कर्ज माफी का सिलसिला जल्दी नहीं थमने वाला है

कुछ दिनों पूर्व मैंने ट्विटर पर लोगों को सुझाव दिया थाः संगठित होकर सरकार से अपने बकाया आवास-ऋणों को माफ करने के लिए कहें।

मुझे इस तरह का सुझाव देने की सूझ इस बात से मिली कि कई राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर रहीं थीं।

किसानों की कर्ज-माफी की शुरुआत आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों ने की।

इसके पश्चात उत्तर प्रदेश ने अनुसरण ने किया। यहाँ की नव-नियुक्त सरकार ने अपने किसानों का लगभग 36, 359 करोड़ रुपये का कर्ज माफ कर दिया। फिर महाराष्ट्र में भी यही हुआ। यहाँ के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने किसानों का कर्ज माफ करने के लिए स्पष्टीकरण दियाः “ इसकी शुरुआत पड़ोसी राज्यों तेलंगाना और आंध्र प्रदेश ने की। इससे दबाव पैदा हुआ। फिर उत्तर प्रदेश ने किसानों का कर्ज माफ करने की घोषणा कर दी। राज्य में किसानों का कर्ज माफ करने की माँग तो पहले से हो रही थी। लेकिन उत्तर प्रदेश सरकार की घोषणा ने हमें पूरी तरह दबाव में ला दिया।“

दरअसल किसानों का कर्ज माफ करने का आइडिया भी इस तथ्य से आया कि देश के बैंक अपने कर्जदार और डिफाल्टर बड़ी कंपनियों के साथ ‘ सात खून माफ ‘ के अंदाज में पेश आ रहे थे। उनके कर्जों को रीस्ट्रक्चर करने के साथ और भुगतान के लिए लंबा समय दे रही थीं। ऐसा इसलिए किया जा रहा था कि बड़ी कंपनियों पर बैंकों का भारी रकम बकाया था। डिफाल्टर साबित होने से इन्हें भारी क्षति हो सकती थी।

लेकिन बैंकों का रवैया, सामान्य आवास-ऋण लेने वालों के साथ बिलकुल अलग रहता हैः अगर कोई इनके पास ईएमआइ स्थगित करने का अनुरोध करे तो बैंकों का व्यवहार वैसा ही नहीं रहता , जैसा की बड़ी कंपनियों के साथ होता है। साफ है, बैंकों का व्यवहार विभिन्न कर्जदारों के साथ-साथ अलग-अलग होता है।

किसानों को अपना कर्ज माफ कराने में इस बात से सफलता मिली कि वे असंख्य हैं, और वे संगठित भी हैं। इसके कारण वे अपना विरोध प्रदर्शन उस स्तर तक जारी रखने में सफल रहते हैं, जिससे सरकार बचने की कोशिश करती है।

बड़ी कंपनियाँ, बैंकों को अपने साथ नरमी से पेश आने के लिए इसलिए मजबूर कर देती हैं कि उनका औसत ऋण बहुत अधिक होता है, जिसके डूबने से बैंकों की आर्थिक हालत एकदम से खस्ता हो सकती है।

लेकिन एक सामान्य कर्जदार के साथ ऐसी लाभ की स्थिति नहीं है। इनकी संख्या भी बहुत अधिक नहीं होती। दूसरी तरफ ये देश भर में बिखरे हुए हैं- मतलब की ये संगठित नहीं हैं।

साल 2013 में कुल बकाया आवास-ऋणों की संख्या 46.43 लाख थी। मेरे पास नवीनतम आँकड़ा उपलब्ध नहीं है। इसके अलावा हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने भी आवास-ऋण दिया हुआ है।

आदर्श रूप में, ( मूल्य के स्तर पर) बकाया आवास-ऋण लगभग 60:40 ( अनुसूचित कामर्शियल बैंक: हाउसिंग फाइनेंस कंपनी) के अनुपात में है। हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों को हिसाब में रखें (और इस तथ्य को भी ध्यान में रखें कि 2013 के बाद कुल बकाया आवास-ऋण में इजाफा हुआ होगा ) तो आसानी से कहा जा सकता है कि कुल बकाया आवास-ऋणों की संख्या अभी भी एक करोड़ से कम होगी।

यही नहीं, आवास-ऋण लेने वाला आम आदमी देश भर में बिखरा हुआ है। इसलिए उनका एकजुट होना मुश्किल है और उतना ही मुश्किल है किसानों की तर्ज पर अपना आवास-ऋण माफ कराने के लिए सरकार के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करना।

यही बात दूसरे खुदरा-ऋणों (Retail Loan) पर भी लागू होती है। इन ऋणों का औसत आकार आवास-ऋणों की तुलना में छोटा है। इस तरह के ऋण देश में सर्वाधिक हैं।

इसके अलावा इतनी थोड़ी मात्रा में ऋण लेने वाले अगर आवास-ऋणों का भुगतान नहीं करते हैं यानी डिफाल्टर साबित होते हैं, तो वे बैंकों की कानूनी कार्रवाई का सामना, बड़ी कंपनियों की तरह नहीं कर सकते हैं।

ऐसे हालात में भी इस तरह के उदाहरण हैं कि सरकार ने आवास-ऋणों को माफ किया है। दिसंबर 2016, में तेलंगाना सरकार ने आवास-ऋण लेने वाले आर्थिक रूप से कमजोर आम लोगों के 3,920 करोड़ रुपये के कर्ज माफ किये थे। इस तरह से देखते हैं कि यदि आम कर्जदार एकजुट होकर सरकार से कर्ज माफ करवा सकते हैं।

कर्जदारों का एक खास वर्ग है, जो एकजुट होकर विरोध कर सकता है और कर्ज माफ भी करवा सकता है।

साल 2016-17 और 2015-16 में प्रधानमंत्री मुद्रा योजना ( मुद्रा ऋण) के अंतर्गत 3 लाख 17 हजार 977.81 करोड़ रुपये का ऋण दिया गया। कुल लगभग 7.46 करोड़ लोगों ने ऋण लिया। इनका बड़ा हिस्सा महिलाओं को दिया गया।

किसानों की तर्ज पर अगर ये ऋण लेने वाले एकजुट हों और अपना कर्ज माफ करने की सरकार से जोरदार माँग करें, तो शायद वे सफल हो जायेंगे।

अगर यह मानकर चलें कि एक परिवार में केवल एक व्यक्ति ने मुद्रा-ऋण लिया। तो इस तरह से कल्पना की जा सकती है कि 7.46 करोड़ परिवारों ने ऋण लिया। अगर एक परिवार में 5 सदस्य हैं, तो इस तरह कुल 37 करोड़ व्यक्ति बनते हैं। इन पर इन ऋणों का असर पड़ता है। यह एक बड़ा वोट बैंक है।

यदि ये व्यक्ति एकजुट हो जायें, तो इस बात की संभावना है कि वे अपना मुद्रा-ऋण माफ करना सकते हैं। सरकार ने पहले ही एक उदाहरण पेश कर दिया है। उसे न कहने में मुश्किल होगी।

यह रणनीति, खासकर उन राज्यों में काम कर सकती है जहाँ पर 2019 में लोकसभा चुनाव से पहले चुनाव होने वाले हैं। सचाई तो यह है कि इन कर्जदारों को ज्यादा हो-हल्ला भी मचाने की जरूरत नहीं होगी। कुछ राजनेता ऋण माफ कराने का वादा कर खुद उनका काम कर देंगे। इस तरह की कर्ज माफियों के साथ यही समस्या है कि इनका सिलसिला जल्दी थमने वाला नहीं है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

Comments