एक बार फिर महँगाई की चपेट में आ सकती हैं दालें?

खरीफ की फसल की बुवाई का समय है। कृषि मंत्रालय साप्ताहिक तौर पर, इससे संबंधित आंकड़ा नियमित रूप से जारी करता रहता है। ताजातरीन आँकड़ों के अनुसार 23 जून 2017 तक 5.97 लाख हेक्टेयर में दलहनी फसलों की बुवाई हो चुकी थी। इसी अवधि में, पिछले साल 9.01 हेक्टेयर में बुवाई हुई थी।

इस तरह साफ तौर से जाहिर होता है कि जहाँ तक बोई गयी दलहनी फसलों के क्षेत्र का सवाल है, इस साल उसमें लगभग 34% की गिरावट आयी है। यहाँ पर यह बात गौर करने की है कि कौन-सी फसल कितने क्षेत्र में उगायी जायेगी, इसका निर्धारण किसान इस आधार पर करते हैं कि पिछली बार किस फसल की उन्हें कितनी कीमत प्राप्त हुई थी।

इस नजरिये से देखें, तो पिछले सालों में दालों का रिकॉर्ड अच्छा नहीं रहा है। चित्र-1 पर नजर डालेः-

चित्र-1:

चित्र-1 में विगत कुछ सालों में मुद्रा-स्फीति ( कीमत वृद्धि) और मुद्रा-अवस्फीति (कीमतों में गिरावट) दर्शायी गयी है। दिसंबर 2014 की तुलना में, दिसंबर 2015 में दाल की कीमत में 49% की वृद्धि हुई थी। हालाँकि आने वाले महीनों में कीमत-वृद्धि में गिरावट दर्ज हुई, पर यह 30% के आसपास बनी रही। इसके कारण आम आदमी के लिए दालों का खर्च उठा पाना संभव नहीं रहा। इसको देखते हुए सरकार ने किसानों को संकेत भेजा कि अगर उन्हें पैसा कमाना है तो दालहनी फसलों की बुवाई अधिक करें।

चित्र-2 पर नजर डालें। इसमें पिछले सालों में दाल के कुल उत्पादन को दर्शाया गया है।

Figure 2:

साल 2016-17 में दाल का उत्पादन 37% वृद्धि के साथ 2 करोड़ 24 लाख टन पर पहुँच गया। भारत में इससे पहले दाल का इतना उत्पादन कभी नहीं हुआ। स्वाभाविक है कि किसान अपने उत्पादित दालों की अच्छी कीमत की उम्मीद कर रहे थे-लेकिन हुआ एकदम से उलटा- दाल की कीमतें एकदम से टूट गयीं।

तालिका-1 पर नजर डालें। इसमें देश भर की मंडियों में विभिन्न दालों की प्राप्त कीमतों को दर्शाया गया है।

तालिका-1: प्रमुख देशी बाजारों में प्रमुख दालों की कीमतों में परिवर्तन ( रुपया/कुंतल)

तालिका-1 से स्पष्ट है कि चने को छोड़ कर, बाकी की दालों की कीमतों में, पिछले सालों की तुलना में गिरावट आयी है। मार्च 2017 की कीमत पर नजर डालें, तो खास कर अरहर (तूर) की दाल की कीमतों में, देश भर की विभिन्न मंडियों में, लगभग 45% की गिरावट दर्ज की गयी है। यह देखते हुए इसमें आश्चर्य की बात नहीं हैं कि इस साल अरहर का उत्पादन एकदम से आसमान को छू गया। चित्र-1 पर नजर डालें। इसमें पिछले सालों में दालों का उत्पादन दर्शाया गया है।

चित्र-3:


चित्र-4 में देखा जा सकता है कि साल 2016-17 में अरहर का उत्पादन लगभग 80% के उछाल के साथ 46 लाख टन पर पहुँच गया। इस जबर्दस्त उत्पादन की मुख्य वजह 2015-16 में कीमतों में भारी तेजी के कारण संभव हुआ। 2016-17 में भारी आपूर्ति के कारण खासकर अरहर और सामान्य तौर पर दालों की कीमतें टूट गयी हैं।

केंद्र सरकार चावल और गेहूँ समेत 23 फसलों का न्यूनतम समर्थन मूल्य घोषित करती है। लेकिन यह भारतीय खाद्य निगम और राज्य की एजेंसियों के माध्यम से मात्र गेहूँ और चावल की ही किसानों से सीधे खरीदी करती है। हाल ही में सरकार ने दालों की खरीदी की शुरुआत की है, इस उम्मीद के साथ कि किसानों को दालों की समुचित कीमत मिल सके।

खराब खरीदी-तंत्र के कारण कई स्थानों पर दालों की कीमत न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी नीचे चली गयी। Times Of India में छपी फरवरी 2017 की रिपोर्ट में लिखा हैः “अरहर की दाल का न्यूनतम समर्थन मूल्य 5,050 रुपये है, लेकिन किसानों को मात्र 4,200-4,300 रुपये मिल रहे हैं। ”

अगर केंद्र सरकार ने घोषित न्यूनतम समर्थन मूल्य पर दालों की खरीदी की होती, तो कीमतों में गिरावट कुछ स्थिरता लायी जा सकती थी। लेकिन दालों की खरीदी की हालिया शुरुआत को देखते हुए कहा जा सकता है कि सरकारी खरीदी करने वाली एजेंसियाँ अधिक खरीदने की स्थिति में नहीं हैं।

साल 2016-17 में विभिन्न सरकारी एजेंसियों ने 10.10 लाख टन दालों की खरीदी की थी। इसका मतलब हुआ कि सरकार ने कुल उत्पादित दालों की 4.9% की खरीदी की। The Price Policy for Kharif Crops—The Marketing Season 2017-18 में उल्लेख हैः “ 21 मार्च 2017 तक लगभग 10.10 लाख टन दालों की खरीदी की जा चुकी है। पिछले साल की तुलना में काफी अधिक है। लेकिन कुछ राज्यों में बाजार कीमतें अभी भी न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे चल रही हैं। इसको देखते हुए दालों की खरीदी में राज्यों के प्रभावी रूप से शामिल होने की जरूरत है। हालांकि दालों की खरीदी करने वाली राज्यों की दो एजेंसियों NAFED और SFAC के बुनियादी ढाँचों को मजबूत करने की जरूरत है। देश भर में दालों की बड़े पैमाने पर खरीदी के लिए प्रशासनिक और वित्तीय सहयोग की भी जरूरत है। “

NAFED कई सममस्याओं से दो-चार हैः बोरों की कमी, भारी फसल के कारण जगह की कमी। ऐसे हालात में सरकार द्वारा दालों की खरीदी किसानों की समस्या का स्थायी समाधान नहीं है। दरअसल, एक समुचित बाजार-प्रणाली के विकास की आवश्यकता है, जहाँ किसानों को अपनी फसलों की सबसे बढ़िया कीमत प्राप्त हो सके। हालाँकि, यह कहने में जितना आसान है, व्यवहार में उतना ही कठिन है। हालाँकि भारतीय नेता दूसरे क्षेत्रों में बाजार-अर्थ व्यवस्था से छेड़छाड़ करना पसंद करते हैं, लेकिन जैसे ही कृषि की बात आती है, वो मौन साध लेते हैं।

किसानों की समस्या का समाधान न होने की एक वजह यह भी रही है कि दालों का आयात बेरोक-टोक जारी हैः अप्रैल 2016 और जनवरी 2017 के बीच कुल 60.10 लाख टन दालों का आयात हुआ है। साल 2015-16 में कुल 50.80 लाख टन दालों का आयात हुआ। इस प्रकार देखते हैं कि साल 2016-17 के आरंभिक 9 महीनों में एक साल पहले की तुलना में कहीं अधिक दालों का आया हुआ। परेशानी की बात ये है कि आयात में उछाल के साथ साल 2016-17 में दालों के उत्पादन में 37% की वृद्धि भी हो गयी। ऐसे में यदि दालों के आयात की अनुमति है, तो इनके निर्यात की भी अनुमति होनी चाहिए।

दालों के आयात से अल्पावधि में देश में दालों की कीमतों में गिरावट आयी। लेकिन इसने उन किसानों को सरकार की गलत आर्थिक सोच का संदेश दिया, जिन्होंने 2016-17 में दलहनी फसलें उगायीं। इस पृष्ठभूमि में, दालों की कीमतों के टूटने की प्रतिक्रिया स्वरूप, चालू वित्त-वर्ष में दलहनी फसलों की बुवाई के क्षेत्र में नाटकीय तौर पर एक-तिहाई की कमी दर्ज की गयी है। खरीफ मौसम में दलहनी फसलों की बुवाई में अभी भी कुछ समय बाकी है और इसलिए आँकड़ों में बदलाव आ सकता है।

अगर ऐसा नहीं हुआ, तो 2017-18 में पिछले साल की बंपर फसल के मुकाबले कम होगी। फिर दालों की कीमत में उछाल आने का अंदेशा है। यह देश के लिए सचमुच में परेशानी की बात होगी, जहाँ पर प्रोटीन की माँग तेजी से बढ़ रही है। देश की शाकाहारी जनसंख्या के लिए दालें प्रोटीन का सबसे बड़ा स्रोत रही हैं। यह भारत की ‘जटिल’ अर्थ-व्यवस्था का संक्षेप में और प्रभावशाली ढंग से बयान कर देता है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

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