मुझे मालूम नहीं सनकी मैं हूँ या ये सरकारें !


मेरी शिक्षा किसी भी हालात में मुझे पहले से ही बदतरीन देखने को प्रवृत्त करती है। - हॉर्वर्ड जैकाब्सन, The Dog’s Last Walk (and other pieces)

प्रिय पाठक,

एक आरोप मुझ पर लगातार लगता रहा है कि मैं अधिकतर चीजों के प्रति अक्सर, जरूरत से ज्यादा निराशावादी और सनकी हूँ। लोग ठीक ही कहते होंगे-शायद मेरा स्वभाव ही कुछ ऐसा है।

मैं लालू प्रसाद यादव और उनकी अर्द्धांगिनी राबड़ी देवी के पूर्वशासित राज्य बिहार में पला-बढ़ा हूँ : ऐसे राज्य में जहाँ मई जैसी भीषण गर्मी वाले माह में भी एक बार लापता बिजली दो-दो सप्ताह तक गायब रहती थी। मेरी एमबीए की पढ़ाई बीच में ही छूटते-छूटते बची, पीएचडी तो बीच में ही छोड़नी पड़ी और आखिर में, इस सफर के दौरान सात साल पत्रकारिता की नौकरी की। ऐसे हालात में अगर आप होते, तो शायद आपकी की स्थिति भी मेरी जैसी होती।

अब चूँकि कोई और मेरे जैसे हालात से नहीं गुजरा है, ऐसे में हम नहीं कह सकते कि उनके स्वभाव या कहें हालात कैसे होते।

मेरा जैसे महौल या वातावरण में पला-बढ़ा हूँ, शायद उसकी वजह से मैं अपने चारों तरफ की अधिकांश चीजों के प्रति सनकी व्यवहार करता हूँ। लेकिन कुछ दिन पहले मैंने ऐसी चीजें देखीं कि मेरा सनकीपन चंद पलों के लिए ही सही, काफूर हो गया।

आखिर वह कौन-सी बात थीः दरअसल, वह शुक्रवार की रात थी। मैं इस उधेड़बुन में था कि खाना क्या बनाऊँ। ( मेरे लेख पढ़नेवाले मर्द , बेशक, सोचतें होंगे कि क्या खाना बनाने के काम में ऐसे सवाल भी पैदा होते हैं क्या। लेकिन, मेरी तरह, अगर कोई 15 साल से लगातार खाना बना-खा रहा हो, तो मेरा विश्वास करें, एक समय के बाद यह काम बोझिल और उबाऊ हो जाता है। ऐसे, में उन सभी महिलाओं की जय-जयकार करने का मन करता है, जो सालों से रोजाना अपने परिवार के लिए खाना बनाती आ रही हैं।) मेरे किचेन में प्याज और टमाटर के ठाले पड़ गये थे। मेरा मानना है कि मेरे किसी भी प्रकार के खाने के लिए ये दोनों अनिवार्य हैं।

इसलिए मैं सब्जी खरीदने के लिए बाहर निकला- अब की बार ऑनलाइन सब्जी मार्केट बिग बॉस्केट से खरीदारी न करने का फैसला किया। इसलिए कि ये जरूरत के मुताबिक तत्काल डिलिवरी नहीं करते। कई बार तो सप्ताहांत 48 घंटे तक इंतजार करवा देते हैं।

मेरे निवास स्थल के पास एक स्पोर्ट्स क्लब और इससे लगा एक मैदान है। जैसा कि मुंबई में आमबात है, ऐसी जगहों का आमतौर पर उपयोग खेल-गतिविधियों के बजाय अधिकतर विवाह और धार्मिक आयोजनों के लिए होता है। मेरी राय में ऐसी स्थिति, महानगर में जगह की कमी के कारण है। इसलिए खाली जगहों का उपयोग विभिन्न प्रकार के कामों के लिए हर किसी द्वारा किया जाना चाहिए। ऐसा ही मुंबई में हो रहा है।

जिस मैदान की बात मैं कर रहा हूँ, उसमें सब्जी और फल विक्रेता जमा हैं। ये निश्चित तौर पर, पास स्थिति सब्जी मार्केट के नियमित विक्रेता नजर नहीं आ रहे थे। इससे मुझमें एक उत्सुकता जगी और उनके पास चला गया। मुझे बताया गया कि यहाँ के सब्जी और फल विक्रेता मूल रूप से किसान थे और वे महाराष्ट्र के नाशिक जिले से आये हुए थे।

यह साप्ताहिक हाट था और हर शुक्रवार को शाम 4 बजे से रात 9 बजे तक लगता था। यह हाट पिछले तीन माह से लग रहा था, लेकिन मुझे इसकी जानकारी अब जाकर हुई थी। मैं एक नये रोमांच के साथ सब्जी और फल खरीदने में जुट गया। मैंने वे चीजें भी खरीद लीं, जिनकी मुझे जरूरत भी नहीं थी।

फल और सब्जियाँ काफी ताजी थीं। पास के सब्जी मार्केट की तुलना में कीमतें काफी बेहतर थीं।

मैंने अंगूर 50 रुपये प्रति किलो मिली। पिछले लगभग 12 महीनों में इतनी कम कीमत पर तो कभी नसीब नहीं हुई थी। मैंने लाल शिमला मिर्च 40 रुपये प्रति किलो खरीदा, जिसे गोदरेज का रिटेल सेंटर ‘नेचर्स बास्केट ’ 300 रुपये प्रति किलो तक बेचता है।

बात यही नहीं खत्म होती हैः सब्जी-फल विक्रेता किसानों ने बताया कि उनके फल केमिकल से नहीं पकाये गये हैं। हालाँकि मैं कोई विशेषज्ञ नहीं कि इन दावों को जाँच सकूँ। लेकिन इतना जरूर बता सकता हूँ कि मैंने जो अंगूर और आम खरीदे वैसे ताजे और स्वस्थ पहले कभी नहीं देखे थे।

बातचीत में किसान खुश नजर आये कि वे अपना माल सीधे लोगों को बेच पा रहे हैं। इसकी कई वजहें थीं- पहली बात, उन्हें अपने उत्पाद की अच्छी कीमत मिल रही थी। क्योंकि अब वे बिचौलियों के बगैर अपना माल बेच रहे थे। दूसरी बात, उन्हें अपने उत्पाद का तत्काल पैसा मिल रहा था। इससे पहले, अभी पिछले साल तक, वे मंडी के बिचौलियों को अपना माल बेचते थे। तीसरी बात, चूँकि वे अपने उत्पाद यानी सब्जी और फल तुरंत बेच रहे थे, इसलिए इनकी बरबादी बहुत कम हो रही थी।

ऐसा कैसे हुआ ? ऐसा महाराष्ट्र सरकार के पिछले साल जून में लिए एक फैसले के काऱण हुआ। इस फैसले ने किसानों को अपने उत्पाद सीधे खुले बाजार में बेचने की अनुमति दे दी। उससे पहले वे अपने उत्पाद एपीएमसी ( कृषि उत्पाद विपणन समिति) द्वारा लाइसेंस प्राप्त व्यापारियों को ही बेच सकते थे। इसका मतलब था कि किसान अपने ही उत्पादों की कीमत निर्धारित नहीं कर सकते थे, बल्कि उनका निर्धाऱण कोई और करता था। यह बिलकुल समझ के बाहर की बात है कि एक किसान जिस चीज का उत्पादन करता है, उसकी कीमत के निर्धारण में भागीदार नहीं है ? दरअसल, *यह ‘सरकार सबसे बेहतर जानती है’ की समाजवादी सोच * की देन थी। इससे हम आज तक मुक्ति नहीं पा सके हैं।

यह सभी को पता है कि पूरे महाराष्ट्र में एपीएमसी पर परंपरागत रूप से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) का कब्जा रहा है।

किसानों द्वारा अपने उत्पादों को एपीएमसी व्यापारियों को बेचने की बाध्यता को खत्म किये जाने के बाद ऐसे मार्केट ने जन्म लिया, जैसा कि मुझे पिछले शुक्रवार को देखने को मिला। प्राप्त खबरों से संकेत मिलता है कि पूरे महाराष्ट्र में अब इस तरह के कई सौ मार्केटों का उदय हो गया है। इससे एक बात और साफ हो जाती है कि यदि सरकार चाहे तो नागरिकों को अपना काम ईमानदारी से करने में सक्षम बना सकती है। उसे कारोबार में बाधक प्रावधानों को सिर्फ खत्म करना है।

खेती-बारी एक आर्थिक क्रिया-कलाप है। पिछले कई सालों से यह किसानों के लिए फायदेमंद साबित नहीं हो रहा है। सिर्फ इसलिए कि पीढ़ियों से खेतों का आकार छोटा होता गया और आज भारत में इनका आकार घटकर बहुत छोटा यानी लगभग 1.2 एकड़ का रह गया है। इस कारण से बड़ी संख्या में किसानों और खेती पर निर्भर लोगों को अपनी रोजी-रोटी के लिए दूसरे तरह के काम ढूँढ़ने पड़े हैं।

लेकिन ऐसा जल्दी होता नजर नहीं आ रहा है और शायद कई दशक लग जायें। इसलिए सरकार को फिलहाल के लिए तत्काल कुछ करने की सख्त जरूरत भी है। इसका एक उपाय यही है कि सरकार ऐसी सुविधा उपलब्ध कराये कि किसान अपने उत्पाद सीधे उपभोक्ताओं को बेचने में समर्थ हों। इससे एक तरफ किसानों को अपने उत्पादों की अच्छी कीमत मिलती है, तो दूसरी तरफ उपभोक्ताओं को सब्जियाँ और फल कम कीमत पर प्राप्त होते हैं। इससे सिर्फ एक को नुकसान होता है, एक राजनीतिक दल से जुड़े बिचौलियों को।

यह सुविधा देश भर के किसानों को प्रदान की जानी चाहिए। किसान बाजारों के फलने-फूलने की जरूरत है। लेकिन आर्थिक समाचार पत्र ‘मिंट’की एक खबर में उल्लेख है केवल “15 राज्यों ने फलों और सब्जियों को एपीएमसी की सूची से अलग किया है, जिससे कि किसान इन उत्पादों को नियंत्रित मार्केट से बाहर बेच सकते हैं।” इससे एक बात साबित होती है कि दूसरे कई राज्य अभी भी व्यापारी लॉबी के आगे नतमस्तक हैं।

एक बात, राज्य सरकारें किसानों को पूरी तरह खुला मार्केट उपलब्ध कराने से हिचकिचा रही हैं। मिंट में उल्लेख है, “कई राज्यों ने अपने मार्केटिंग कानून में संशोधन किया है पर नियमों को अभी तक अधिसूचित नहीं किया है। उदाहरण के लिए महाराष्ट्र एक साल पहले ही फलों और सब्जियों को एपीएमसी की सूची से आजाद कर चुका है, लेकिन शक्तिशाली व्यापारी लॉबी के दवाब में नियमों को अधिसूचित नहीं किया है।”

यही कारण है कि शुक्रवार को मेरी ‘सनक’ ने दम तोड़ा, लेकिन दम भर के लिए। एक सवाल यह खड़ा होता है कि क्या सचमुच में मैं सनकी हूँ ? यदि मैं सनकी हूँ तो जनता द्वारा चुनी सरकारों के व्यवहार को क्या कहेंगे , जो अपनी ही जनता को उनका हक देने में आगा-पीछा करती हैं। इसका फैसला अपने पाठकों पर छोड़ता हूँ।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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