नोटबंदी ने 'नये करदाताओं की संख्या बढ़ायी'- सच नहीं है

हम किसी निष्कलंक और दोषमुक्त दुनिया में नहीं रहते हैं। जनमानस की इस सोच के बारे में हमारी सरकारों को अच्छी तरह से पता होता है, यही कारण है कि ये हमेशा, अपने फैसलों के सकारात्मक प्रभावों को प्रदर्शित करना पसंद करती हैं। कभी-कभी इसके लिए ये काफी अधीर भी हो उठती हैं। नोटबंदी के आर्थिक-प्रभावों को इसी संदर्भ में देखा जाना चाहिए।

अधिकतर आँकड़े स्पष्ट रूप से दर्शा रहे हैं कि नवंबर 2016 में केंद्र सरकार की नोटबंदी संबंधी फैसले का भारतीय अर्थ-व्यवस्था पर सकारात्मक असर नहीं पड़ा है। एक बात हो सकती है कि भारतीय जनता पार्टी को उत्तर प्रदेश में विधान सभा का चुनाव जीतने में इससे जरूर मदद मिली हो। लेकिन इसके आधार पर नोटबंदी का निर्णय भारत के आर्थिक हित में सही है, जरूरी नहीं है। फिर भी, केंद्र की नरेंद्र मोदी की सरकार चाहती है कि हम मानें कि नोटबंदी ने आर्थिक पहलू से देश का भला किया है।

विगत सप्ताह के आरंभ में वित्त-मंत्री अरुण जेटली ने देश को बताया कि “आयकर विभाग द्वारा की गयी कार्रवाई के परिणामस्वरूप 91 लाख से अधिक लोगों को आयकर के दायरे में लाना संभव हो सका है।” बाद में स्पष्टीकरण आया कि 91 लाख लोगों को साल 2016-17 ( 1 अप्रैल, 2016 और 31 अप्रैल, 2017 के बीच) में आय कर के दायरे में लाया गया। जेटली ने बताया आयकर के दायरे में लाने का काम नोटबंदी के बाद हुआ; उनकी यह जानकारी गलत है।

आयकर आयुक्त और केंद्रीय प्रत्यक्ष कर बोर्ड ( Central Board for Direct Taxes-CBDT) की अधिकृत प्रवक्ता मिनाक्षी गोस्वामी ने बाद में NDTV को स्पष्ट किया कि “साल 2016-17 वित्तीय वर्ष में कुल 91 लाख नये करदाता बने।” इससे कुछ रोचक बातें सामने आती हैं- ऊपर से देखने में 91 लाख का आँकड़ा काफी भारी-भरकम लगता है। लेकिन एक बात पर गौर किया जाना चाहिए कि जब हम वृद्धि या घटाव की बात कर रहे होते हैं, तो हमें आँकड़ों को अलहदा करके नहीं देखना चाहिए।

लेकिन यहाँ चिंता की बात ये है कि ‘कर का दायरा’ और ‘साल के दौरान जोड़े गये नये कर दाता’ की परिभाषा में बदलाव के कारण इस सिलसिले में हमारे पास लंबी अवधि के आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। वित्त-मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट ( 2015-16) में उल्लेख है कि “साल 2014-15 में 76,04,154 नये करदाता जोड़े गये।” इसका मूल मतलब यही हुआ कि साल 2014-15 की अवधि में 76 लाख नये करदाता बने। लेकिन इस सिलसिले में साल 2014-15 का कोई आँकड़ा मुझे नहीं मिला।

अब आप साल 2016-17 में जुड़े 91 लाख नये करदाताओं और 2014-15 में जुड़े 76 लाख नये करदाताओं के बीच तुलना करें, तो आँकड़े में कोई खास फर्क नजर नहीं आता, जबकि 2014-15 में नोटबंदी नहीं हुई थी। यदि सरकार कुछ भी नहीं करती है, तो भी हर साल नये करदाता कर के दायरे में आते ही हैं-खास कर जब न्यूनतम टैक्स-स्लैब वैसा-ही बना रहता है। साल 2014-15 में न्यूनतम टैक्स-स्लैब 2,50,000 रुपये था। यह अभी भी बना हुआ है। इसका मतलब यही हुआ कि अकेले मुद्रा-स्फीति (महँगाई) ही नये लोगों को कर दायरे में लाने के लिए काफी थी, और इस तरह कर-आधार (टैक्स बेस) में इजाफा होता रहता। इससे अलग और आगे, जैसे-जैसे अर्थ-व्यवस्था वृद्धि करती और लोगों की आय में बढ़ोतरी होती है, और लोग कर के दायरे में आते हैं।

एक बार, जब हम इन कारकों पर ध्यान देते हैं, तो कर दायरे में 91 लाख नये लोगों के जुड़ने संबंधी आँकड़ा बहुत अधिक नहीं लगता- खासकर, जब नोटबंदी के कारण देश के कोने-कोने में मची अफरा-तफरी की बात पर गौर करते हैं। यही नहीं, सीबीडीटी के चेयरमैन सुशील चंद्रा के अनुसार नवंबर 2016 और मार्च 2017 के बीच आय कर विभाग की तलाशी अभियान के दौरान 16,398 करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता चला था। दूसरी तरफ, इसी अवधि के दौरान सर्वे में 6,746 करोड़ रुपये का उद्घाटन हुआ था। यदि इन आँकड़ों को अलहदा करके देखें ,तो यह एक बड़ी धनराशि लगती है। लेकिन एक अवधि के आँकड़ों पर नजर डालें, तो ऐसा नहीं लगेगा।

तालिका-1 पर नजर डालें। यह पिछले कुछ सालों की अवधि में आयकर विभाग द्वारा तलाशी और किये गये सर्वे के दौरान स्वीकृत अघोषित आय और रकम को दर्शाता है।

तालिका-1: अघोषित आय
वित्तीय वर्ष समूहों की संख्या, जिनके खिलाफ तलाशी हुई स्वीकृत अघोषित आय ( करोड़ रुपयों में) सर्वे की संख्या अघोषित आय का उद्घाटन ( करोड़ रुपयों में) कुल अघोषित आय ( करोड़ रुपयों में)
2012-2013 422 10,291.61 4,630 19,337.46 29,629.07
2013-2014 569 10,791.63 5,327 90,390.71 1,01,182.34
2014-2015 545 10,288.05 5,035 12,820.33 23,108.38
2015-16 445 11,066.24 4,422 9,654.8 20,721.04
2016-17* 222 6,304.71 977 17,62.51 8,067.22

*सितंबर 2016 तक ( तलाशी की संख्या ) और अगस्त 2016 तक ( सर्वे की संख्या )
स्रोत : वित्त मंत्रालय की सालाना रिपोर्ट और पीआइबी

साल 2016-17 के आँकड़े अधूरे हैं। लेकिन पर्याप्त ब्यौरों की सहायता से हम विषय का विश्लेषण कर सकते हैं। अप्रैल और सितंबर 2016 के बीच आयकर विभाग की तलाशी अभियान के दौरान कुल स्वीकृत आय (या कालाधन) 6,304.71 करोड़ रुपये थी। अप्रैल और अगस्त 2016 के बीच सर्वे के दौरान कुल 1,762.51 करोड़ रुपये की अघोषित आय का पता चला था। अगर हम इन आँकड़ों को जोड़ें तो हमें कुल 8,067.22 करोड़ रुपये का आँकड़ा प्राप्त होता है। नवंबर 2016 और मार्च 2017 के बीच आयकर विभाग की तलाशी अभियान के समय 16,398 करोड़ रुपये की अघोषित आय सामने आयी थी। इसका जिक्र पहले किया गया है। दूसरी तरफ इसी अवधि में सर्वे के दौरान 6,746 करोड़ रुपये का पता चला था। दोनों आँकड़ों को जोड़ें तो 23,144 करोड़ रुपया होता है। इसको पहले के 8,067.22 करोड़ में जोड़ें तो 31,211 करोड़ रुपये आता है। इस तरह आयकर विभाग ने 2016-17 की अवधि में कुल इतनी अघोषित आय की पहचान की थी।

यह आँकड़ा अपूर्ण है, क्योंकि अक्टूबर 2016 माह का तलाशी अभियान संबंधी और सितंबर-अक्टूबर 2016 माह की सर्वे अभियान संबंधी जानकारी गायब है। फिर भी, इस मोटे आँकड़े के साथ काम किया जा सकता हैः मतलब यह कि साल 2016-17 में आयकर विभाग ने कुल 31,211 करोड़ रुपये से अधिक की अघोषित आय यानी काले धन की पहचान की। क्या यह बहुत बड़ी उपलब्धि थी ?

तालिका-1 पर नजर डालें। साल 2012-13 में कुल रकम 29,629 करोड़ रुपये थी। इस रकम को मुद्रा-स्फीति के साथ समायोजित नहीं किया गया है। यह कहना ठीक रहेगा कि अगर ऐसा किया गया होता तो 2016-17 की तुलना में साल 2012-13 में आयकर विभाग और अधिक अघोषित आय का पता लगाया होता। साल 2013-14 में कुल अघोषित आय का आँकड़ा 1 लाख 1 हजार 182 करोड़ रुपये था, यह साल 2016-17 की तुलना में काफी अधिक है। आँकड़ों से साफ झलकता है कि काले धन का पता लगाने के मामले में आयकर विभाग की क्षमता में साल 2014-15 से गिरावट आयी है।

निष्कर्ष में कहा जा सकता है कि सरकार नोटबंदी की जो गुलाबी तस्वीर पेश करने की कोशिश कर रही है, वह सही नहीं है। हम आँकड़ों पर जितना ध्यान देते हैं, असलियत उतनी ही सामने आती है।

उपसंहार: मैंने हाल ही में ‘प्रगति’ पत्रिका के संपादक और लेखक अमित वर्मा के साथ ‘ शिक्षा के अधिकार और इसने कैसे हमारी शिक्षा-प्रणाली को खराब किया है‘ पर एक पॉडकास्ट तैयार किया । मैंने जो कुछ बात की थी, वह मेरी नई पुस्तक India’s Big Government—The Intrusive State and How It is Hurting Us पर आधारित थी। आप पॉडकास्ट को यहां सुन सकते हैं।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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