट करने की कोशिश करो।”

" रियल-इस्टेट में काले धन के प्रवाह को हमें थोड़ा और विस्तार में समझने की जरूरत है। सवाल यह उठता है कि एक बिल्डर कोई फ्लैट या घर बेचते समय भुगतान का एक हिस्सा काले धन यानी नकदी के रूप में क्यों लेता है? मुझे लगता है कि यह समझना बहुत महत्वपूर्ण है। वह नकदी में भुगतान लेता है, क्योंकि उसे नकदी में भुगतान करना पड़ता है। उसे अपने आपूर्तिकर्ताओं ( सप्लायरों) को नकदी में भुगतान करने की जरूरत पड़ती है। लेकिन इससे भी महत्वपूर्ण बात यह है कि इन्हें राजनेताओं और नौकरशाहों को नकद में भुगतान करना होता है। "

“काफी रोचक बात बता रहे हो।”

" राजनेताओं और नौकरशाहों को अपनी जेब में रखे बगैर किसी बिल्डर के लिए रियल-इस्टेट कारोबार में रहना मुश्किल है। इसकी वजह है कि भारत में रियल-इस्टेट के नियम-कानून काफी जटिल होते हैं। राजनेताओं और नौकरशाहों को नकदी में दी गयी रकम बिल्डरों को रियल-इस्टेट के खेल में बने रहने में रामबाण साबित होती है। यह नकदी रकम चेक या NEFT/RTGS/IMPS आदि में दी नहीं जा सकती है। इनका भुगतान नकदी में ही हो सकता है।”

“सही कहा।”

"और यह नकदी फ्लैट या घर के खरीदार से ही आ सकती है। इसलिए, वास्तविक खरीदार हमेशा जब कोई घर खरीदता है, अपने सफ़ेद धन को काले धन में बदल देता है। और फिर ऐसे निवेशक भी होते हैं, जो अपने काले धन का इस्तेमाल करना चाहते हैं। उनके लिए रियल-इस्टेट निवेश का सबसे अच्छा तरीका है। और यह कालाधन भी रियल-इस्टेट की कीमतों में गिरावट नहीं आने देता है। "

“ठीक कहा। समझ में आने वाली बात है।”

" राजनेता नकदी रूप में रिश्वत माँगने के लिए तो जाने ही जाते हैं, इसके अलावा चुनाव लड़ने के लिए भी उन्हें नकदी की जरूरत होती है। विगत वर्षों में भारत में चुनाव लड़ना खासा महँगा हो गया है। यहाँ तक कि एक बड़े शहर में नगरपालिका के चुनाव में एक गंभीर उम्मीदवार को निर्वाचित ने हो पाने के जोखिम के साथ, एक या दो करोड़ खर्च करना पड़ता है। इतना सारा पैसा कहाँ से आता है- रियल इस्टेट से। इसी से पता चलता है कि आखिल भारतीय स्तर पर राज्यों में रियल इस्टेट के नियम-कानून इतने घुमावदार क्यों हैं। इन्हीं का फायदा उठाते हुए राज्य स्तर के राजनेता हर नये रियल-इस्टेट प्रोजेक्ट में अपना हिस्सा माँगते हैं। इससे यह भी स्पष्ट होता है कि रियल-इस्टेट ‘जीएसटी’ के दायरे में क्यों नहीं लाया गया है। "

“अच्छा।”

"तो, यह मुद्दा यह है कि जब तक भारत में चुनावी वित्तपोषण (फाइनेंसिंग) प्रणाली स्पष्ट नहीं हो जाती है, रियल-इस्टेट क्षेत्र में व्याप्त गड़बड़झाला बना रहेगा, और तब तक कंस्ट्रक्शन सेक्टर में गति नहीं आयेगी। जब तक, कंस्ट्रक्शन सेक्टर गति नहीं पकड़ता, तो यहाँ पर नौकरियों का निर्माण नहीं हो पायेगा। जब तक यहाँ पर नौकरियों का निर्माण नहीं होगा, तब तक हर माह कामकाजी वर्ग में शामिल हो रहे 10 लाख भारतीय बेरोजगार बने रहेंगे। परिणामस्वरूप यह तथाकथित भारत का जनसांख्यिकी-बोनस , उसके लिए जनसांख्यिकी-विनाश साबित हो सकता है।"

“तुमने तो काफी अच्छी और रोचक जानकारी दी।” मेरे दोस्त ने कहा।

“रोचक थी, लेकिन हम जिस ‘बिग पिक्चर’ की बात कर रहे थे, वह थोड़ा काम-चलाऊ रह गया।”

“ फिर पूरी बात को हम कैसे जान और समझ सकते हैं ?”

“इसके लिए तुम मेरी नयी किताब India’s Big Government—The Intrusive State and How It is Hurting Us पढ़ सकते हो।” मैंने अपने दोस्त से कहा।

अब मेरे सामने कबाब हाजिर था और मेरा जायका लेने का समय हो गया था। शुभ कामनाएँ।

विवेक कौल

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल’स डॉयरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक है। विवेक कौल एक लेखक हैं । वे पूर्व में ‘डेली न्यूज एंड अनैलिसिस’ (डीएनए) और ‘द इकोनॉमिक्स टॉइम्स’ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। वे ‘द इजी मनी ट्रिलॉजी’ के लेखक हैं। ट्रिलॉजी की नवीनतम किताब ‘इजी मनीः द ग्रेटेस्ट पोंजी स्कीम एवर एंड हाउ इट इज सेट टू डिस्ट्रॉय द ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम’ मार्च 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब एमजॉन की बेस्ट सेलर साबित हुई । विवेक कौल ने ‘द टॉइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द हिंदू’, ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’, ‘बिजनेस वर्ल्ड’, ‘बिजनेस टुडे’, ‘इंडिया टुडे’, ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’, ‘फोर्ब्स इंडिया’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘द एशियन एज’, ‘म्युचुअल फण्ड इंनसाइट’, ‘वेल्द इनसाइट’, ‘स्वराज्य’, ‘बंगलौर मिरर’ और अन्य के लिए भी लिखा है। भारतः रियल-इस्टेट, बैंक, बेरोजगारी और राजनेताओं का एक मकड़जाल

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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