किसान-मार्केटः किसानों की मुक्ति का दरवाजा

डायरी के नियमित पाठकों को पता होगा कि पिछले मंगलवार को हमने अपने निवास के करीब एक मैदान में खुले एक किसान-मार्केट के बारे में लिखा था। यह मार्केट हर शुक्रवार को शाम 4 बजे से रात के 9 बजे तक लगता है। पिछली बार हमने काफी रियायती दर पर यहाँ से ताजे फल और सब्जियाँ खरीदी थीं। अबकी बार हम फिर इसी किसान मार्केट में खरीदारी करने पहुँचे।

हम शाम की भीड़भाड़ से बचने के लिए लगभग 4.30 बजे ही मार्केट में दाखिल हो गये। हमने काफी ताजे अंगूर, गोभी, ककड़ी, टमाटर और आम खरीदे। लेकिन वास्तम हमारा ध्यान अमरूद की खरीदी पर अधिक था। पिछली बार हमने जो अमदरूद खरीदे थे, वैसे अमरूद खाने का मौका काफी समय बाद मिला था। वे इतने ताजे थे कि जितनी बार हमने खाये ऐसा लगा कि हमने सीधे पेड़ से ही तोड़े हैं। सचाई ये है कि 1980 के अंतिम वर्षों के बाद से हमें कभी पेड़ से अमरूद तोड़ने का अवसर नसीब नहीं हुआ ।

कुछ भी हो हमने पिछली बार जिस दुकानदार से अमरूद खरीदा था, वह इस बार किसान-मार्केट में काफी ढूँढ़ने के बाद भी नहीं मिला। दूसरे दुकानदारों ने बताया कि शायद वह ट्रैफिक में फँसा रह गया होगा-इसलिए उसे आने में देरी हो रही हो। इसलिए हम अमरूद खरीदे बगैर ही घर वापस आ गये- यह मन बनाकर कि लगभग 8 बजे के आसपास फिर मार्केट में वापस पधारेंगे।

इस प्रकार हम फिर 8 बजे मार्केट में वापस पहुँचे। आश्चर्य-मिश्रित खुशी हुई कि पिछले बार जो दुकानदार नहीं थे, वे भी मार्केट में आ गये थे। ऐसा प्रतीत हुआ कि वे दादर के पास ट्रैफिक में अटक गये थे। लेकिन हमारे साथ ट्रैजिडी जो होनी थी, वह हो चुकी थी, जो आदमी पिछले सप्ताह हमें अमरूद बेचा था, उसके पास से अमरूद खत्म हो चुका था। ऐसा लगता है कि उस अमरूद में वही चीज उन खरीदारों को भी लगी थी, जो हमें लगी थी। हम शाम के मार्केट में जल्दी आ गये थे और फिर वापस भी लौटे तो ज्यादा देर कर दी। जीवन की यह तो अनिश्चितताएं हैं। अच्छी बात यह रही कि हमें अमरूद नहीं मिला मगर हम मशरूम, चेरी टमाटर, सलाद, तुरई, भिंडी और आम खरीद पाने में सफल रहे। वरना इनमें से अधिकतर सब्जियों की कीमत करीब के ‘नेचर्स बास्केट’ में इतनी होतीं की पूछिए मत।

सब्जियाँ खरीदने के पश्चात हम मार्केट में दुकान लगाये बैठे किसानों से बातें करने में मशगूल हो गये। उन्होंने काफी रोचक और गौर करने लायक बातें बतायीं। हालाँकि कुछ बातें वही थीं, जो उन्होंन पिछले सप्ताह बतायी थीं। फिर भी, उन्होंने जो बातें रखीं वे सोचने लायक थीं और जरूरी थीं...

    अ) ये किसान पुणे और नाशिक आये हुए थे। कुल कहने का मतलब कि 5 से 6 घंटों का सफर करने के बाद मुंबई पहुँचे थे। सवाल यह है कि अपनी सब्जियाँ और फल बेचने के लिए ये किसान इतनी तकलीफ क्यों उठा रहे हैं ? इतनी गर्मी में इतनी लंबी दूरी की यात्रा करना आसान काम नहीं है। लेकिन इसकी असली वजह यही है कि सरकार उन्हें अपना माल सीधे ग्राहकों को बेचने की अनुमति देकर यह आजादी दे रही है कि किसान अपने उत्पाद की कीमत खुद तय करें। किसानों को इससे ज्यादा खुशी की बात भला क्या हो सकती है। वास्तव में एक किसान के नियंत्रण में कुछ भी नहीं है, जो कि एक समय हुआ करता था। अपना माल अपनी निर्धारित कीमत पर बेचने की उनकी आजादी ऐसी चीज है, जिसे समाजवादियों को समझने की जरूरत है, जो इस देश को चलाते हैं। किसी कारोबार को यह आसान बना देता है।
    आ) जब किसान कृषि उत्पाद विपणन समिति (एपीएमसी) के लाइसेंसधारी व्यापारी को अपना माल बेचते हैं, तो किसानों को तुरंत भुगतान नहीं किया जाता है। ऐसी स्थिति में बड़ी कंपनियाँ तो कार्यशील-पूँजी ( working capital) की जरूरत बैंकों से कर्ज लेकर पूरी कर लेती हैं, लेकिन किसानों के साथ ऐसी सुविधा नहीं होती है। लेकिन, अगर वे अपना उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं को बेचते हैं, तो उनकों तुरंत पैसा मिल जाता है। फिर उन्हें अपना काम चलाने के लिए कर्ज आदि की जरूरत ही नहीं रह जाती है।
    इ) किसान सीधे उपभोक्ताओं को बेचने की आजादी पसंद करते हैं। उन्हें अभी भी अपने उत्पाद का बड़ा हिस्सा लाइसेंसधारी व्यापारियों को बेचना पड़ता है। वह इसलिए कि किसान जो भी पैदा करते हैं, वह सभी किसान मार्केट में नहीं खपा सकते हैं। इस तरह देखते हैं कि किसान अभी भी पुरानी प्रणाली से आजाद नहीं हुए हैं। इससे एक बात साफ हो जाती है कि किसान- मार्केट जैसी चीजें अच्छी बात हैं, पर एपीएमसी के माध्यम से होलसेलरों द्वारा संचालित मौजूदा सप्लाई चेन का विकल्प पैदा करने की जरूरत है।
    ई) किसानों एक अन्य बड़ी समस्या का सामना कर रहे हैं , जिसका संबंध हरी सब्जियों से है। मौजूदा समय में इन सब्जियों को खेतों से मार्केट लाने में 5 से 6 घंटों का समय लगता है। जिसके कारण उनके खराब होने का डर रहता है। इतनी दूर से लाने के बाद एक दुकानदार का पालक जैसी हरी सब्जी एकदम से सूख जाती है। इसलिए अगर वह ताजा पालक बेचना चाहता है तो अलग ढाँचे की जरूरत पड़ेगी। लेकिन मौजूदा हालत में एक किसान उसका खर्च वहन नहीं कर सकता है।

दरअसल देश के कोने-कोने में किसान मार्केटों के फलने-फूलने की जरूरत है। इससे किसान सीधे उपभोक्ताओं के करीब आयेंगे। इस प्रकार से उपभोक्ताओं को ताजा उत्पाद मिलेगा और वह भी अच्छी कीमत पर। नहीं तो उन्हें पता है कि किस तरह की चीजें वे खा रहे हैं। किसानों को भी अपने माल की अच्छी और तुरंत कीमत प्राप्त होती है। उन्हें इसके लिए इंतजार नहीं करना पड़ता है।

हम किसान मार्केट से घर वापस लौट रहे थे तो हमारे दिमाग में यह बात उमड़-घुमड़ रही थी कि अपनी तमाम कमियों के बावजूद किसान-मार्केट एक अच्छी संकल्पना है। कम-से-कम किसान बिचौलियों के चंगुल से तो मुक्त हो गये-भले ही छोटे पैमाने पर। जब हम वापस लौट रहे थे तो देखा कि नियमित बाजार के सब्जी विक्रेता ( किसाने मार्केट के एकदम बगल में ) अपने ठेलों के साथ तेजी से भाग रहे थे। स्पष्ट था बीएमसी ( वृहन्मुंबई महानगर पालिका) का छापा पड़ा था। गैर-लाइसेंसधारी दुकानदारों के ठेलों को जब्त किया जा रहा था। एक तरफ से बीएमसी के वाहन पहुँच रहे थे, दूसरी तरफ की सड़क खुदी हुई थी। कुल मिलाकर ये दुकानदार फँस गये थे। उनकी भाग-दौड़ किसी काम नहीं आ रही थी। उनके चेहरों के भाव पूरी दास्तान बयाँ कर रहे थे।

हालाँकि इन दुकानदारों के पास बेचने का लाइसेंस नहीं है, लेकिन उन्हें एक ईमानदार जिंदगी जीने का अधिकार रखते हैं। ये वही कर रहे हैं। तो क्या इसका मतलब कि बीएमसी को इन गैर-लाइसेंसधारी दुकानदारों को नहीं भगाना चाहिए ? मुझे नहीं मालूम। मेरे पास इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं है।

लेकिन महत्वपूर्ण विषय यह है कि देश के हर हिस्से में ऐसे अवैध विक्रेता हैं, जो ठेले लगाये हुए हैं। सवाल यह है कि ऐसा क्यों है ? इसका जवाब बहुत सरल-सा हैः हर माह 10 लाख भारतीय कामकाजी वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं, मतलब कि नौकरी की तलाश लगी कतार में खड़े हो रहे हैं। इस तरह आस्ट्रेलिया की आधी जनसंख्या के बराबर यानी 1.2 करोड़ हर साल।

लेकिन इनके लिए कोई नौकरी नहीं है। ऐसे में वे क्या करें ? उनके लिए आसान तरीका यही है कि एक ठेला खरीद लें और कुछ बेचना शुरू कर दें। इसके लिए किसी तरह के हुनर की जरूरत नहीं है। साथ ही, ठेला लगाने के लिए बहुत ज्यादा रकम की जरूरत भी नहीं होती। इसलिए कहा जाता है कि भारत बेरोजगारों का देश नहीं – बल्कि उद्यमियों और अर्द्ध-बेरोजगारों का।

आखिर में, हमें बहुत उम्मीद है कि इस सप्ताह किसान मार्केट में सही समय पर पहुँचेंगे और अपना पसंदीदा अमरूद खरीदने में सफल रहेंगे।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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