‘नोटबंदी’ के बाद भी कर-संग्रह जैसा-का-तैसा ही रहा है

8 नवंबर, 2016 से केंद्र की नरेंद्र मोदी सरकार ‘नोटबंदी’ को सफल सिद्ध करने के लिए कई कोशिश कर चुकी है। नोटबंदी के बचाव में तर्क और आर्थिक सिद्धातों की दुहाई दी है।

हालिया महीनों में सरकार ने नोटबंदी को सार्थक और सफल साबित करने के क्रम में आँकड़े भी पेश किये हैं। नोटबंदी की सफलता के सबूत के तौर पर सरकार की तरफ से प्रस्तुत नवीनतम आँकड़ा यह है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप देश में कराधार (टैक्स बेस) में बढ़ोतरी हुई है।

सेंट्रल बोर्ड ऑफ डायरेक्ट टैक्स (सीबीडीटी) के चेयरमैन सुशील चंद्र ने जुलाई 2017 के आखिर में इस सिलसिले में कुछ वक्तव्य भी दिये हैं।

4 अगस्त 2017 को वित्त राज्य-मंत्री संतोष गंगवार ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में भी कुछ उसी तरह की बात कही। वित्त मंत्रालय के राजस्व-विभाग के समक्ष सवाल रखा गया था:"क्या नोटबंदी के बाद देश में आयकर दाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है? "
गंगवार ने जवाब में कहा था: "नोटबंदी के पश्चात आयकर दाताओं की संख्या में वृद्धि हुई है। 09.11.2016 से 31.03.2017 की अवधि में 1.96 करोड़ रिटर्न दाखिल किए गये, जबकि वित्त-वर्ष 2015-16 की इसी अवधि के दौरान 1.63 करोड़ रिटर्न दाखिल किये गये थे। “

यह कथन वाकई हमें ज्यादा कुछ नहीं बताता है। हां, 9 नवंबर, 2016 और 31 मार्च 2017 के बीच रिटर्न दाखिल करने वाले लोगों की संख्या नवंबर 2015 और मार्च 2016 के बीच इसी अवधि की तुलना में अधिक थी। लेकिन गंगवार ने हमें इसी अवधि के दौरान दर्ज रिटर्न की संख्या नहीं दी है, जिससे कि निष्पक्ष तुलना संभव हो।

उन्होंने, हमें पिछले तीन वर्षों के कर-आधार के आकार की जानकारी दी है। विस्तार में जाने से पहले यह परिभाषित करना महत्वपूर्ण है कि ‘कर-आधार’ शब्द का वास्तव में मतलब क्या होता है। पिछले कुछ सालों से सीबीडीटी ने इस शब्द के अर्थ में कुछ-एक बार बदलाव किये हैं।

वित्त मंत्रालय की नवीनतम उपलब्ध वार्षिक रिपोर्ट ( 2015-16) के अनुसार : "कर आधार" की परिभाषा में परिवर्तन हुआ है। वित्तीय वर्ष के 1-अप्रैल के आधार पर ‘कर आधार’ अब उन व्यक्तियों की संख्या के रूप में लिया जाता है, जिन्होंने या तो आयकर रिटर्न (आईटीआर) दर्ज कराया है, या संदर्भ वर्ष से पूर्व जिनके मामले में करों का भुगतान तीन साल से लगातार किसी भी वर्ष में किया गया है, या कटौती की गयी है।"

तालिका-1 पिछले तीन वित्तीय-वर्षों के कर-आधार को दर्शाता हैः-

2016-17 में, 2015-16 की तुलना में कर-आधार में 10.7 % की वृद्धि हुई। 2015-16 में, 2014-2015 की तुलना में कर-आधार 8 % बढ़ गया था। नोटबंदी का शुक्रिया कि इस तरह कर-आधार तेज रफ्तार से बढ़ा है। लेकिन नोटबंदी के पूर्व और बाद की विकास दरों में अंतर वास्तव में बहुत बड़ा नहीं है। फिर सवाल पूछा जा सकता है कि नोटबंदी करके इतनी परेशान खड़ी करने की जरूरत क्या थी?

नोटबंदी की जरूरत का विश्लेषण करने का एक और तरीका भी है: आखिरकार कर-आधार बढ़ाने के पीछे का विचार अर्थव्यवस्था के कुल आकार के अनुपात में सरकार द्वारा एकत्र कुल प्रत्यक्ष-करों में वृद्धि को पक्का करना था ( अर्थात सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) के अनुपात में कर का बढ़ना )।

यदि कर-आधार के साथ सकल घरेलू उत्पाद के अनुपात में कर-संग्रह नहीं बढ़ रहा है; तो इसका मतलब है कि केवल अधिक टैक्स-रिटर्न दाखिल किया जा रहा है। और इसका मूल रूप से मतलब है कि चार्टर्ड एकाउंटेंट (सीए) अधिक पैसा बना रहे हैं, वे और कुछ और नहीं कर रहे हैं (यह जीवन के अलिखित नियमों में से एक है, जो कुछ भी हो, सीए अधिक पैसा बनाता है)।

इस पहलू से देखते हैं-

पिछले कुछ सालों में, जीडीपी के अनुपात में एकत्रित कुल निगम कर और आय कर के आँकड़ों पर नजर डालते हैं, तो कैसी तस्वीर बनती है?

जब हम कुल निगम कर से अधिक आयकर जीडीपी के अनुपात के रूप में एकत्रित करते हैं, तो पिछले कुछ वर्षों में चीजें कैसे दिखती हैं? (मैंने यहां संपत्ति कर को नजरअंदाज किया है; क्योंकि यह 2015-16 से समाप्त कर दिया गया।)

चित्र-1 पर एक नज़र डालें..

चित्र-1:

चित्र-1 हमें क्या बताता है? यह हमें बताता है कि जहां तक जीडीपी के अनुपात में निगम कर और आयकर का संबंध है, आयकर विभाग सिर्फ लक्ष्य हासिल करने की कोशिश कर रहा है। यह अनुपात 2013-2014 तक बहुत अधिक था, बिना किसी नोटबंदी के। अगर हम सिर्फ जीडीपी के अनुपात में आय-कर पर नजर डालते हैं, तो क्या तस्वीर बनती है ? चित्र-2 पर एक नज़र डालें....

चित्र 2:

चित्र-2 हमें क्या बताता है?

2016-2017 में जीडीपी अनुपात में आयकर 2015-2016 की तुलना में 23 आधार अंकों की बढ़ोतरी के साथ 2.33 % पर पहुंच गया है। सवाल किस कीमत पर है? नोटबंदी के कारण भारत के आर्थिक विकास को कम-से-कम 100 आधार अंकों का नुकसान हुआ है।

इसके अलावा, यहां पर स्मरणीय है कि आयकर में उछाल, 2016-17 के दौरान सरकार की दो आय कर माफी योजनाओं के कारण आया था। अगर हम इन योजनाओं को अलग रखें, तो जीडीपी अनुपात में आयकर लगभग पिछले सालों की तरह होता। वर्तमान वित्तीय-वर्ष के दौरान सरकार को इन एमनेस्टी योजनाओं की सुविधा नहीं होती और इससे उसके अपने कर-संग्रहण पर प्रभाव पड़ता।

वर्ष 2017-2018 के लिए सरकार का अनुमान इस प्रकार है: जीडीपी अनुपात में निगम कर और आयकर 5.82 % पर आने की संभावना है। जीडीपी के अनुपात में आयकर जीडीपी का 2.62 % पर आने की संभावना है। पिछले आंकड़ों को देखते हुए यह काफी आशाएँ जगाता लगता है। साथ ही, अर्थव्यवस्था धीमी होने के साथ सरकार द्वारा एकत्रित करों पर थोड़ा विपरीत असर पड़ना तय है। इस संदर्भ में यह अनुमानों के सच होने पर भविष्यवाणी करना बहुत जल्दबाजी होगी।

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि नोटबंदी के परिणामस्वरूप आयकर संग्रह में मामूली वृद्धि हुई है। लेकिन पिछले वर्ष की तरह ही प्रत्यक्ष कर संग्रह कुल-मिलाकर वैसा-का-वैसा रहा है। लेकिन यह सब कुछ भी अर्थव्यवस्था के बड़े हिस्से, विशेषकर अनौपचारिक क्षेत्र की तबाही पर हासिल हुआ है। ऐसी दशा में कर-संग्रह के पहलू से नोटबंदी को सफल दर्शाने की कोशिश मार्केटिंग का दाँव-पेंच है, और कुछ नहीं। नरेंद्र मोदी सरकार की यह विशेषता है।

जैसा कि इवान डेविस ने Post Truth—Why We Have Reached Peak Bullshit and What We Can Do About It में में लिखा है-"एक तथ्य की जानकारी दी गई है, तथ्य सही है। इस तथ्य की एक वैध व्याख्या की गई है - लेकिन फिर इसको इतना बढ़ा-चढ़ा दिया गया कि बाकी चीजें निरर्थक हो जाती हैं ।" नोटबंदी के सिलसिले में ज्यादा कर और ज्यादा कर-आधार का जहाँ तक मामला है, बिलकुल इसी तरह हमारे सामने आया है। यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

Comments