क्या रिज़र्व बैंक वित्त-मंत्रालय का एक मातहत विभाग है?


भारतीय रिजर्व बैंक ने 6 अप्रैल, 2017 को नवीनतम मौद्रिक-नीति रिपोर्ट जारी की। इस रिपोर्ट में रिजर्व बैंक ने कहा, " चौथी तिमाही [जनवरी से मार्च 2017] में रीमनिटाइजेशन में तेजी से प्रगति हुई। संक्षेप में, रीमनिटाइजेशन की तीव्र गति के परिणामस्वरूप 2017-18 में आर्थिक गतिविधि सामान्य हो जानी चाहिए ।"

रीमनिटाइजेशन का कुल मतलब होता है : रिजर्व बैंक द्वारा मुद्रा की छपाई करना , और फिर उसको नोटबंदी के कारण बेकार हुई मुद्रा की जगह डालना। 8 नवंबर, 2016 को 500 रुपये के 1,000 मूल्य-वर्ग के नोटों को अवैध यानी प्रतिबंधित कर दिया गया था। तब से रीजर्व बैंक इन प्रतिबंधित नोटों को 500 और 2,000 मूल्य-वर्ग के नये नोटों और पहले से वैध नोटों से बदल रहा है।

मौद्रिक नीति रिपोर्ट में भारत के केंद्रीय बैंक का दावा है कि जनवरी और मार्च 2017 के बीच त्वरित / तेज गति पर रीमनिटाइजेशन का काम किया गया है। परेशानी यह है कि इसका अपना डाटा ही कुछ और दिखा रहा है। चित्र-1 पर एक नज़र डालें।

यह मध्य जनवरी 2017 से मध्य मार्च 2017 तक प्रचिलत मुद्रा में वृद्धि की साप्ताहिक दर को दर्शाता है।

चित्र-1:

जैसा कि चित्र-1 से देखा जा सकता है: जनवरी के आरंभ से प्रचलन ( सर्क्युलेशन) में मुद्रा की साप्ताहिक वृद्धि धीमी हो रही है। प्रचलन में मुद्रा की साप्ताहिक वृद्धि कैसे प्राप्त की जाती है? 6 जनवरी, 2017 तक प्रचलित-मुद्रा 8,98,017 करोड़ रुपये थी। यह 13 जनवरी, 2017 तक 9, 50, 803 करोड़ रुपये तक पहुंच गयी। इसका मतलब कि 52,786 करोड़ रुपये यानी 5.9 % (52,786 करोड़ रुपया 8,98,017 करोड़ रुपये से विभाजित ) की वृद्धि हुई। तब से इस तरह की गणना साप्ताहिक तौर पर की जाती है। प्रचलित-मुद्रा में साप्ताहिक वृद्धि की गणना भी इसी तरह की जाती है।

वास्तव में, 6 जनवरी 2017 से, मार्च 2017 के अंत तक, प्रचलित-मुद्रा में साप्ताहिक वृद्धि तीन माह के निचले स्तर पर थी। इससे स्पष्ट होता है कि हाल ही में फिर क्यों एटीएम में मुद्रा के लाले पड़ गये।

अप्रैल 2017 में, अतीत की तुलना में प्रचलित-मुद्रा में साप्ताहिक-वृद्धि थोड़ी ही बढ़ी है। फिर भी, हमें यह याद रखना चाहिए कि प्रचलित-मुद्रा की स्थिति नवंबर 2016 के पहले जैसा सामान्य होने में अभी काफी समय लगेगा।

4 नवंबर 2016 को कुल प्रचलित-मुद्रा लगभग 17.98 लाख करोड़ रुपये पर थी। रिजर्व बैंक से उपलब्ध नवीनतम आंकड़ों के अनुसार 14 अप्रैल, 2017 को कुल 13.9 लाख करोड़ रुपये थे। तब और अब के बीच का अंतर 22.7 % है। नोटबंदी पर लिखे लेखों में मैंने कहा था कि प्रतिबंधित नोटों की जगह नये नोटों को लाना मई 2017 तक संभव हो पायेगा। लेकिन रिजर्व बैंक की मौजूदा चाल को देखते हुए लगता है कि और समय लग सकता है।

साथ ही, मौद्रिक नीति रिपोर्ट में आरबीआई ने रीमनिटाइजेशन तेज गति से होने का दावा किया है। लेकिन चित्र-1 से साबित नहीं होता है। जनवरी की शुरुआत में मुद्रा में प्रचलित-मुद्रा की साप्ताहिक वृद्धि दर 6 प्रतिशत के करीब थी। मार्च के अंत तक यह 1.7 प्रतिशत पर आ गया।

सरकार को प्रचलित-मुद्रा में कमी लानी चाहिए, जिससे लोग भुगतान के डिजिटल रूपों की तरफ बढ़ सकें- इस दलील को समर्थन मिल रहा है। हालांकि, इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि डिजिटल पेमेंट का तरीका अच्छा है, लेकिन एक सचाई यह भी है कि इसमें समय लगेगा- कुछ महीनों में नहीं होगा। दशकों से मनुष्य की आदतें तेजी से बदलती नहीं हैं। एक गौर करनेवाली बात है कि सरकार को प्रचलित-मुद्रा का परिमाण, नोटबंदी से पूर्व की स्थिति में लाने की जरूरत होगी। हर अर्थव्यवस्था को कार्य करने के लिए एक निश्चित धन-राशि की ज़रूरत होती है । हाल की मुद्रा की कमी को ध्यान में रखें तो हमें उस दशा में आने में समय़ लगेगा।

सवाल यह है कि प्रचलित-मुद्रा में वृद्धि की साप्ताहिक दर धीमी क्यों हो गयी है। क्या रिजर्व बैंक और सरकारी छापाखाने एक दिन में तीन पाली काम नहीं कर रहे हैं, जैसा कि वे पहले कर रहे थे? क्या कागज और स्याही की कमी है? इन चीजों के बारे में केवल रिजर्व बैंक या सरकार ही जवाब दे सकती है। मजेदार बात ये है कि रिजर्व बैंक एक बीट (कार्य-क्षेत्र) के रूप में कवर करने वाले बैंकिंग पत्रकारों ने अभी तक यह सवाल केंद्रीय बैंकर से नहीं किया है। रिजर्व बैंक का बयान बताता है कि रीमनिटाइजेशन की प्रक्रिया में साप्ताहिक वृद्धि तेज गति से हो रही है। जबकि भारतीय रिजर्व बैंक के अपने आँकड़े ही उसके दावे की पुष्टि नहीं करते हैं।

नोटबंदी के आरंभ से ही सरकार की बातें इससे सफलता के रूप में पेश करती रही हैं, तो सरकार ऐसा क्यों कर रही है, समझ में आता है। रिजर्व बैंक भी सरकार के सुर-में-सुर मिला रहा है।

वर्ष 1 9 57-19 56 के बीच देश के वित्त मंत्री रहे टीटी कृष्णमामाचारी (टीटीके) ने रिजर्व बैक के बारे में एक बार कहा था। उनकी वो बातें मुझे याद आती हैं। टीसीए श्रीनिवास राघवन ने Dialogue of the Deaf—The Government and the RBI में लिखा है: "टीटीके ने जोरदार ढंग से अपने विचार व्यक्त किये हैं ... रिजर्व बैंक, ‘वित्त मंत्रालय के अधीनस्थ विभाग’ से अधिक नहीं था।"

नोटबंदी के मामले में, भारतीय रिजर्व बैंक स्पष्ट रूप से वित्त मंत्रालय के अधीनस्थ विभाग की तरह व्यवहार कर रहा है। और यह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छा संकेत नहीं है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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