भारतीय फिर चले ‘नकदी’ की ओर


अभी कुछ ही समय पहले की बात है । नकदी ट्रॉन्जैक्शन यानी लेन-देन के परंपरागत तौर-तरीकों की ओर भारतीयों के फिर से मुड़ने के बारे में मैंने चर्चा की थी। इससे संबंधित प्रमाण भी पेश किये थे। निष्कर्ष देते हुए मैंने यह भी कहा था – “पर्याप्त आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं, जिनके आधार पर कहा जा सके कि भारतीयों ने नकदी लेन-देन की पुरानी प्रणाली को फिर से पूरी तरह अपना ली है। लेकिन उपलब्ध आँकड़े जरूर संकेत करते हैं कि वे उस तरफ मुड़ने लगते हैं। ” इस आलेख में अलग तरह के आँकड़ों के आधार पर मैं इसी विषय पर अपनी बात रख रहा हूँ। 10 मार्च 2017 को भारतीय रिजर्व बैंक ने Macroeconomic Impact of Demonetisation- A Preliminary Assessment शीर्षक से एक डॉक्यूमेंट जारी किया। इसमें दूसरी बातों के अलावा नोटबंदी के उपरांत भुगतान के लिए विभिन्न प्रकार के डिजिटल तरीकों के उपयोग पर चर्चा की गयी है। डॉक्यूमेंट में उल्लेख हैः “नोटबंदी की घोषणा के बाद शुरुआती सप्ताहों में डिजिटल एक्टिविटी का स्तर कम था, क्योंकि लोग एसबीएन (specified bank note निर्दिष्ट बैंक नोट) जमा करने/बदलने में व्यस्त थे। हालाँकि दिसंबर 2016 में रीमनिटाइजेशन के आगे बढ़ने के साथ, डिजिटल पेमेंट एक्टिविटी भी बढ़ी।“

[ रीमनिटाइजेशन- नोटों की छपाई और आर्थिक प्रणाली में इनको डालने का काम ]

डाटा कैसा दिखता है ? पहले तालिका-1 पर नजर डालें। इस तालिका में भुगतान के लिए विभिन्न तरीकों से किये गये डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन की कुल संख्या दी गयी है।

Table 1
Volume (in Crore) Nov-16 Dec-16 Jan-17 Feb-17
National Electronic Funds Transfer 12.30 16.60 16.40 14.80
Cheque Truncation System 8.70 13.00 11.80 10.00
Immediate Payment Service 3.60 5.30 6.20 6.00
Unified Payment Interface 0.03 0.20 0.42 0.42
Unstructured Supplementary Service Data 0.00 0.01 0.03 0.02
Debit and Credit Card Usage at Point of Sales 20.60 31.10 26.60 21.20
Prepaid Payment Instrument 5.90 8.80 8.70 7.80
Total 51.13 75.01 70.15 60.24

#Source: Reserve Bank of India

तालिका-1 से हमें पता चलता है कि नोटबंदी के पश्चात डिजिटल भुगतान बढ़ गया और दिसंबर 2016 में अपनी चोटी पर पहुँच गया। अब आंकड़ा-1 पर ध्यान दें। इसमें मूलरूप से ट्रॉन्जैक्शन की कुल संख्या दर्शायी गयी है।

Figure 1

आँकड़ा-1 से हमें पता चलता है कि नोटबंदी के पश्चात नवंबर 2016 की तुलना में दिसंबर 2016 में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन की कुल संख्या में लगभग 50 % की वृद्धि हुई, लेकिन उसके बाद से इसमें गिरावट हुई है। ट्रॉन्जैक्शन की संख्या ( अर्थात ट्रॉन्जैक्शन का परिमाण ) जो दिसंबर में लगभग करोड़ की चोटी पर थी, वह फरवरी 2017 में 60 करोड़ से थोड़ी-सी अधिक रही। अब तालिका-2 को देखें। इस तालिका में मूलरूप से डिजिटल भुगतान के विभिन्न तरीकों से किये गये ट्रॉन्जैक्शन की कुल वैल्यू को दर्शाया गया है।

Table 2
Value (in Rs billion) Nov-16 Dec-16 Jan-17 Feb-17
National Electronic Funds Transfer 8,808 11,538 11,355 10,878
Cheque Truncation System 5,419 6,812 6,618 5,994
Immediate Payment Service 325 432 491 482
Unified Payment Interface 0.9 7 16.6 19
Unstructured Supplementary Service Data 0.007 0.104 0.382 0.357
Debit and Credit Card at POS 352 522 481 391
Prepaid Payment Instrument 59 88 87 78
Total 14,964 19,399 19,049 17,842

Source: Reserve Bank of India

यह तालिका यह भी दर्शाती है कि नवंबर 2016 की तुलना में दिसंबर 2016 में डिजिटल टॉन्जैक्शन में वृद्धि हुई। इसका कुल मतलब यही है कि 500 और 1,000 रुपये के नोट सर्क्युलेशन में बहुत कम रह गये थे, इसके कारण लोगों ने भुगतान के लिए ट्रॉन्जैक्शन का डिजिटल तरीका अपनाया। अब भुगतान के लिए डिजिटल मोड के उपयोग में कमी आयी है।

दिसंबर 2016 में जहाँ लगभग 75 करोड़ ट्रॉन्जैक्शन हुआ, वहीं फरवरी में 60 करोड़, मतलब ट्रान्जैक्शन की कुल संख्या में 20 % की गिरावट आयी।

रिजर्व बैंक के डॉक्यूमेंट में जिक्र हैः “नोटबंदी के कारण नवंबर और दिसंबर 2016 में डिजिटल भुगतान को गति मिली। लेकिन क्रमशः रीमनिटाइजेशन के काऱण जैसे-जैसे नोटों की उपलब्धता में बढ़ोतरी हुई, फरवरी 2017 में डिजिटल भुगतान की वृद्धि पर विपरीत असर पड़ा।“ दरअसल भारतीय रिजर्व बैंक का यह कहने का खुशफहमी भरा अंदाज है कि भारतीय फिर से नकदी का उपयोग करने के तरीके की तरफ बढ़ रहे हैं

नोटबंदी का एक उद्देश्य आर्थिक क्रिया-कलाप का बड़ा हिस्सा डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन द्वारा सुनिश्चित करना था अर्थात लोग आर्थिक ट्रान्जैक्शन में भुगतान के लिए नकदी की जगह डिजिटल तरीका अपनायें। इस पहलू से शुरुआती साक्ष्य बहुत उत्साहवर्द्धक नहीं हैं। इसके बावजूद, मेरा मानना है कि अंतिम निष्कर्ष पर पहुँचने के लिए और डाटा की जरूरत है। तभी हम कह सकते हैं कि भारतीय फिर से लेने-देन में नकदी का तौर-तरीका अपनाने की तरफ बढ़ रहे हैं। मौजूदा समय में वे इसी तरह का संकेत दे रहे हैं।

सवाल उठता है कि क्या कुछ और किया जाये, जिससे लोग डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन की तरफ जाने को प्रेरित हों। रिजर्व बैंक के डॉक्यूमेंट में कहा गया हैः “ डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का प्रयोग बढ़े, इसके लिए और प्रयास किये जाने की बहुत जरूरत है, जैसे कि (1) डिजिटलकरण को प्रोत्साहित करने के लिए निरंतर प्रयास (2) भुगतान प्रौद्योगिकी के विस्तार में बाधाओं को दूर करना (3) व्यवहार संबंधी बदलाव लाने के लिए नये उपयोगकर्ताओं को दायरे में लाना और (4) एक मजबूत और आसानी से बढ़ाये जाने लायक भुगतान पारिस्थितिकी तंत्र के विकास के लिए एक वातावरण प्रदान करना , जो प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में प्रगति से लाभ होता है। यह निरंतर डिजिटल भुगतान को अपनाने की सुविधा प्रदान करेगा और प्रणाली में नकदी की लागत में कटौती कर देश के लिए पर्याप्त बचत में सहायता करेगा 18; और लेनदेन संबंधी उत्तरदायित्व और निबटने की क्षमता को बढ़ाने में मददगार होगा, जिससे कर से बच निकलने की कोशिशों पर रोक लगेगी।“

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल’स डॉयरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक है। विवेक कौल एक लेखक हैं । वे पूर्व में ‘डेली न्यूज एंड अनैलिसिस’ (डीएनए) और ‘द इकोनॉमिक्स टॉइम्स’ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। वे ‘द इजी मनी ट्रिलॉजी’ के लेखक हैं। ट्रिलॉजी की नवीनतम किताब ‘इजी मनीः द ग्रेटेस्ट पोंजी स्कीम एवर एंड हाउ इट इज सेट टू डिस्ट्रॉय द ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम’ मार्च 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब एमजॉन की बेस्ट सेलर साबित हुई । विवेक कौल ने ‘द टॉइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द हिंदू’, ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’, ‘बिजनेस वर्ल्ड’, ‘बिजनेस टुडे’, ‘इंडिया टुडे’, ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’, ‘फोर्ब्स इंडिया’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘द एशियन एज’, ‘म्युचुअल फण्ड इंनसाइट’, ‘वेल्द इनसाइट’, ‘स्वराज्य’, ‘बंगलौर मिरर’ और अन्य के लिए भी लिखा है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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