डिफॉल्टरों के महासमुद्र में विजय माल्या एक नन्हीं मछली

भारतीय उद्योगपति विजय माल्या के ब्रिटेन से प्रत्यर्पण की प्रक्रिया 18 अप्रैल, 2017 को शुरू हुई। इस प्रक्रिया में माल्या को गिरफ्तार किया गया और बाद में जमानत पर रिहा कर दिया गया।

प्राप्त खबरों से संकेत मिलता है कि भारत सरकार ने इस मुद्दे को उच्चतम स्तर पर ब्रिटिश सरकार के साथ उठाया है । इससे पता चलता है कि माल्या को भारत वापस लाने और उनके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए देश में मौजूदा सत्ता-प्रतिष्ठान के पास एक राजनीतिक इच्छा-शक्ति है। सचमुच में, यह एक बहुत अच्छी बात कही जा सकती है।

मूल विषय पर आते हैं। वास्तव में कॉर्पोरेट डिफाल्टरों और बैंकों के खराब कर्जों के महासमुद्र में माल्या एक बहुत नन्हीं-सी मछली हैं। Moneycontrol वेबसाइट पर छपी एक न्यूज़-रिपोर्ट के अनुसार माल्या पर बैंक और सेवा कर विभाग का लगभग 9,000 करोड़ रुपये बकाया है। इसमें मुख्य ऋण की राशि, ऋण पर ब्याज तथा जुर्मानें शामिल हैं।

अब इसकी तुलना कुल सकल गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) या भारतीय बैंकों के खराब ऋणों से करें। इन ऋणों के कर्जदार डिफाल्टर साबित हुए हैं, और पुनर्भुगतान रोक दिया है। 31 दिसंबर 2016 तक, बैंकों की कुल एनपीए 7 लाख 23,323 करोड़ रुपये थी। माल्या का मूलरूप से जिन सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों पर बकाया है, उन बैकों का कुल एनपीए 6 लाख 46,19 9 करोड़ रुपये था।

यह तुलना स्पष्ट रूप से हमें बताती है कि समग्र एनपीए में माल्या की हिस्सेदारी तो मामूली-सी है। अब कॉर्पोरेट एनपीए पर विशेष रूप से नजर डालते हैं : 31 मार्च 2016 तक, सार्वजनिक क्षेत्र के कुल बैंकों का सकल एनपीए 3 लाख 36,124 करोड़ रुपये या कुल कंपनियों के 11.95 फीसदी के बराबर था। यह वह नवीनतम आँकड़ा है, जो मुझे हासिल हो सका। इस बात के पर्याप्त सबूत हैं कि तब से स्थिति बिगड़ गई है। इसकी तुलना माल्या पर बैंकों के बकाये से करें। तब आपको पता चलता है कि माल्य कॉर्पोरेट डिफाल्टरों के महासागर में एक नन्हीं-सी मछली है।

हालांकि, सरकार को माल्या को भारत वापस लाने में अपना पूरा प्रयास करने की जरूरत है, लेकिन भारत में शांतिपूर्ण ढंग से बैठे अन्य बकायेदारों के पीछे भी पड़ने की जरूरत है। पहली बार ऐसा हुआ है,जैसा कि पहले कभी नहीं हुआ।

तालिका-1 पर नज़र डालें। इस तालिका में सालों से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की गैर- निष्पादित परिसंपत्तियाँ को रिकवरी को दर्शाया गया है।

तालिका 1: पीएसबी के एनपीए विभिन्न चैनलों से बरामद किए गये।


तालिका-1 प्रसन्न करनेवाली तस्वीर नहीं पेश करती। पिछले कुछ वर्षों में गैर-निष्पादित परिसंपत्तियों या खराब ऋणों की वसूली की दर में नाटकीय रूप से गिरावट आई है। 2013-2014 में कुल खराब ऋण 1 लाख 49,149 करोड़ रुपये था। इनमें से 28,052 करोड़ रुपये वसूल किए गए थे। वसूली की दर 18.8 प्रतिशत थी। 2014-2015 में कुल खराब ऋण 2 लाख 26,529 करोड़ रुपये थे। इनमें से 27,849 करोड़ रुपये वसूल किए गये थे। वसूली की दर 12.3 प्रतिशत थी। 2015-2016 में वसूली की दर में गिरावट आई है। कुल खराब ऋण 1,91,464 करोड़ रुपये थे। इनमें से 1 9, 757 करोड़ रुपये वसूल किए गए थे। वसूली की दर 10.3 प्रतिशत रही।

इस प्रकार कुल मिलाकर देखें, तो ऋण की वसूली-दर गिर गयी है। लोक अदालतों को वसूली के एक चैनल के रूप में अनदेखा करने पर कैसी तस्वीर उभरती है, यह देखते हुए कि इसमें शामिल राशि छोटी है। वसूली की दर में सुधार होता है, लेकिन केवल थोड़ा-सा।

2013-2014, 2014-2015 और 2015-2016 में, रिकवरी की दर क्रमशः 20.2 %, 13.5% और 13.6 % है। इस प्रकार देखते हैं कि वसूली की दर थोड़ी बढ़ जाती है, अगर हम लोक अदालतों को वसूली के एक चैनल के रूप में उनके योगदान को ध्यान में नहीं रखते। लेकिन इससे अंतिम निष्कर्ष पर फर्क नहीं पड़ता।

अगर सरकार सचमुच में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में चलने वाली गड़बड़ी को साफ करना चाहती है, तो उसे खराब ऋणों की वसूली की दर में सुधार लाने की कोशिश करनी चाहिए। और यह केवल तभी संभव है यदि बैंक बड़े डिफाल्टरों के साथ ऐसी सख्ती दिखायें, जैसा पहले कभी नहीं दिखाया ।

यह तभी हो सकता, जब डिफाल्टरों के खिलाफ कार्रवाई करने की राजनीतिक इच्छा-शक्ति हो; क्योंकि आखिरकार, सरकारी बैंकों का स्वामित्व सरकार के ही पास है। और अगर सरकार कुछ करना चाहती है, तो भला उसे कौन रोक सकता है। कोई भी बैंक कर्मचारी किसी बड़े कॉर्पोरेट डिफाल्टर के पीछे पड़ कर अपने कैरियर को जोखिम में नहीं डालना चाहता है- आखिरकार उसको यही पता चलेगा कि कॉर्पोरेट एक राजनेता का दोस्त है।

वास्तव में, आर्थिक सर्वेक्षण में ऐसे कुछ दिलचस्प आंकड़े सामने आये हैं, जिनसे पता चलता है कि कार्पोरेट कंपनियों ने बैंकों से बहुत सारा कर्ज ले रखा है, जिनको चुकाने में वे कठिनाई महसूस कर रही हैं।

जिन कई कार्पोरेट कंपनियों को बैंकों ने कर्ज दिया हुआ है, उनका इंटरेस्ट कवरेज रेशियो एक से भी कम है। इन कंपनियों को स्ट्रेस्ड कंपनियाँ (Stressed companies ) कहा जाता है। मूलरूप से इसका मतलब है कि इन फर्मों की ऑपरेटिंग प्रॉफिट (ब्याज और कर सहित आय ) निर्धारित अवधि में बकाया ऋण पर आने वाली ब्याज से कम है। इस प्रकार देखते हैं कि ये कंपनियाँ लिये गये ऋणों पर ब्याज का भुगतान करने के लिए पर्याप्त नहीं कमा रही हैं।

एक से कम की इंटरेस्ट कवरेज रेशियो वाली स्ट्रेस्ड कंपनियों पर भारतीय बैंकों द्वारा दिए गए ऋणों का 40 प्रतिशत से थोड़ा अधिक बकाया है। ये ही कंपनियां हैं, जो वास्तव में भारतीय बैंकों को आगे बढ़ने नहीं दे रही हैं।

वास्तव में, स्ट्रेस्ड कंपनियों (यानी एक से कम की ब्याज इंटरेस्ट कवरेज रेशियो वाली कंपनियाँ ) में भी समस्या कुछ कर्जदारों तक सिमित है। स्ट्रेस्ड कंपनियों को प्रदान किये गये ऋणों में 71 % ऋण मात्र 50 कंपनियों ने ले रखा है। औसतन इन कंपनियों में से हर के ऊपर बैंकों का 20,000 करोड़ रुपये बकाया है। शीर्ष 10 कंपनियों के ऊपर औसतन 40,000 करोड़ रुपया बकाया है।

दरअसल,भारतीय बैंकिंग व्यवस्था की समस्या की जड़ यहीं है। सरकार के साथ सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक खुद ही इस मकड़जाल को खत्म कर सकते हैं-वरना और कोई उपाय नहीं है। विजय माल्या को ब्रिटेन से वापस लाने में सरकार ने जो दृढ़ता और राजनीतिक इच्छा-शक्ति दिखायी है, वैसी ही बैंकिंग अव्यवस्था को दूर करने में दिखाये। आप और हम अच्छा होने की उम्मीद कर रहे हैं।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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