क्या चीनी नौकरियाँ भारत आयेंगी ?


मैंने अपनी *डॉयरी * में इस विषय पर नियमित रूप से विचार किया है कि हर माह 10 लाख भारतीय कामकाजी वर्ग में शामिल हो रहे हैं , लेकिन उनके लिए पर्याप्त काम उपलब्ध नहीं हैं। कुल कहने का मतलब यही है कि भारत में सालाना लगभग एक करोड़ 20 लाख युवा काम करने लायक यानी कामकाजी वर्ग ( वर्कफोर्स ) का हिस्सा बन रहा है।

इस कामकाजी वर्ग के लिए देश में कितना काम यानी नौकरियाँ हैं ? Business Word magazine में छपी एक हालिया रिपोर्ट में उल्लेख है : “भारतीय लेबर ब्यूरो के अनुसार सभी आठ सेक्टरों में साल 2014 और 2015 में ( क्रमशः ) केवल 4.39 लाख और 1.35 लाख नौकरियों का निर्माण हुआ। ” इस प्रकार देखते हैं कि कामकाजी वर्ग का हिस्सा बन रहे लोगों के लिए नौकरियों का निर्माण मुश्किल से हो पा रहा है।

हर साल बड़ी संख्या में लोग कामकाजी वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं, ऐसे में देश के श्रम-केंद्रित सेक्टरों में व्यापक पैमाने पर आर्थिक क्रिया-कलापों का होना जरूरी है। इन सेक्टरों में ही कम-हुनरमंद, अर्द्ध-कुशल और अकुशल कामकाजी व्यक्तियों को नौकरियाँ मिल सकती हैं। ऐसा हुआ तभी देश अपनी तथाकथिक जनसांख्यिकी-बोनस का सही उपयोग कर पायेगा।

आखिर वे कौन-कौन से सेक्टर हैं, जहाँ पर देश की इस उभरते हुए कामकाजी वर्ग को नौकरियाँ देने की संभावनाएँ हैं ? इस दृष्टि से 1) परिधान (अपैरल) और 2) लेदर व फूटवेयर दो सेक्टर हैं। ‘द इकानमिक सर्वे 2016-2017’ में उल्लेख हैः “परिधान सेक्टर, ऑटो की तुलना में 80 गुना अधिक श्रम-केंद्रित और स्टील की तुलना में 240-गुना अधिक नौकरियाँ प्रदान करनेवाला सेक्टर है। लेदर गुड्स के लिए तुलनात्मक संख्या क्रमशः 33 और 100 हैं। ध्यान देने की बात है कि ये विशेषताएँ परिधान सेक्टर की हैं, न कि टेक्सटाइल सेक्टर की ।”

आँकड़ा-एक पर नजर डालेः

Figure 1: Jobs to Investment Ratio for Select Industries

आँकड़ा-एक से पता चलता है कि परिधान सेक्टर ( अपैरल सेक्टर) प्रति-एक लाख निवेश पर लगभग 24 नौकरियाँ निर्मित करता है। इतनी ही रकम के निवेश पर स्टील सेक्टर नहीं के बराबर नौकरियाँ देता है। दूसरी तरफ, लेदर और फूटवेयर सेक्टर प्रति-लाख रुपये के निवेश पर लगभग 7 नौकरियों को जन्म देता है। इस प्रकार देखते हैं कि इन सेक्टरों में नौकरियों को जन्म देने की महान संभावनाएँ हैं। गौर करनेवाली बात है कि इन सेक्टरों में नौकरियों का निर्माण करने के लिए ज्यादा निवेश की जरूरत नहीं है। यही नहीं, इनमें महिलाओं के लिए नौकरियाँ देने की जबरदस्त संभावना हैं।

जैसा कि पहले जिक्र किया गया है, एक अनुमान के मुताबिक हर माह लगभग 10 लाख भारतीय कामकाजी वर्ग का हिस्सा बन रहे हैं। यह आँकड़ा इस मान्यता पर आधारित है कि महिला श्रम हिस्सेदारी की दर बहुत ही कम है। भारतीय कामकाजी वर्ग में सबसे बड़ा हिस्सा पुरुषों का है-महिलाओं की हिस्सेदारी थोड़ी-सी है।

फिर भी, बात यह है कि आनेवाले सालों में बड़ी संख्या में महिलाओं के कामकाजी वर्ग का हिस्सा बनने की संभावना है। अगर यह सच होता है, तो हर माह 10 लाख भारतीयों के कामकाजी वर्ग का हिस्सा बनने का आँकलन वास्तविकता से कम माना जायेगा। ऐसे परिदृश्य में अपैरल, लेदर और फूटवेयर सेक्टर का विस्तार होने की स्थिति में जरूरी नौकरियों के पैदा होने की संभावना है।

इन सबसे अलग ‘द इकानमिक सर्वे’ में उल्लेख हैः “महिलाओं के लिए अवसरों के निर्माण से संकेत मिलता है कि ये सेक्टर सामाजिक निर्माण के वाहक साबित हो सकते हैं.. बांग्लादेश में अपैरल सेक्टर के विस्तार से महिला शिक्षा, कुल प्रजनन दर, और महिलाओं के श्रम बल में हिस्सेदारी पर सकारात्मक असर पड़ा। ”

दिलचस्प बात यह है कि यहाँ पर मौका एकदम सामने है। विगत दो दशकों में चीन में आर्थिक-विकास का विस्फोट देखने को मिला है। इस परिदृश्य में देश में प्रति-व्यक्ति आय में कई गुणा वृद्धि हुई है। साल 1995 में प्रति-व्यक्ति आया 610 डालर ( वर्तमान अमेरिकी डालर, विश्व बैंक डाटा) थी। साल 2015 तक प्रति-व्यक्ति आय 13 गुणा बढ़कर 8,028 डालर हो गयी।

यह बताता है कि चीन में श्रम लागत ऊँची हो गयी है। चीन जिन कुछ सामानों का पहले उत्पादन किया करता था, और जिनकी वजह से वहाँ पर्याप्त आर्थिक संपन्नता आयी, अब वह प्रतिस्पर्द्धात्मक नहीं रह गया। जहाँ तक श्रम लागत की बात है, भारत अब इसका पूरा फायदा उठा सकता है। बढ़ते श्रम-लागत से परेशान अपैरेल, लेदर और फूटवेयर निर्माण के कारोबार चीन से भारत की ओर स्थानांतरित होने चाहिए।

यह आँकड़ा-2 से स्पष्ट हो जाता है । अर्द्ध-कुशल श्रम के लिए न्यूनतम मजदूरी अधिकतर भारतीय राज्यों में वियतनाम, चीन और इंडोनेशिया से कम है। इसके बावजूद चीन द्वारा खाली हो रही जगहों पर भारत कब्जा नहीं कर पा रहा है।

Figure 2: Minimum Wages for semi-skilled workers

इकॉनमिक सर्वे में उल्लेख हैः “परिधानों (अपैरल) के मामले में चीन द्वारा खाली हो रही जगहों पर तेजी से बांग्लादेश और वियतनाम कब्जा कर रहे हैं, लेदर और फूटवेयर के मामले में वियतनाम और इंडोनेशिया । भारतीय अपैरल और लेदर कंपनियाँ बांग्लादेश, वियतनाम, म्याँमार , यहाँ तक इथोपिया स्थानांतरित हो रही हैं।“

यदि भारतीय कंपनियाँ भारत छोड़ रही हैं और दूसरे देशों में अपैरल और लेदर फर्में स्थापित कर रही हैं, तो इसमें आश्चर्य की बात नहीं है कि चीन द्वारा खाली जगहें भारत नहीं, अन्य देशों में स्थानांतरित हो रही हैं। इस पहलू को मैंने अपनी नयी किताब India's Big Government-The Intrusive State and How It is Hurting Us में रेखांकित किया हैः “वास्तव में, यदि हम लागत के कारक पर नजर डालें, तो दुनिया के 25 शीर्ष निर्यातक देशों में निर्माण-लागत सबसे कम इंडोनेशिया में है, उसके बाद भारत में है- यानी कम निर्माण लागत के मामले में भारत दूसरे नंबर पर है। इसके बावजूद यहाँ पर सोचने वाली बात यह है कि कंपनियों ने इसलिए चीन में निर्माण केंद्र स्थापित किया कि वहाँ पर निर्माण लागत कम होने के साथ शानदार बुनियादी ढाँचा भी उपलब्ध था। इस तरह का बुनियादी ढाँचा फिलहाल भारत में उपलब्ध नहीं है। एक सचाई यह भी है कि सभी पूर्वी एशियाई देश भारत की तुलना में अनुकूल कामकाजी माहौल प्रदान करते हैं।“

चीन द्वारा खाली की गयी जगह पर कब्जा करने की बात आती है, तो दो कारणों से भारत नहीं कर पा रहा है- संभार-तंत्र ( लॉजिस्टिक्स) और श्रम कानून। भारत का श्रम कानून भारतीय कंपनियों को बड़ा बनने में रुकावट डालता है और इसीलिए ये कंपनियाँ अंतरराष्ट्रीय प्रतिस्पर्द्धा में खड़ा होने लायक व्यापक अर्थ-व्यवस्था निर्मित नहीं कर पातीं।

इकॉनमिक सर्वे में उल्लेख किया गया हैः “श्रम बाजार की समस्याओं का एक लक्षण यह है कि भारतीय अपैरल और लेदर कंपनियाँ चीन, बांग्लादेश और वियतनाम की तुलना में छोटी हैं। एक अनुमान के अनुसार भारत में 78% कंपनियों में 50 से कम कर्मचारी हैं और 10 % कंपनियों में 500 से अधिक कर्मचारी काम करते हैं। दूसरी तरफ चीन में तुलनामत्मक संख्या क्रमशः लगभग 15 %और 28 % है।“

आँकड़ा-3 पर नजर डालें। इसमें विभिन्न देशों की लॉजिस्टिक्स लागत को दर्शाया गया है। भारत सबसे निचले स्तर पर आता है। वास्तविकता में लॉजिस्टिक्स लागत भारत और वियतनाम का समान है। इसके बावजूद भारत की तुलना में वियतनाम से अमेरिकी ईस्ट कोस्ट तक सामान पहुँचाने में कम समय लगता है। यह वियतनाम के पक्ष में जाता है।

Figure 3:

निष्कर्ष, चीन द्वारा खाली की गयी जगह पर कब्जा करने का मौका खत्म होता जा रहा है। अगर चीन की खाली हो रही जगह पर भारत अपना अधिकार करना चाहता है, तो इसे अपने तौर-तरीकों को जल्द-से-जल्द दुरुस्त करने की जरूरत है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल’स डॉयरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ * के संपादक है। विवेक कौल एक लेखक हैं । वे पूर्व में ‘डेली न्यूज एंड अनैलिसिस’ (डीएनए) और ‘द इकोनॉमिक्स टॉइम्स’ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। वे ‘द इजी मनी ट्रिलॉजी’ के लेखक हैं। ट्रिलॉजी की नवीनतम किताब ‘इजी मनीः द ग्रेटेस्ट पोंजी स्कीम एवर एंड हाउ इट इज सेट टू डिस्ट्रॉय द ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम’ मार्च 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब एमजॉन की बेस्ट सेलर साबित हुई । विवेक कौल ने ‘द टॉइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द हिंदू’, ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’, ‘बिजनेस वर्ल्ड’, ‘बिजनेस टुडे’, ‘इंडिया टुडे’, ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’, ‘फोर्ब्स इंडिया’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘द एशियन एज’, ‘म्युचुअल फण्ड इंनसाइट’, ‘वेल्द इनसाइट’, ‘स्वराज्य’, ‘बंगलौर मिरर’ और अन्य के लिए भी लिखा है।*

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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