मिथक कायम है कि रियल- इस्टेट हमेशा भारी रिटर्न देता है

आँकड़ों के सामने मिथक यानी झूठे विश्वास कहीं नहीं ठहरते। लेकिन परेशानी की बात यह है कि भारत का रियल-इस्टेट क्षेत्र बेहद अपारदर्शिता का शिकार रहा हैः इस क्षेत्र का समुचित विश्लेषण करने के लिए हमारे पास संबंधित पर्याप्त आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इस प्रक्रिया में, यह मिथक बना हुआ है कि कोई भी रियल-इस्टेट निवेश हमेशा ही भारी मात्रा में रिटर्न प्रदान करता है।

शुक्र है कि अब हमारे पास रियल-इस्टेट संबंधी आँकड़े उपलब्ध हो गये हैं। कुछ समय पहले, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों के नियामक, राष्ट्रीय आवास बैंक (एनएचबी) ने एक एकदम नये आवास मूल्य सूचकांक (RESIDEX ) का शुभारंभ किया। सूचकांक देश भर में 50 शहरों की आवास कीमतों की जानकारी पेश करने का दावा करता है; हालांकि मुझे केवल 49 के आंकड़े मिल सके। इस कॉलम में, मैं बैंकों और अन्य उधार देने वाली एजेंसियों द्वारा आवास के बारे में दी गयी जानकारी के आधार पर एचपीआई @ मूल्यांकन मूल्य के रूप में उल्लिखित आंकड़ों पर नजर डालता हूँ।

इससे हमें पिछले विगत वर्षों में रियल-इस्टेट की कीमतों की दिशा के बारे में कुछ नयी सोच बनाने में मदद मिल सकती है। और पहली बार शहरवार वास्तविक रिटर्न की गणना करने में शायद हम सक्षम हो सकें। इससे अचल-संपत्ति ( रियल-इस्टेट ) में विशेष आसक्ति रखनेवालों को पिछले कुछ वर्षों के दौरान इसमें उनके अपने निवेश के प्रदर्शन के बारे में पता चल सकता है।

जैसा कि मैंने शुरुआत में कहा था, NHB RESIDEX 50 शहरों में आवास कीमतों की जानकारी देता है। तालिका-1 पर नजर डालें: इसमें जून 2013 और मार्च 2017 के बीच इन शहरों के प्रति वर्ष रिटर्न को दर्शाया गया है। यह मार्च 2016 से फरवरी 2017 के बीच के एक साल का रिटर्न भी दिखाता है। इसके अलावा, भले ही इसमें 50 शहरों का आंकड़ा दर्ज है, फिर भी यह एक अखिल भारतीय सूचकांक होने का दावा नहीं कर सकता है, क्योंकि कई शहर जो अलग शहर के रूप में दिखाये गये हैं, वे दरअसल मुंबई और दिल्ली जैसे बड़े शहरों के उपनगर हैं। इसके अलावा, राज्यों के कुछ बड़े शहरों को सूचकांक में प्रतिनिधित्व नहीं मिला है। इसमें झारखंड में जमशेदपुर, तमिलनाडु में मदुरै, पंजाब में जालंधर, उत्तर प्रदेश के इलाहाबाद और वाराणसी शामिल हैं।

फिर भी, सूचकांक एक अच्छी शुरुआत है; जो हमें भारत में रियल-इस्टेट बाजार की दशा और दिशा की एक अच्छी समझ दे सकता है। इसके साथ ही, पिछले सालों में भारतीय रियल-इस्टेट बाजार के अच्छे या खराब प्रदर्शन के बारे में अच्छी समझ प्रदान करेगा। आमतौर पर, इस तरह की जानकारी सार्वजनिक दायरे में शायद ही कभी उपलब्ध होती है, जिससे कि भारतीय रियल-इस्टेट निवेश को लेकर हम हमेशा के लिए निश्चिंत हो जायें।

तालिका-1 :
Name of the city Return per year between June 2013 and March 2017 (in %) One-year return between March 2016 and March 2017 (in %)
1 Mumbai 6.7 2.8
2 Delhi -2.6 5.8
3 Bengaluru 7.3 7.5
4 Kolkata 6.5 2.9
5 Chennai 7.1 10
6 Pune 7.2 9.5
7 Nagpur 5.6 11.2
8 Nashik 2.5 -0.25
9 Kalyan Dombivali 8.6 7.4
10 Mira Road-Bhayander 5.11 2.9
11 Navi Mumbai 3.4 -8.9
12 Panvel 2.9 -7.1
13 Thane 7.1 2
14 Vasai Virar 3.2 2.3
15 Chakan 6 0.7
16 Pimpri Chinchwad 5.2 3.5
17 Coimbatore -0.8 -10.5
18 Ahmedabad 0.5 6.8
19 Surat 3.5 3.6
20 Vadodra 1.6 7.9
21 Rajkot 2.5 0.3
22 Gandhinagar -7.8 -11.1
23 Kanpur 8.3 11.3
24 Lucknow 4.7 1.9
25 Meerut 13.5 6
26 Ghaziabad 2.9 9.7
27 Greater Noida 4.3 0
28 Noida 2.7 0
29 Howrah 10.5 15.6
30 New Town Kolkata 4.2 -7.8
31 Bidhanagar excluding Rajarhat 5.4 -1.8
32 Chandigarah(Tricity) 2.1 -5.4
33 Ludhiana 4.8 0
34 Faridabad 3.7 12.3
35 Gurugram 4.8 7.4
36 Jaipur 5.2 -1.5
37 Bhiwadi 1.6 -14
38 Indore 6.2 6.9
39 Bhopal 3.2 0.4
40 Vizag 10.3 24.7
41 Vijaywada 8.8 1.2
42 Kochi 6.8 4.1
43 Thiruvananthapuram 7.7 -0.5
44 Hyderabad 4.1 2.2
45 Patna 2.6 -7.1
46 Guwahati 4 8.2
47 Dehradun 0 4.8
48 Ranchi -2.6 -17.7
49 Bhubaneswar 1.5 7.5

Source: Author calculations on data obtained from https://residex.nhbonline.org.in/NHB_Residex.aspx

तालिका-1 से हमें बेहद दिलचस्प जानकारी प्राप्त होती है: अगर हम जून 2013 से विभिन्न शहरों में प्रति वर्ष रिटर्न पर गौर करते हैं; तो रियल-इस्टेट के रखरखाव के नियमित खर्चों को पूरा करने और महँगाई से निपटने के लिए बहुत कम शहरों में 10 % से अधिक सालाना रिटर्न प्राप्त होता है। नियमित खर्चों में रखरखाव-प्रभार (चार्ज), जो हर महीने हाउसिंग सोसाइटी को भुगतान करना होता है और सालाना संपत्ति-कर ; शामिल होगा। बेशक, घर किराये पर दिया जा सकता है। किराये से प्राप्त आय प्रति वर्ष लगभग 2 प्रतिशत तक हो सकती है। ( किराये से प्राप्त आय, दरअसल आवास की बाजार-कीमत से विभाजित वार्षिक आवास-किराया, होती है।) यदि आवास को आपने होम लोन पर खरीदा होता है, तो इस होम-लोन पर ब्याज का भुगतान करना होता है। आपको कर-कटौती का लाभ भी मिलता है।

जून-2013 के बाद से, केवल तीन शहरों- मेरठ, हावड़ा और विशाखापत्तनम- ने प्रति वर्ष 10 % से अधिक रिटर्न दिया है।

दरअसल, 49 शहरों में अचल-संपत्ति निवेश पर रिटर्न प्रतिवर्ष 4.3% की मध्यवर्ती-दर से प्राप्त हो रहा है। जॉन एलेन पॉलोस ने Beyond Numeracy में लिखा है: “The median of a set of numbers is the middle number in the set.”

इसलिए, यह आसानी से समझा जा सकता है कि अचल-संपत्ति में बड़े पैमाने पर काले धन का निवेश न हो पाने के कारण, जून 2013 के बाद से इस पर रिटर्न पूरे देश में नाम-मात्र का रहा है। यहीं से NHB RESIDEX data उपलब्ध है।

मार्च 2016 से फरवरी 2017 के बीच की एक साल की अवधि में स्थिति खराब हो गई है। रिटर्न की मध्यवर्ती-दर में 2.8 % तक गिरावट आयी है। वास्तव में, अगर हम विशाखापत्तनम का नाम हटा दें, जहाँ इस अवधि में रिटर्न 25% के करीब रहा, तो रिटर्न की मध्यवर्ती-दर 2.55% पर आ जाती है। इसकी तुलना में बचत बैंक खाते में अधिक रिटर्न प्राप्त हुआ होता।

इसका तात्पर्य यह है कि पूरे देश में रियल-इस्टेट रिटर्न में इधर कमी आयी है। दरअसल, मार्च 2016 और फरवरी 2017 के बीच 49 शहरों में से 13 में रियल-इस्टेट की कीमतें गिरी हैं। यह स्थिति तब बनती है, जब हम सिर्फ कीमतों पर नजर डालते हैं। लेकिन, अगर हम अन्य खर्चों को ध्यान में रखते हैं ( रखरखाव शुल्क, संपत्ति-कर, कर-लाभों और मुद्रास्फीति आदि के समायोजन के बाद आवास-ऋण पर ब्याज का भुगतान) अन्य कई मामलों में असली-रिटर्न नकारात्मक होगा।

बेशक, यह तर्क शहरों के weighted average prices पर काम करता है- व्यक्तिगत अनुभव अलग-अलग हो सकते हैं। इसके अलावा, तर्क पूरी तरह से अलग हो सकता था अगर रियल-इस्टेट की खरीदी में काले धन का निवेश किया गया होता।

इसलिए, पाते हैं कि निवेश के रूप में रियल-इस्टेट पिछले 4 वर्षों में किसी काम का नहीं रहा। हालात, पिछले एक साल में और खराब हुए हैं। ऐसी दशा में रियल-इस्टेट की कीमतें नीचे नहीं आ रही हैं, बावजूद की नोटबंदी के बाद बिक्री धड़ाम से गिरी है।

हाल ही में, रियल-इस्टेट सलाहकार कंपनी PropEquity ने कुछ दिलचस्प आँकड़े जारी किये हैं: जनवरी और मई 2017 के बीच की अवधि के लिए, 42 प्रमुख शहरों में आवास की बिक्री 41 % घटकर 1.1 लाख रह गई। 2016 में इसी अवधि के दौरान बिक्री 1.87 लाख थी।

लेकिन वास्तव में, मार्च 2016 और मार्च 2017 के बीच मध्यवर्ती-मूल्य (median price) में हमें कोई गिरावट नहीं दिखायी दी है। हालांकि कुछ समय से अचल-संपत्ति अच्छे निवेश अनुकूल साबित नहीं हुआ है। लेकिन ऐसी स्थिति भी नहीं आयी है कि कोई किसी भी शहर में आवास खरीदना चाहता हो और खरीद सके। इसकी क्या वजह हो सकती है ?

क) जो लोग काले धन की मदद से, पहले से ही रियल-इस्टेट में निवेश किये हुए हैं, उनके साथ एक परेशानी है: वह यह है कि यदि वे अपनी प्रॉपर्टी अभी बेचते हैं, तो इससे नकदी रूप में कालाधन प्राप्त होगा। इस काले धन का इस्तेमाल करने का विकल्प उनके पास नहीं है।

वजह यह है कि अचल-संपत्ति द्वारा उत्पन्न कालाधन फिर से फिर से रियल-इस्टेट में ही लगता है। लेकिन हालात ये हैं कि पिछले कुछ सालों से रियल-इस्टेट ने बहुत कम रिटर्न दिया है। ऐसे में इस काले को रियल-इस्टेट में लगाने का कोई मतलब नहीं है।

ख) कुछ मामलों में, निवेशक घाटे का सामना करते हुए भी कीमतों में तेजी आने का इंतजार कर रहे होते हैं। Richard Thaler ने Misbehaving—The Making of Behavioural Economics में लिखा है: "मोटे तौर पर कहा जा सकता है कि मुनाफा आपको जितना अच्छे का एहसास कराता है, नुकसान उससे दोगुने की चोट पहुँचाता है। ”

दरअसल निवेशकों में यह प्रवृत्ति देखने को मिलती है कि अपने निवेश पर वे नुकसान का सामना कर रहे होते हैं,तो भी वे तब तक उसका नुकसान उठाते रहते हैं, जब तक कि फिर से बाजार में सकारात्मक स्थिति नहीं आ जाती। परिणामस्वरूप, कीमतों में धीमा सुधार होता है।

ग) कुछ अन्य मामलों में, निवेशक रियल-इस्टेट के वर्ष 2002 और 2011 का वह तेजी का दौर दिमाग में बिठाये हुए हैं,जब उनके मित्रों, रिश्तेदारों और परिचितों को शानदार रिटर्न हासिल किया था। वे उस दौर की वापसी का इंतजार कर रहे हैं। हम उन्हें शुभकामनाएँ देते हैं।

घ) पिछले साल तक ऐसी सुविधा थी कि जिस आवास में आप खुद रहते हैं और उस आवास को अगर आपने होम लोन पर लिया हुआ है, तो होम लोन की ईएमआइ के ब्याज का हिस्सा 2 लाख रुपये तक माफ हो सकता था। लेकिन ऐसा आवास, जिसे आपने होम-लोन पर लिया हुआ है, मगर आप उसमें स्वयं रहते नहीं हैं, तो अगर आप उस आवास से प्राप्त आय को अपने करयोग्य आय में दर्शाते हैं, तो उस आवास के होम-लोन की ईएमआइ का ब्याज वाला भाग चाहे जितना हो माफ हो जाता है।

आमतौर पर, आवासों की ऊँची कीमत को देखते हुए, इन दिनों होम लोन पर जो ब्याज का भुगतान किया जाता है, वह अगर आवास को किराये पर दिया जाता है, तो उससे प्राप्त किराये से कई गुणा अधिक होता है। इस तरह देखते हैं कि दूसरा आवास (या तीसरा, चौथा या पाँचवाँ जितनी भी संख्या हो) खरीदकर, व्यक्ति भारी कर कटौती का लाभ प्राप्त कर सकते हैं और अपनी कर योग्य आय को नाटकीय रूप से नीचे ला सकते हैं । कॉरपोरेट दुनिया के लोगों ने ऊँचे पायदान पर बढ़ने के साथ दूसरे और तीसरे आवासों की खरीदी कर इस विसंगति का पूरा फायदा उठाया है। इस तरह वे पक्का कर लेते हैं कि यदि रियल-इस्टेट की कीमतों में इजाफे से उनको फायदा भले न मिले कर से छूट प्राप्त लाभ के सहारे वे रियल-इस्टेट में निवेश बनाये रख सकते हैं।

अपने बजट भाषण में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने सभी तरह की कटौतियों (स्वयं के इस्तेमाल वाले और साथ ही होम लोन के माध्यम खरीदे गये) को 2 लाख रुपये तक सीमित कर दिया। इसने करों की कटौती का लाभ लेने के लिए आवासों की खरीदी का बाजार अब प्रभावी ढंग से समाप्त कर दिया है। अब देखना होगा कि कीमतों पर इसका असर पड़ता है कि नहीं।

निष्कर्ष यह है कि वास्तविक कीमत सुधार के बिना रियल-इस्टेट क्षेत्र में गड़बड़ी जारी रहने का अंदेशा है। निवेशकों ने इस क्षेत्र को सालों से जिंदा रखा है। अब समय आ गया है कि रियल-इस्टेट कंपनियाँ इस असलियत को स्वीकार करें। अगर वे आने वाले सालों में पैसा बनाते रहना चाहतीं हैं, असली आवास खरीदारों के हितों का भी खयाल रखें। जब तक ऐसा नहीं होता, तो इस क्षेत्र के लिए किसी भी तरह के अच्छे दिन नजर नहीं आते।

नोट : मूल रूप से 14 जुलाई 2017 को Vivek Kaul Letter में प्रकाशित। यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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