नोटबंदी और 2,000 के नोट का चक्रव्यूह


13 दिसंबर 2016 की डायरी में मैंने एक सवाल का जवाब देने की कोशिश की थी: सवाल यह था कि काले धन का कितना हिस्सा नकदी के रूप में रखा जाता है ?
इस सवाल का जवाब देने के लिए मैंने मई- 2012 में तत्कालीन मनमोहन सिंह सरकार द्वारा प्रकाशित काले धन पर श्वेत-पत्र के कुछ आंकड़ों को दोबारा प्रकाशित किया था। यह डाटा दो-तालिकाओं के रूप में दोबारा तैयार किया गया था। तालिकाओं में आयकर विभाग की तलाशी और जब्ती कार्रवाई से प्राप्त डाटा था। इन्हें नीचे फिर से दिया गया हैः

Table 1: Value of assets seized (in Rs. Crore)
Year Cash Jewellery Other assets Total Undisclosed Income
Admitted (in Rs Crore)
2006-07 187.48 99.19 77.96 3,612.89
2007-08 206.35 128.07 93.39 4,160.58
2008-09 339.86 122.18 88.19 4,613.06
2009-10 300.97 132.20 530.33 8,101.35
2010-11 440.28 184.15 150.55 10,649.16
2011-12 499.91 271.40 134.30 9,289.43

Source: White Paper on Black Money

आयकर विभाग की तलाशी और जब्ती कार्रवाई के दौरान जब्त नकदी, कुल अज्ञात आय का एक छोटा-सा हिस्सा था। यह तालिक-2 से स्पष्ट हो जाता हैः-

Table 2:
Year Cash Total Undisclosed Income
Admitted (in Rs Crore)
Proportion of cash in total
undisclosed wealth
2006-07 187.48 3,612.89 5.2%
2007-08 206.35 4,160.58 5.0%
2008-09 339.86 4,613.06 7.4%
2009-10 300.97 8,101.35 3.7%
2010-11 440.28 10,649.16 4.1%
2011-12 499.91 9,289.43 5.4%
Total 1,974.85 40,426.47 4.9%

Source: Author calculations based on White Paper on Black Money

उक्त तालिकाओं से हमें क्या पता चलता है ? ये तालिकाएँ दर्शाती हैं कि काले धन का एक बहुत ही छोटा- सा हिस्सा नकदी-रूप में रखा जाता है। लोग अपने काले धन को नकदी के अलावा अन्य संपत्तियों (Assets) के रूप में भी रखते हैं। ऐसे में नोटबंदी की कसरत करने का मतलब क्या था ? जबकि प्रचारित तो यही किया गया था कि नोटबंदी का मकसद लोगों के पास नकदी के रूप में जमा कालाधन खत्म करना है। ऐसे में सवाल वाजिब है।

नोटबंदी के बारे में वित्त मंत्रालय की प्रेस-विज्ञप्ति में लिखा है : " समय-समय पर कानून प्रवर्तन एजेंसियों द्वारा की गई नकद वसूली से स्पष्ट हो गया है कि बेहिसाबी धन-दौलत को जमा कर रखने के लिए ऊँचे मूल्य-वर्ग के प्रतिबंधित नोटों का इस्तेमाल होता है। उच्च मूल्य-वर्ग के नोट काले धन को जन्म देने वाले के रूप में जाने जाते हैं। "

500 और 1,000 रुपये के नोटों को प्रतिबंधित करने का विचार शायद इसलिए किया गया कि बहुत सारे काले धन बैंकों में जमा किए जाएंगे। और उसके बाद सरकार इसकी रिकवरी का रास्ता निकालेगी।

अब तक तो सब ठीक-ठाक है। प्रिय पाठक, अब आप आश्चर्य कर रहे होंगे कि मैं उन चीजों को क्यों दोहरा रहा हूँ, जिनका जिक्र मैं पहले ही कर चुका हूँ- वह भी एक बार नहीं ,शायद कई बार। फिलहाल की बात ये है कि सप्ताहांत के दौरान मुझे हाल में प्रकाशित सी. राम मनोहर रेड्डी द्वारा लिखित Demonetisation and Black Money नामक पुस्तक को पढ़ने का मौका मिला।

पुस्तक के पृष्ठ 61 पर एक तालिका है; जो आलेख में दी गयी पूर्व की तालिका-1 के लगभग समान है। श्री रेड्डी ठीक वही बात कहना चाह रहे हैं, जो बात मैं पहले कह चुका हूँ, यानी बहुत कम काला धन नकदी के रूप रखा जाता है। रेड्डी आगे कहते हैं : " इस प्रकार, प्रथम नजर में , काले धन के सकल स्टॉक या काली अर्थव्यवस्था में लेन-देन की कुल मात्रा में नकदी की हिस्सेदारी बहुत बड़ी नहीं है। "

यदि काले धन में नकदी की हिस्सेदारी बड़ी नहीं है, मतलब लोग अपने काले धन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा नकदी के रूप में नहीं रखते हैं, तो नोटबंदी के माध्यम से काले धन पर हमले के कोई मायने नहीं रह जाते। लेकिन रेड्डी इस बात से पूरी तरह सहमत नहीं हैं । नोटबंदी के जरिए काली-अर्थव्यवस्था के नकदी हिस्से पर हमले को दो कारणों से वे जायज ठहराते हैं : “ पहली बात, नकदी का इस्तेमाल लेन-देन और निवेश दोनों के लिए किया जाता है- निवेश से अधिक लेन-देन के रूप में अधिक किया जाता है। ‘काले धन के रूप में नकदी (ब्लैक कैश )’ पर हमला काली अर्थ-व्यवस्था में स्टॉकों की मार्केट वैल्यू पर विनाशकारी असर डाल सकता है। ”

ईमानदारी से बता रहा हूँ कि नोटबंदी का समर्थन करनेवाली यह पहली सार्थक बहस मैंने देखी है। सरल हिंदी में कहें तो लोग अपने पास कालाधन नकदी में जमा कर नहीं रखते हैं। यह एक मानी हुई बात है। इसके बावजूद काली अर्थ-व्यवस्था में ट्रॉन्जैक्शन नकदी रूप में ही किया जाता है।

एक आवास का ही उदाहरण लें, जिसको खरीदने में सफेद और काले धन दोनों का इस्तेमाल किया जाता है। जब इसी आवास को बेचा जाता है, तो सफेद यानी वैध पैसा चेक से और काला पैसा नकदी रूप में लिया जाता है। श्री रेड्डी लिखते हैं : “ ट्रॉन्जैक्शन को सफल बनाने में खरीदार के पास उपलब्ध नकदी महत्वपूर्ण साबित होता है...नकदी, काली अर्थ-व्यवस्था का प्रमुख अंग नहीं होता है , (लेकिन) काली अर्थ-व्यवस्था में लेन-देन को आसान बना देता है।“ यदि सिस्टम से नकदी को आप निकाल लें, तो काली अर्थ-व्यवस्था में लेने-देन में करने वालों का जीवन मुश्किल बना देते हैं। इस लिहाज से देखा जाये तो नोटबंदी एक सीमा तक उचित है।

जैसा कि मैंने पहले कहा था कि श्री रेड्डी काले धन के नकदी हिस्से पर हमले के पक्ष में दो कारण बताते हैं। यहाँ पर है दूसरा कारण । श्री रेड्डी लिखते हैं: “ दूसरी बात, नकदी पर हमला काली अर्थ-व्यवस्था से निबटने के प्रति सरकार की संकल्प-शक्ति को जताने का सबसे प्रभावशाली तरीका है। इस प्रकार काले धन के इस्तेमाल को खत्म करने की कोई भी कोशिश बेहिसाब दौलत जमा करने वालों और सामान्य जन में एक उचित संकेत देता है।“ यह भी एक संगत बात है। क्योंकि किसी सरकार के लिए नकदी पर हमला करना आसान है, मुकाबले सोने और रियल इस्टेट के रूप में जमा की काली धन-संपत्ति के। इस तरह के काले धन से निबटना काफी कठिन काम है।

8 नवंबर 2016 को नरेंद्र मोदी सरकार द्वारा नोटबंद लागू करने के पक्ष में उक्त दो बहुत अच्छी वजहें बतायी गयी हैं। नोटबंदी के साथ सरकार ने कुछ ऐसे भी कार्य कर डाले, जो नोटबंदी से अपेक्षित उद्देश्य के बिलकुल ही खिलाफ जाता था- सरकार ने प्रतिबंधित 1,000 के नोट की जगह 2,000 के नोट पेश किया।

जैसा कि पहले जिक्र किया गया है कि हालाँकि कालाधन जमा करने के लिए मुख्य तौर पर नकदी का उपयोग नहीं होता है. लेकिन काली अर्थ-व्यवस्था में ट्रॉन्जैक्शन के लिए नकदी का भरपूर इस्तेमाल होता है। इसके अलावा कागजी पैसा जितने बड़े मूल्य-वर्ग का होता है, काली अर्थ-व्यवस्था में ट्रॉन्जैक्शन उतना ही आसाना होता है। इससे नकदी में कालाधन जमा करना भी सरल बना देता है। रेड्डी लिखते हैं: " पहले से भी अधिक मूल्य-वर्ग की मुद्रा जारी करना शायद एक अजीब निर्णय रहा हो, यह देखते हुए कि नोटबंदी की पूरी कसरत का एक उद्देश्य प्रचलन से उच्च मूल्य-वर्ग के नोट को हटाना भी था। ”

प्रतिबंधित 500 रुपये और 1,000 रुपये के नोटों की जगह उच्च मूल्य-वर्ग के एक नोट 2,000 रुपये के जारी करने का एक कारण, यह था कि इसने रमनिटाइजेशन प्रक्रिया को तेज किया । रिमनिटाइजेशन का मतलब नोटों की छपाई और इन्हें वित्तीय प्रणाली में डालना होता है। 2,000 रुपये का नोट 1,000 रुपये के दो और 500 रुपये के चार नोटों की जगह लेता है। इस तरह से रिमनिटाइजेशन की प्रक्रिया तेजी से काम करती है। सबसे पहली बात यही है कि 2,000 नोटों को प्रचलन में लाना नोटबंदी की पूरी सोच के ही खिलाफ जाता है। क्योंकि 2,000 का नोट काली अर्थ-व्यवस्था में ट्रॉन्जैक्शन को 1,000 नोट से भी अधिक आसान बना देता है, चूँकि इनके कम नोट रखने की जरूरत होती है, इसी वजह से नकदी रूप में कालाधन जमा करना भी ईज़ी हो जाता है। इस तरह, यह बेहद जरूरी है कि सरकार 2,000 रुपये का नोट वापस ले। लेकिन इसे धीरे-धीरे समय लेकर करने की आवश्यकता है। इसके अलावा 1,000 रुपये का नोट फिर से प्रचलन में लाया जाये। जैसे ही एक 2,000 रुपये का नोट बैंक में वापस आता है, उसको 1,000 रुपये के नोटो में बदल दिया जाये। 2000 रुपये के नोट को बैंक में जमा करने की एक तारीख भी निर्धारित कर दी जानी चाहिए। हम इस बात को फिर से दौहराते हैं कि नोटबंदी के बाद जो भीषण अव्यवस्था पैदा हुई उससे बचा जाना चाहिए। नोटबंदी के लिए साल-दो-साल का समय लेते हुए एक तारीख तय की जा सकती है। भारतीय रिजर्व बैंक पूर्व में चरणबद्ध तरीके से मुद्रा को वापस लिया है। इस मामले में भी ठीक वैसा किया जा सकता है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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