मानो-न-मानो, मैन्युफैक्चरिंग पर नोटबंदी का असर तो पड़ा है


भारत में अब एक नया औद्योगिक उत्पादन सूचकांक (IIP-Index of Industrial Production) काम कर रहा है। यह अधिक बड़ा और ऐसी चीजों की खोज-खबर रखनेवाले अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह पहले से बेहतर है।

आइआइपी मूलरूप से तीन – विनिर्माण (Manufacturing), खनन (Mining) और विद्युत (Electricity)- क्षेत्रों में वृद्धि संबंधी आँकलन करता है। आइआइपी में विनिर्माण-क्षेत्र की तीन-चौथाई से अधिक हिस्सेदारी है। नयी आइआइपी का आधार वर्ष पहले के 2004-05 से बदलकर 2011-12 कर दिया गया है। कालावधि में औद्योगिक-क्षेत्र में आये बदलाओं को प्रतिबिंबित करने और “ सकल घरेलू उत्पाद ( GDP-Gross Domestic Product), थोक-मूल्य सूचकांक (WPI-Wholesale Price Index) जैसे अन्य व्यापक आर्थिक संकेतकों के आधार-वर्ष के साथ इसका तालमेल बिठाने के लिए ऐसा किया गया है। ”

किसी भी अन्य सूचकांकों की तरह आइआइपी विनिर्माण, खनन,और विद्युत क्षेत्रों में काम आने वाली विभिन्न चीजों की खोज-खबर रखता है। इन चीजों को समय-समय पर बदलने या फिर इन पर पुनर्विचार करने की जरूरत है। इसलिए कि इससे आइआइपी खासकर विनिर्माण, खनन और विद्युत सेक्टरों और सामान्य रूप से उद्योग-क्षेत्र का प्रतिनिधि बना रहेगा। नये आइआइपी के अंतर्गत विनिर्माण-क्षेत्र की कुल 809 चीजें हैं। इसके पूर्व में 620 चीजें थीं। आइआइपी के निर्माण हिस्से की चीजों की संख्या हालांकि बढ़ गयी है, इनमें 124 चीजों को हटा भी दिया गया है। इनमें गुटखा, कैल्कुलेटर और कलर टीवी पिक्चर ट्यूब शामिल हैं। सीमेंट क्लिंकर, चिकित्सकीय और सर्जिकल एक्सेसरी, रिफाइंड पाम आयल आदि चीजों को शामिल भी किया गया है। इसी तरह विद्युत सेक्टर में अक्षय-ऊर्जा (Renewable Energy) सेक्टर के डाटा भी शामिल हैं।

इसके अलावा, सूची में शामिल फैक्ट्रियों की संख्या बढ़ी है, जिनसे डाटा प्राप्त होगा और बंद के नाम हटा दिये गये हैं। कुल मिलाकर ये कदम इसलिए उठाये गये हैं कि नयी आइआइपी उद्योग को पहले से बेहतर ढंग से पेश करे। इस लिहाज से, आइआइपी में शामिल चीज़ों में बड़े पैमाने पर बदलाव किये गये हैं। आश्चर्य की बात नहीं कि आइआइपी का वृद्धि संबंधी आँकड़ा भी परिवर्तित हुआ है।

चित्र-1 पर नजर डालें

यह अप्रैल 2012 के बाद के पाँच साल के नये और पुराने आइआइपी की वृद्धि-दरों को दर्शाता है।

चित्र-1

चित्र-1 पर मात्र एक नजर डालने से पता चल जाता है कि पुरानी आइआइपी और नयी आइआइपी दोनों बिलकुल अलग हैं। हालाँकि ये दोनों बहुत अस्थिर हैं। अब मार्च 2013 का एक डाटा लें। पुराने आइआइपी सिरीज के अनुसार वृद्धि दर 3.5 % थी। इसके विपरीत नयी आइआइपी सिरीज वृद्धि दर 15.1 % बताती है। इस तरह पुराने और नये आइआइपी में अंतर नजर आता है। वास्तव में नयी आइआइपी के अनुसार 2014-15 यानी कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार के अंतिम वर्ष में औद्योगिक वृद्धि 3.3% थी। पुरानी आइआइपी के अनुसार वृद्धि 0.1% थी। इस प्रकार हम यह निष्कर्ष निकाल सकते हैं कि कांग्रेस सरकार के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में औद्योगिक दशा उस समय जितनी खराब दिख रही थी, वैसी थी नहीं ।

बात सिर्फ इतनी-सी थी कि पुरानी आइआइपी शायद भारतीय उद्योग का पहले जैसा सही प्रतिनिधित्व नहीं कर रही थी। वास्तव में नयी आइआइपी दर्शाती है कि औद्योगिक वृद्धि ने पिछले वित्तीय वर्ष यानी 2016-17 में गति पकड़ी है। वद्धि दर 5.1 % रही थी, जबकि पुरानी आइआइपी के अनुसार वर्ष के दौरान 0.6% रही। यह हमें यह भी बताता है कि दोनों आइआइपी में कोई समानता नहीं है। एक रोचक बात है कि नयी आइआइपी विनिर्माण-क्षेत्र में लोकप्रिय हो रही है। पुरानी आइआइपी की 75.5 % की तुलना में नयी आइआइपी में निर्माण-क्षेत्र की हिस्सेदारी 77.6% है। तालिका-1 पर नजर डालें।

तालिका-1 : विनिर्माण-वृद्धि (Manufacturing Growth)
Period Manufacturing Growth(in %)
Dec 2012 to Mar 2013 9.4
Dec 2013 to Mar 2014 3.7
Dec 2014 to Mar 2015 3.2
Dec 2015 to Mar 2016 4.9
Dec 2016 to Mar 2017 1.6

स्रोतः सेंटर फार मॉनिटरिंग इंडियन इकॉनमी

दिसंबर 2016 और मार्च 2017 के बीच विनिर्माण-क्षेत्र ने 1.6% की दर से वृद्धि की। समान अवधि में पिछले वर्षों से तुलना करें, तो यह सबसे धीमी वृद्धि दर थी। ऐसा क्यों हुआ ? इसका जवाब मात्र एक शब्द में है-नोटबंदी। नरेंद्र मोदी सरकार ने 8 नवंबर 2017 को 500 और 1,000 रुपये के नोटों को अवैध घोषित कर दिया। इससे देश की अर्थ-व्यवस्था कलाबाजी खाने लगी। लेकिन एक रोचक बात यह रही कि अप्रैल 2016 और अक्टूबर 2016 के बीच औसत विनिर्माण-वृद्धि 6.7% रही। वर्ष 2015-16 में लगभग 3 और 2013-14 में 3.8 की वृद्धि दर्ज के बाद इसने विनिर्माण सेक्टर के पुनरुत्थान का संकेत दिया। नोटबंदी ने विनिर्माण-क्षेत्र के पुनरुत्थान को झटका दिया था। यहीं पर, एक बात गौर करने लायक है कि ‘आइआइपी डाटा, फैक्ट्रीज़ एक्ट-1948 के अधीन पंजीकृत संगठित क्षेत्र की इकाइयों से एकत्रित किया जाता है।’

इसका मतलब यह हुआ कि आइआइपी असंगठित क्षेत्र की कंपनियों को कवर नहीं करता है। मैंने पहले लिखा भी है कि नोटबंदी का सबसे व्यापक प्रभाव इन्हीं असंगठित क्षेत्र के कारोबार पर पड़ा है। अभी तक सरकार ने भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर नोटबंदी के प्रभाव से इनकार किया है। मेरा मानना है कि असलियत को जानने के लिए आइआइपी आँकड़ों पर नजर डालने की जरूरत है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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