डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन की रफ्तार को नोटबंदी ने थामा ही

वित्तमंत्री अरुण जेटली ने अभी हाल ही में कहा : “नोटबंदी के माध्यम से सरकार ने पहले की नकदी अर्थ-व्यवस्था और छद्म अर्थ-व्यवस्था (कालाधन) को खत्म करने के लिए बड़ा कदम उठाया । इस तरह सरकार ने एक नये चलन को जन्म दिया है।”

यदि वित्त मंत्री का बयान सच है तो निकट भूत में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन ( गैर-नकदी लेने देन) में भारी तेजी दर्ज होनी चाहिए थी। यदि लोग नकदी में लेन-देन नहीं कर रहे हैं; तो फिर उन्हें अपना ट्रॉन्जैक्शन डिजिटल माध्यम से करना चाहिए । लेकिन क्या ऐसा हो रहा है ? इसको जाँचने के लिए हम सबसे पहले नवंबर 2016 और मई 2017 के बीच डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन के आँकड़ों (अर्थात डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का परिमाण) पर एक नजर डालते हैं। ज्ञातव्य है कि सरकार ने नवंबर 2016 में 500 और 1,000 रुपये के नोटों पर प्रतिबंध लगाया था।

कॉलम में प्रदर्शित डिजिटल डाटा Real Time Gross Settlement system से किये गये ट्रॉन्जैक्शनों को घटा देता है। क्योंकि यह डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन की रिटेल श्रेणी में नहीं आता है-जबकि इसी की यहाँ चर्चा कर रहे हैं। इस माध्यम से न्यूनतम 2 लाख रुपये ट्रांसफर किया जा सकता है।

चित्र-1 पर नजर डालें।

इसमें मूलरूप से नवंबर 2016 और मई 2017 के बीच हुए डिजिटल आँकड़ों को दर्शाया गया है।

चित्र-1:

चित्र-1 से बिलकुल साफ होता है कि डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन दिसंबर 2016 में चरम-शिखर पर था। इस समय नोटबंदी का असर पूरी तरह हावी था। लेन-देन (ट्रॉन्जैक्शन) के लिए बहुत थोड़ी मुद्रा उपलब्ध होने के कारण लोगों के पास डिजिटल तरीके से ट्रॉन्जैक्शन करने के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था।

दिसंबर 2017 के मुकाबले , मई 2017 में, डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में 11.4% की गिरावट दर्ज की गयी। इसका मतलब साफ है कि नोटबंदी के ठीक बाद लोगों ने जितना डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन किया, मई में कहीं कम लोगों ने ( डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन) किया।

अब चित्र-2 पर नजर डालें।

इस चित्र में नवंबर 2016 और मई 2017 के बीच माहवारी डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का आँकड़ा दिया हुआ है।

चित्र-2:

चित्र-2 से स्पष्ट होता है कि मार्च 2017 में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन के शीर्ष पर पहुँचने के बाद उसमें 20.2% की गिरावट आयी है। पूर्व के आँकड़ों से पता चलता है कि वित्तीय वर्ष के अंतिम माह में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में वृद्धि का रुझान होता है, क्योंकि लोग अपने बकाये का निबटारा और करों का भुगतान करते हैं। ऐसी स्थिति में, मई 2017 में कुल डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का कुल मूल्य दिसंबर 2016 की तुलना में अधिक था। लेकिन ट्रॉन्जैक्शन का परिमाण कमतर होने के का मतलब यह है कि डिजिटल वर्ग में पहले से आये लोग डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन के माध्यम से अधिक खर्च कर रहे थे। यह उस सरकार के लिए अच्छी खबर है, जो कुल अर्थ-व्यवस्था में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का अनुपात बढ़ाना चाहती है।

यह तुलना हमें नोटबंदी के बाद डिजिटल पहलू में विकास की जानकारी देता है। अब हम टाइमलाइन को थोड़ा और खींचकर देखते हैं-मई 2017 के आँकड़े की मई 2016 से तुलना करते हैं।

[मौजूदा मामले में मैंने United Payments Interface and Unstructured Supplementary Service Data (USSD) के आँकड़े की अनदेखी की है। मुझे मई 2016 और मई 2015 के आँकड़े नहीं प्राप्त हुए। इसका सामान्य निष्कर्ष पर कोई असर नहीं पड़ेगा। क्योंकि डिजिटल पेमेंट का USSD तरीका लगभग शून्य है और इस तरह इसकी बिलकुल अनदेखी की जा सकती है। लेकिन UPI की भी अगर बात करें, तो मई 2017 में भी सरकार की हर चंद कोशिशों और प्रमोशनों के बावजूद इसकी हिस्सेदारी, परिमाण के नजरिये से, कुल डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का 1.1% और मूल्य ( बेशक हमने यहाँ पर RTGS की अनदेखी की है) के नजरिये से 0.1% रही।]

तालिका-1 पर नजर डालें।

इस तालिका में विगत सालों में, परिमाण और मूल्य दोनों नजरिए से हुए डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन को दर्शाया गया है।

तालिका-1 :
Digital transactions May 2017 May 2016 May 2015
Volume (in millions) 831.5 726.3 491.2
Value (in Rs billion) 20,901.5 15,364.6 12,173.9

Source: Author calculations on Reserve Bank of India data.

तालिका-1 से हमें पता चलता है कि मई 2016 और मई 2017 के बीच परिमाण के स्तर पर डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में 14.5% की, जबकि मूल्य के स्तर पर 36% का उछाल आया। इस तरह यह हमें नहीं बताता कि नोटबंदी का डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन पर सकारात्मक असर पड़ा है ? निष्कर्ष पर पहुँचने से पहले, मई 2016 और मई 2015 ( जब नोटबंदी नहीं थी) के बीच की अवधि पर नजर डालते हैं:-

मई 2015 और मई 2016 के बीच, परिमाण के स्तर पर, डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में 47.9% का इजाफा हुआ। यह मई 2016 और मई 2017 के मुकाबले काफी तेज था।

इससे इस बात की जानकारी मिलती है कि कुल मिलाकर नोटबंदी का देश की अर्थ-व्यवस्था पर नकारात्मक असर पड़ा हैः अर्थ-व्यवस्था के बड़े हिस्से के खर्च में मंदी आयी है। डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में आयी कमी से इसका संकेत मिलता है।

मूल्य के स्तर पर देखें, तो मई 2015 और मई 2016 के बीच डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में 26.2% का उछाल देखने को मिला। यह मई 2016 और मई 2017 की तुलना में कम था। ( मई 2014 और उसके पहले का आँकड़ा मैंने नहीं देखा, क्योंकि डिजिटल डाटा के ढाँचे में नाटकीय बदलाव आता है, क्योंकि आजकल NACH की तुलना ECS का महत्व बढ़ रहा है।)

इससे सिद्ध होता है कि जो लोग पहले से डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन कर रहे थे, उन्होंने इस माध्यम से अधिक लेने-देन शुरू कर दिया। इससे इस बात का भी पता चलता है कि समृद्ध लोगों पर नोटबंदी का खास असर नहीं पड़ा है। इसके बावजूद, नोटबंदी का असली मकसद डिजिटल ट्रॉन्जैक्शनों की संख्या में इजाफा करना था ( दूसरे शब्दों में गैर-नकदी लेने-देन वाले समाज का सपना साकार करना)। कुछ भी हो वह अपने आप हो ही रहा था, लेकिन लगता है कि नोटबंदी ने इसकी रफ्तार को उल्टे मंद ही कर दिया।

सचाई तो यही है कि भारत में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन, नोटबंदी से पहले ही तेजी से विकास कर रहा था। यह कोई आश्चर्य की बात नहीं है, यह देखते हुए कि भारत के पास युवाओं की संख्या सर्वाधिक है। भारत की जनसंख्या में 54% से अधिक की उम्र 25 साल से कम है। युवा, टेक्नॉलजी को दूसरों की अपेक्षा कहीं अधिक तेजी से अपनाते हैं। इस तरह पाते हैं कि नोटबंदी के पहले की रफ्तार से ही आने वाले सालों में डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन विकास करता रहेगा।

आखिरकार हम उसी सवाल पर पहुँच जाते हैं कि क्या नोटबंदी जरूरी थी ? अपने व्हाट्सऐप फार्वर्डों और मीडिया में विश्लेषणों के जरिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘उपयोगी मंदबुद्धि समर्थक’ (Useful Idiots) ( थामस सोवेल का क्षमाप्रार्थी हूँ, जिन्होंने किसी और संदर्भ में यह शब्द गढ़ा ) चाहते हैं कि हम यही मानें। लेकिन जैसे-जैसे और आँकड़े सामने आ रहे हैं-साफ होता जा रहा है कि नोटबंदी, बगैर किसी खास सोच-विचार के , कुल मिलाकर, जल्दबाजी में लिया गया फैसला था। बेशक, अब इसका बचाव करना सरकार के लिए मजबूरी हो गयी है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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