आँकड़ों के सामने मिथक यानी झूठे विश्वास कहीं नहीं ठहरते। लेकिन परेशानी की बात यह है कि भारत का रियल-इस्टेट क्षेत्र बेहद अपारदर्शिता का शिकार रहा हैः इस क्षेत्र का समुचित विश्लेषण करने के लिए हमारे पास संबंधित पर्याप्त आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। इस प्रक्रिया में, यह मिथक बना हुआ है कि कोई भी रियल-इस्टेट निवेश हमेशा ही भारी मात्रा में रिटर्न प्रदा

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कुछ समय के पश्चात मैं अचल-संपत्ति (रियल-इस्टेट) पर फिर कुछ लिख रहा हूँ। इस अंतराल की एकमात्र वजह रियल-इस्टेट क्षेत्र पर डाटा यानी आँकड़ों की भारी कमी का होना है। हाल ही में, रियल-इस्टेट कंसल्टिंग फर्म प्रॉपइक्विटी ने कुछ रोचक आंकड़े जारी किये हैं। इससे मैं रियल-इस्टेट विषय पर फिर से कुछ लिखने को प्रेरित हुआ हूँ। इन आंकड़ों के अनुसार, जनवरी और मई-2017 के बीच की अवधि

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भारतीय रिजर्व बैंक दो साल में एक बार वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) जारी करता है। इस सिलसिले में जून-2017 के लिए एफएसआर अभी पिछले सप्ताह जारी किया गया। कुछ साल पहले तक रिजर्व बैंक द्वारा सालाना प्रकाशित दस्तावेजों में एफएसआर एक ऐसा दस्तावेज हुआ करता था, जिसका उपयोग केवल गंभीर किस्म के संवाददाता और विश्लेषक किया करते थे। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे

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खरीफ की फसल की बुवाई का समय है। कृषि मंत्रालय साप्ताहिक तौर पर, इससे संबंधित आंकड़ा नियमित रूप से जारी करता रहता है। ताजातरीन आँकड़ों के अनुसार 23 जून 2017 तक 5.97 लाख हेक्टेयर में दलहनी फसलों की बुवाई हो चुकी थी। इसी अवधि में, पिछले साल 9.01 हेक्टेयर में बुवाई हुई थी। इस तरह साफ तौर से जाहिर होता है कि जहाँ तक बोई गयी दलहनी फसलों के क्षेत्र का सवाल

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कुछ दिनों पूर्व मैंने ट्विटर पर लोगों को सुझाव दिया थाः संगठित होकर सरकार से अपने बकाया आवास-ऋणों को माफ करने के लिए कहें। मुझे इस तरह का सुझाव देने की सूझ इस बात से मिली कि कई राज्य सरकारें किसानों का कर्ज माफ कर रहीं थीं। किसानों की कर्ज-माफी की शुरुआत आंध्र प्रदेश और तेलंगाना की सरकारों ने की। इसके पश्चात उत्तर प्रदेश ने अनुसरण ने किया। यहाँ की नव-नियु

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