नेता-बिल्डर लॉबी एक, खरीदारों की कितनी मदद करेगा ‘रेरा’?

परी-कथाओं का अंत सुखद होता है।

    रियल इस्टेट(विनियमन और विकास)अधिनियम,2016 [The Real Estate (Regulation and Development) Act, 2016, or RERA] संक्षेप में ‘**रेरा**’ 1 मई 2017 से लागू हो गया। इसे रियल इस्टेट यानी जमीन-जायदाद के खरीदारों के लिए एक परीकथा की तरह पेश किया जा रहा है।

एक ऐसी परी-कथा; जो आवास खरीदने वालों की वे सारी तकलीफें छू-मंतर कर देगा, जो उन्हें अपने ‘सपनों का घर’ खरीदते समय उठानी पड़ती रही हैं। कहा जा रहा है कि ‘रेरा’ शातिर बिल्डरों को उनकी सही जगह बतायेगा, दूसरे शब्दों में उनको घर खरीदारों के साथ धोखाधड़ी करने से रोकेगा।

लेकिन ऐसा लगता है कि ‘रेरा’ 1980 के दशक की खराब कला फिल्मों जैसी साबित होने जा रही है, जिनमें सरकारी व्यवस्था, लाख लड़ाई लड़ने के बावजूद हीरो का दम निकाल लेती है और जीत जाती है।

( यदि आप मेरे कहने का मतलब सचमुच में समझना चाहते हैं तो ‘पार’ नामक फिल्म देखने का कष्ट जरूर करें।)

रेरा’ के साथ ऐसा ही होता प्रतीत हो रहा है। मैं आपको पूरी बात स्पष्ट करने की कोशिश करता हूँ कि कैसे।

रेरा’ एक केंद्रीय कानून है। लेकिन जमीन यानी भूमि राज्य सरकार का विषय है। किसी भी रियल इस्टेट प्रोजेक्ट के लिए जमीन की जरूरत होती है। ऐसे में राज्य सरकारों को अपनी सुविधा और ‘व्यावहारिक’ जरूरत के अनुसार ‘रेरा’ में फेरबदल करने का अधिकार है। उसके बाद ही ये उसे लागू करेंगी।

इसकी आड़ में, स्वाभाविक है कि राज्य सरकारें ‘रेरा’ के मूल प्रावधानों को हल्का यानी कमजोर करने का मौका पा लेती हैं। वे पूर्व में ऐसा बेशर्मी के साथ करती रही हैं।

ब्यौरे में जाने से पहले मैं सबसे पहले आपको बताना चाहता हूँ कि ‘रेरा’ जैसे कानून की हमेशा से जरूरत थी और आखिर क्यों :--

माना कि आप एक प्रोडक्ट खरीदना चाहते हैं- यह बच्चे के लिए एक साधारण-सा रबड़ भी हो सकता है और एयर कंडिशनर (एसी) जैसा जटिल उत्पाद भी हो सकता है।

रबड़ खरीदने के लिए आप क्या करते हैं ? आप पास की स्टेशनरी की दुकान पर जाते हैं। कीमत चुकाते हैं और रबड़ लेकर चले आते हैं।

लेकिन जब आप एसी खरीदना चाहते हैं, तो क्या करते हैं ? आप इलेक्ट्रानिक सामग्री बेचनेवाली दुकान पर जाते हैं। खरीदने से पहले अपनी और अपने परिवार की पसंद, अपनी बजट, ब्राण्ड, एसी लगाने के लिए अपने घर में मौजूद जगह का खयाल आदि करने के बाद खरीदने का फैसला करते हैं। यहाँ पर गौर करें: रिटेलर एसी को तुरंत आपको नहीं सौंप देता, जैसा कि रबड़ खरीदते समय हुआ था। रिटलेर अगले दिन एसी आपके घर पहुँचाता है। फिर कुछ कर्मचारी मिलकर उसे आपकी बतायी जगह पर लगाते हैं। तब आपका काम पूरा होता है।

आखिरकार यह सब बताकर मैं सिद्ध क्या करना चाहता हूँ ? मैं यह बताना चाहता हूँ कि आपको वही प्रोडक्ट मिलता है, जो प्रोडक्ट आप बाजार में खरीदते हैं। मतलब कि आप अगर डेढ़ टन का एसी खरीदते हैं, तो ऐसा नहीं कि रिटेलर आपको एक टन का एसी थमा देगा।

कभी-कभार ऐसा होता भी है तो रिटेलर तुरंत अपनी गलती सुधार देता है। इसी तरह आप जब रबड़ खरीदते हैं, को स्टेशनरी दुकानदार आपको पेंसिल शार्पनर या बालपेन खरीदने का दबाव नहीं डालता है।

बात वही कि बाजार में आप जो चाहते हैं,वही मिलता है और जितने के लिए आपने भुगतान किया है ।

लेकिन भारत में जब आप घर खरीदते हैं, तो आपके साथ ठीक वैसा नहीं होता, जैसा कि ऊपर दर्शाया गया है।

कल्पना करें कि आपने किसी सोसाइटी में एक थ्री-बेडरूम हाल किचेन के लिए भुगतान किया है। आपको सपने दिखाये गये हैं इस कि सोसाइटी में स्वीमिंग-पूल, क्लब हाउस, पर्याप्त हरियाली और काफी कुछ होगी।

भारत में जिस तरीके से चीजें होती हैं, इस बात की संभावना कम ही होती है कि जिनका विज्ञापन किया गया है और जिनके लिए आपने भुगतान किया है, वह मिल ही जाये।

सचाई तो यह है कि कई मामलों में अपार्टमेंट का आकार छोटा पाया गया। कई मामलों में मंजिलों की संख्या बढ़ गयीः मूल प्लान 10 फ्लोर का था, लेकिन बनते-बनते 15 फ्लोर की हो गयी।

ऐसे मामलों में किसी को इस बात की चिंता नहीं होती कि बिल्डिंग का फाउंडेशन मूल रूप से 10 मंजिल के लिए तैयार किया गया था और अब इसी पर 15 मंजिल की बिल्डिंग खड़ी हो गयी है।

कई बार तो वादे के मुताबिक बिल्डर समय पर पजेशन नहीं देते। नतीजा होता है कि खरीदार जो आवास या फ्लैट रहने के लिए खरीदे थे, उन्हें एक साथ अपने किराये के मकान के किराये के साथ आवास खरीदने के लिए, लिये गये होमलोन की ईएमआइ भी भरनी पड़ रही है।

ऐसे भी उदाहरणों की कमी नहीं; जब बिल्डर खरीदार से पैसा लिया और चंपत हो गया।

उपर्युक्त मुद्दों पर गहराई से विचार करें । भारत में एक घर खरीदनेवाला खुद को भाग्यशाली समझता है, अगर उसे वादे के मुताबिक समयावधि में घर मिल जाता है।

क्या हुआ घर का आकार थोड़ा छोटा ही निकला; क्या हुआ जितनी सुविधायें प्रदान करने की बातें की गयीं थी, वास्तविकता में नसीब नहीं हुई; क्या हुआ अगर ड्राइंग-रूम में पहली बारिश में ही रिसाव शुरू हो गया! भारतीय खरीदार है न-वह इन सबके साथ तालमेल बिठा लेता है।

उम्मीद की गयी है कि ‘रेरा’ घर के खरीदारों की इन सब मसलों में मदद करेगा। इसमें दरअसल चार बिंदुओं को शामिल किया गया है:

    अ) बिल्डरों को अपने किसी होम प्रोजेक्ट के लिए एकत्रित रकम का 70% अलग बैंक अकाउंट में रखना होगा। इस रकम का उपयोग केवल उसी होम-प्रोजेक्ट में किया जा सकता है। अलग बैंक अकाउंट में जमा रकम होम प्रोजेक्ट के पूरा होने के अनुपात में ही निकाला जा सकता है। ऐसा इसलिए किया गया है कि होम प्रोजेक्ट के लिए जमा रकम का उपयोग उसी प्रोजेक्ट में हो-कहीं और नहीं। बिल्डर आमतौर पर वैसा नहीं करते हैं।

    आ) ‘**रेरा**’ कानून का उल्लंघन करते पकड़े जाने पर बिल्डर पर होमप्रोजेक्ट का 10% तक जुर्माना लग सकता है, और/या तीन साल तक जेल की सजा हो सकती है।

    इ) खरीदार को पजेशन देने के बाद पाँच साल तक होम प्रोजेक्ट के ढाँचे में किसी तरह की क्षति पाये जाने पर निःशुल्क उसको दुरुस्त करना पड़ेगा।

    ई) **रेरा**’ के अन्तर्गत चालू प्रोजेक्ट भी आते हैं। चालू प्रोजेक्ट का मतलब ऐसे प्रोजेक्टों से है, जिनको कानून लागू होने की तारीख तक ‘सीसी (कंप्लीशन सर्टिफिकेट) नहीं मिला है।’ इस प्रावधान को लगातार कई सालों से देरी में चल रहे तमाम प्रोजेक्टों को कानून की जद में लाने के लिए किया गया है। इससे परेशान खरीदारों को मदद मिलती है।

रेरा’ के परिचालन संबंधी जिन दिशा-निर्देशों को अधिसूचित किया गया है, उनमें उक्त सभी प्रावधानों को राज्य सरकारों ने हल्का कर दिया है। तालिका-1 पर नजर डालें।

तालिका-1 :
States Definition of on - going projects Penelties for non - compliance Payment Schedule Norms for escrow withdrawal Clause for structural defects
Andra Pradesh Diluted Diluted In line In line In line
Bihar In line Diluted Lacks clarity In line In line
Gujrat Lacks clarity Lacks clarity Lacks clarity Lacks clarity Lacks clarity
Kerala Diluted In line In line Diluted Diluted
Madhya Pradesh In line Diluted Lacks clarity Lacks clarity Lacks clarity
Maharashtra In line Diluted With conditions In line In line
Odisha In line Diluted Lacks clarity In line In line
Rajasthan In line Diluted In line In line Lacks clarity
Uttar Pradesh Diluted Diluted Lacks clarity In line Lacks clarity
Andaman and Nicobar Islands In line
Chandigarh In line
Dadra and Nagar Haveli In line
Daman and Diu In line
Lakshadweep In line
National Capital Territory Delhi In line

Source: Crisil Research

तालिका-1 से यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है कि ‘रेरा’ का पूरा लाभ केंद्र शासित प्रदेश के खरीदारों को ही मिल सकता है।

एक रोचक बात यह है कि लगभग दो-तिहाई राज्यों ने ‘रेरा’ के परिचालन दिशा-निर्देश अभी तक नहीं जारी किये हैं। इससे पता चलता है कि ‘रेरा’ को लागू करने के बारे में राज्य सरकारें कितनी गंभीर हैं। निष्कर्ष यह है कि भारत में रियल इस्टेट की समस्या की जड़ में राज्यों की राजनीति है। ‘रेरा’ इसकी जड़ पर हमला करता है। राज्यों की राजनीति को यहाँ के बिल्डरों और राजनेताओं का गठबंधन संचालित कर रही है। बिल्डर लॉबी और राजनेताओं में अंतर कर पाना मुश्किल है।

परेशानी की बात ये है कि जिनके खिलाफ नियम बनाये जा रहे हैं , वहीं नियमों का निर्धारण भी कर रहे हैं। इस तरह, आश्चर्य की बात नहीं है कि राज्य सरकारों ने ‘रेरा’ के नियमों को हल्का यानी कमजोर कर दिया है। केंद्र सरकार के ‘रेरा’ अधिनियम की तुलना में राज्य सरकारों के नियमों में स्पष्टता नहीं है।

लेकिन यह यथार्थ जीवन है। और यथार्थ जीवन कोई ‘परियों की कथा’ नहीं है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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