खुदरा-ऋण की भी खराब हालत , मतलब आर्थिक-मंदी कायम है

इधर बैंकों द्वारा ऋण देने के क्रिया-कलापों में आयी मंदी के बारे में बहुत कुछ लिखा गया है।

इस सिलसिले में नीचे दिये गये चित्र-1 पर एक नज़र डाली जा सकती है: मूलरूप से इसमें मई 2016 से मई 2017 और मई 2015 से मई 2016 के बीच की अवधि में बैंकों द्वारा वितरित ऋण के बारे में बताया गया है।

तालिका-1 :
Type of Loan Total Loans Given Between May 2016 and May 2017 (in Rs Crore) Total Loans Given Between May 2015 and May 2016 (in Rs Crore)
Non-Food Credit 4,22,001 6,25,975
Loans to industry -56,455 24,383
Retail Loans 1,94,553 2,27,863

Source: Reserve Bank of India

हम बात की शुरुआत गैर-खाद्य-ऋण (Non-food Credit ) से करते हैं। सार्वजनिक वितरण-प्रणाली के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) पर किसानों से सीधे चावल और गेहूं की खरीदी के लिए बैंकों द्वारा भारतीय खाद्य-निगम और अन्य राज्य खरीदी एजेंसियों को दिये गये ऋण हैं।

मई 2015 से मई 2016 की अवधि के मुकाबले मई 2016 से मई 2017 की अवधि में दिये गये गैर-खाद्य-ऋण की कुल राशि 33 % की गिरावट के साथ 4,22,001 करोड़ रुपये रही। इस तरह एक साल पहले की तुलना में पिछले एक साल में बैंकों द्वारा दी गयी कुल ऋण-राशि में कुल मिलाकर भारी कमी रही है।

ऐसा क्यों रहा ? उद्योग-जगत को ऋण देना इसकी प्रमुख वजह रही। लेकिन अब बैंक उद्योग-जगत को ऋण देने के मूड में नहीं हैं। मई 2016 और मई 2017 की अवधि में उद्योग-जगत को वितरित कुल ऋण में , वास्तविक रूप में 56,455 करोड़ रुपयों की कमी आयी। इसका तात्पर्य यही है कि सामान्य तौर पर बैंकों ने उद्योग-जगत को एक रुपये का ऋण नहीं दिया। मई 2015 और मई 2016 की अवधि में बैंकों ने उद्योग-जगत को सामान्य रूप से 24,383 करोड़ रुपये के नये ऋण दिये।

ऐसी स्थिति मुख्यरूप से इसलिए आयी कि अतीत में उद्योग-जगत को बैंकों ने जो ऋण दिये थे, उनका बहुत बड़ा हिस्सा खराब-ऋण में तब्दील हो चुका था। उद्योग-जगत को ऋण देने के मामले में 31 मार्च 2017 तक सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का खराब-ऋण अनुपात 22.3 % था। इसका मतलब यह हुआ कि सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों द्वारा उद्योग-जगत को दिये गये प्रत्येक 100 रुपये में 22.3 रुपये खराब-ऋण साबित हुए। अर्थात कर्जदारों पर बैंकों का 90 या उससे अधिक दिनों तक का बकाया हो चुका था।

आश्चर्य की बात नहीं कि इन बैंकों को उद्योग-जगत को उधार देने में अब कोई दिलचस्पी नहीं है। बैंकों द्वारा उधार देने की गतिविधि में आयी सामान्य मंदी के पीछे यह एक प्रमुख कारण है। जैसा कि हम पहले ही देख चुके हैं। लेकिन बैंकों द्वारा खुदरा-ऋण देने संबंधी क्रिया-कलापों पर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। इस प्रकार के ऋण में आवास-ऋण, वाहन-ऋण, कंज्यूमर ड्युरेबल ऋण, क्रेडिट कार्ड बकाया, सावधि-जमाओं पर ऋण आदि आते हैं। ऐसी सोच है कि खुदरा-ऋण का काम बढ़िया चल रहा है।

खुदरा-ऋण के संदर्भ में खराब-ऋण के हालात ठीक-ठाक हैं। लेकिन बैंकों द्वारा दिये गये जहाँ तक खुदरा-ऋण की कुल राशि की बात है, तो मई 2016 और मई 2017 के बीच कुल 1,94,533 करोड़ रुपये वितरित किये गये। यह मई 2015 से मई 2016 के बीच वितरित खुदरा-ऋणों से करीब 15 % कम था। इसके बावजूद कि नौटंबदी के बाद खुदरा-ऋण पर ब्याज दरों में नाटकीय रूप से गिरावट आयी है। अब आप 8.35% की वार्षिक ब्याज दर पर होम लोन ले सकते हैं।

खुदरा ऋण में आयी मंदी की एक प्रमुख वजह आवास-ऋण है, जो खुदरा ऋणों का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा है। मई 2016 और मई 2017 के बीच बैंकों द्वारा दिया गया आवास-ऋण , मई 2015 और मई 2016 के बीच दिए गये आवास-ऋण की तुलना में 22 % कम यानी 92,469 करोड़ रुपये रहा।

आवास-ऋण पर कम ब्याज दर से बहुत मदद नहीं मिली है। इसका एकमात्र स्पष्टीकरण यह है कि पूरे देश में अचल-संपत्ति ( रियल-इस्टेट) की कीमतें ऊँची बनी हुई हैं। रिटेल कर्ज के महत्वपूर्ण अंग वाहन- ऋण की क्या स्थिति है? मई 2016 और मई 2017 की अवधि में, मई 2015 से मई 2016 की अवधि में दिये गये ऋण की तुलना में 26 % कमी के साथ बैंकों ने 18,447 करोड़ रुपये के वाहन-ऋण दिये।

इससे हमें क्या पता चलता है? वह यह कि खुदरा-ऋण की स्थिति भी बिगड़ी है। लोग खुदरा-ऋण (रिटेल लोन) तभी लेते हैं, जब उन्हें यकीन होता है कि वे आने वाले वर्षों में ईएमआई का भुगतान (कॉरपोरेट के विपरीत) जारी रखने में सक्षम होंगे। पिछले एक साल में बैंकों द्वारा दी गई खुदरा-ऋण की कुल राशि में गिरावट स्पष्ट रूप से हमें बताती है कि ईएमआई चुकाने का विश्वास अभी बहुत मजबूत नहीं है।

नोटबंदी की बाद भारतीय अर्थव्यवस्था में आयी सामान्य मंदी का यह एक और अच्छा सूचक है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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