कृषि-ऋण माफी : खजाने की कीमत पर सिंकतीं राजनीतिक रोटियाँ!

पिछले कुछ महीनों के दौरान कई राज्य सरकारों ने किसानों का कृषि-ऋण माफ कर दिया। देर से जारी आर्थिक-सर्वेक्षण (दूसरा खंड) में इसके आर्थिक-प्रभावों का विश्लेषण किया गया है। सर्वेक्षण में इन बिंदुओं पर प्रकाश डाला गया है:-

क) कृषि-ऋण माफी के अंतर्गत किसानों का ऋण राज्य सरकारों को स्थानांतरित हो जाता है। राज्य सरकारें फिर किसानों की तरफ से ऋण देने वाले बैंकों को ऋण का भुगतान करती हैं।

आर्थिक-सर्वेक्षण के अनुसार 2.2 से 2.7 लाख करोड़ रुपये का कृषि-ऋण माफ किया गया। सर्वेक्षण के मुताबिक, "यह माना जाता है कि कृषि ऋण-माफी प्रदत्त ऋण को ध्यान में रख क्रियान्वित की जाती है, न कि परिवार को। वह इसलिए की परिवार के स्तर पर ऋणों का हिसाब-किताब लगाना प्रशासनिक रूप से बहुत मुश्किल होगा। यह भी समझा गया है कि दूसरे राज्य भी ऋण-माफी के लिए उत्तर-प्रदेश मॉडल को अपनायेंगे। अखिल भारतीय स्तर पर ऋण-माफी 2.2 और 2.7 लाख करोड़ रुपये के बीच होगी। "

यह सिर्फ इसलिए कि ऋण-माफी की मांग अन्य राज्यों से भी आना स्वाभाविक है और राज्य सरकारों के पास उनका अनुसरण करने के अलावा कोई चारा नहीं होगा। सर्वेक्षण में उल्लेख है कि "ऋण-माफी की व्यापक मांग उत्तर प्रदेश में ऋण-माफी के प्रभाव की अभिव्यक्ति-मात्र हो सकती है। "

ख) सर्वेक्षण का मानना है कि ऋण-माफी से देश में मांग में 1.1 लाख करोड़ रुपये यानी सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) का 0.7 % तक की कमी आ जाएगी। यह अर्थव्यवस्था के लिए मुद्रा-अवस्फीति (डिफ्लेशन) का एक बड़ा झटका होगा।

ग) सर्वे के अनुसार ऋण-माफी से किसानों को लाभ होगा और उनके उत्पादों की खपत में बढ़ोतरी होगी। हालांकि, यह सिद्धांत रूप में सही लगता है, लेकिन 2008-2009 में केंद्र-सरकार द्वारा घोषित कृषि-ऋण माफी के वास्वतिक आँकड़ों से यह बिलकुल अलग दिखता है। अनुसंधानों से पता चलता है कि कृषि-ऋण माफी के बाद वास्तविक खपत में वृद्धि नहीं हुई है।

घ) किसानों को ऋण देने वाले बैंकों की भरपाई के लिए राज्य सरकारों को अधिक उधार लेना होगा। बैंकों के लिए मुआवजे का एक हिस्सा राज्य सरकारों द्वारा अन्य क्षेत्रों में अपने खर्चों में कटौती करने से भी आएगा। चूंकि सरकारें अपने नियमित खर्चों जैसे वेतन, बकाया-ऋण पर ब्याज की चुकौती आदि में कटौती करने की स्थिति में नहीं होंगीं, इसलिए उन्हें संपत्ति-निर्माणकारी पूंजीगत खर्चों में कटौती करनी होगी। सर्वे के मुताबिक, "हाल ही में उत्तर प्रदेश सरकार ने अपने किसानों की कृषि-ऋण माफी की राशि को समायोजित करने के लिए 13 प्रतिशत (यूडीए छोड़कर) पूंजीगत खर्चों में कटौती की है। "

इस विषय का जिक्र भारतीय रिजर्व बैंक की नवीनतम मौद्रिक-नीति वक्तव्य में किया गया है: " कृषि-ऋण (फार्म लोन) माफी पूंजीगत-व्यय में कटौती करने के लिए मजबूर कर सकती है, साथ ही पहले से धीमे पड़ गये पूंजीगत-खर्च के चक्र पर प्रतिकूल प्रभाव डाल देता है।"

ई) इसके अलावा, राज्य सरकारें अभी तक खुद नहीं तय कर पायी हैं कि उनकी कृषि-ऋण माफी का लाभ किनको मिलता है और किनको नहीं। इससे दो बातें साफ हो जाती हैं: पहला, ऋण-माफी का सरकारी खजाने पर कितना भार पड़ता है, और दूसरा, ऋण-माफी को सही ढंग से क्रियान्वित करने के लिए सरकार को पहले यह तय कर लेना चाहिए किनको लाभ पहुँचाना है।

इसके मायने यह भी हुए कि ऋण-माफी को लागू करने में समय लगेगा और इसका लाभ लक्षित किसानों तक तत्काल नहीं पहुँचने वाला है।

सर्वे में इस बात को रेखांकित किया गया है: “तीन राज्यों ने माफी योजनाओं को स्पष्ट किया है: उत्तर प्रदेश ने सभी छोटे और सीमांत किसानों के 1 लाख रुपये तक के ऋण-माफ करने की घोषणा की है। पंजाब सरकार ने छोटे किसानों के 2 लाख रुपये तक के कृषि-ऋण माफ करने की बात कही है। लेकिन छोटे किसान को परिभाषित नहीं किया है। और कर्नाटक में छूट की सीमा 50,000 रुपये तक सीमित है।( महाराष्ट्र सरकार की माफी की शर्तें अभी भी अस्पष्ट हैं )। माफी की घोषणा यह भी स्पष्ट नहीं करती कि माफी की राशि पारिवार या ऋण, किसा अधार पर पर लागू होगी : आमतौर पर, एक परिवार में एक से अधिक ऋण लिए गये होते हैं। "

च) माफी के अन्य नकारात्मक प्रभाव भी होते हैं : इससे ऋण को चुकाये जाने की योजना और सोच मिट्टी में मिल जाती है। ऋण-माफी का लाभ सिर्फ उन लोगों को मिलता है, जिन्होंने औपचारिक स्रोतों से उधार लिया था। साथ ही, "विश्व बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि 2008-09 की माफी के बाद भी उधारी लेने में वृद्धि हुई, भले ही छूट के लिए अधिक-से-अधिक जोखिम वाले जिलों में न हो।"

आर्थिक मोर्चे पर इन नकारात्मक प्रभावों को देखते हुए, यह पूछना महत्वपूर्ण है कि कृषि-ऋण माफी आखिरकार क्यों की जाती है। इसका कारण जानना बहुत आसान है: कृषि-ऋण माफी से प्राप्त लाभ, हानि की तुलना में ज्यादा साफ नजर आता है।

जब एक राज्य में कृषि-ऋण माफी की घोषणा की जाती है, तो बैंकों से ऋण लेने वाले उस राज्य के किसानों के एक बड़े हिस्से को लाभ होता है। साफ नजर आने वाले इस प्रभाव की पूरी कीमत राज्य सरकारें वसूल लेना चाहती हैं। नकारात्मक प्रभाव इतने नहीं दिखाई नहीं देते हैं।

अब उस एक राज्य सरकार का मामला लें, जिसको किसानों के ऋण का बैंकों को भुगतान करने के लिए और उधार लेने की जरूरत होती है। राज्य सरकारों को ऐसे-या-वैसे अधिक ब्याज पर ऋण लेने पड़ते हैं।

आर्थिक सर्वेक्षण में उल्लेख है, "कृषि-ऋण माफी की मांग ऐसे समय में सामने आयी है, जब राज्य की वित्तीय हालत खस्ता होती जा रही है। यूडीएवाई योजना ने राज्यों को बाजार उधारी बढ़ाने के लिए प्रेरित किया है, जिसे जल्द ही केंद्र सरकार की उधार से आगे निकल जाने का अंदेशा है। "

यूडीएवाई योजना मूल रूप से ऋण पुनर्गठन योजना थी, जो राज्य सरकारों द्वारा संचालित बिजली कंपनियों की बैलेंस शीट के ऋण को राज्य सरकारों की बैलेंस-शीट पर स्थानांतरित कर देती थी। इस वजह से राज्य सरकारों द्वारा अपने कर्ज पर दिये गये ब्याज का भुगतान केंद्र सरकार द्वारा अपने कर्ज से लगभग 60 आधार अंक (बेसिस पॉइंट) अधिक है। कृषि-ऋण माफी के लिए अतिरिक्त उधार लेना केवल राज्य सरकारों के ब्याज दर को बढ़ाएगा, जिससे उनके लिए चीजें और भी मुश्किल हो जाएँगीं।

साथ ही, राज्यों को उनके छूट के एक हिस्से का वित्तपोषण करने के लिए अपने पूंजीगत खर्च पर भी कटौती करनी होगी। इस वजह से अवस्फिति ( डिफ्लेशन) का झटका देश के कोने-कोने में फैल जायेगा। इसलिए, प्रत्येक व्यक्ति को दर्द का केवल एक छोटा सा हिस्सा ही लेना होगा। और वह शायद इसे पहली बार में महसूस न करे।

ये कृषि-ऋण माफी के नकारात्मक प्रभाव हैं, जो किसानों को सीधे लाभ के मुकाबले स्पष्ट रूप से दिखाई नहीं दे रहे हैं।

या महाराष्ट्र सरकार के मामले को लें- सरकार राज्य में खरीदे गये हर लीटर पेट्रोल पर 9 रुपये का सूखा-उपकर वसूलती है। ऐसा उस समय भी क्यों, जबकि राज्य में सूखा नहीं है? इसलिए कि कृषि-ऋण माफी और अन्य खर्चों में इसका उपयोग हो सकता है। सवाल यह भी है कि कितनों लोगों को इस तरह के उपकर लगने का पता है?

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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