रियल-इस्टेट की कीमतें आखिर कम क्यों नहीं हो रही हैं ?


अभी कुछ समय पहले ही हमें एक ई-मेल मिला। इसमें पूछा गया था कि हमने रियल-इस्टेट के बारे में लिखना क्यों बंद कर दिया। लेकिन हम पाठकों से साफ कर रहे हैं कि हमने रियल-इस्टेट पर लिखना बंद नहीं किया है-इस विषय से सिर्फ थोड़ा विराम लिया है।

सच बात ये है कि भारतीय रियल-इस्टेट के बारे में नये विषय को लेकर लिखना बहुत मुश्किल काम है; क्योंकि इस क्षेत्र के बारे में बहुत कम आँकड़े उपलब्ध हैं। कुछ भी हो, अभी कल की बात है हम एक किताब पढ़ रहे थेः इसमें व्यावहारिक-अर्थशास्त्र पर आधारित एक अवधारणा (कंसेप्ट) की बात की गयी थी। यह अवधारणा मौजूदा भारतीय रियल-इस्टेट के परिदृश्य से निर्मित हुई है। डॉयरी के वर्तमान संस्करण में हम इसी की चर्चा करते हैं।

एडवर्ड ओ थार्प ने A Man for All Markets-From Las Vegas to Wall Street, How I Beat the Dealer and the Market नामक एक किताब लिखी है। इसमें उन्होंने रियल-इस्टेट में एंकरिंग की अवधारणा (concept of anchoring) पर विचार किया है। एडवर्ड ने लिखा है: “एंकरिंग का मतलब निवेश संबंधी सोच से एक बारीक और बड़ी दूरी बनाना है। उदाहरण के लिए एक पूर्व पड़ोसी श्री डेविस (मैं उन्हें इसी तरह बुलाता हूँ) ने 1980 के मध्य में 20 लाख डालर में या फिर इसके आसपास की कीमत में अपना मकान खरीदा था। उन्होंने देखा कि जब 1988-1989 में लक्जरी होम की कीमतें चरम पर पहुँची थी, तो उनके मकान की मार्केट वैल्यू 35 लाख डालर तक पहुँच गयी। इसके ठीक बाद श्री डेविस ने अपना मकान बेचने का निर्णय किया और गाँठ बाँध ली कि 35 लाख डालर में ही बेचना है। ”

यहीं से श्री डेविस की परेशानी शुरू हो गयी। शीघ्र ही लक्ज़री होम की कीमत गिरनी आरंभ हो गयी। लेकिन श्री डेविस तो 35 लाख डालर की कीमत पकड़ कर बैठे रहे। डेविस के लिए 35 लाख डालर का चाहे जो मतलब रहा हो, मगर उस होम मार्केट के लिए कोई मतलब नहीं था, जहाँ कीमत तेजी से गिर रही थी। एंकरिंग की अवधारणा में यही बातें आती हैं। जैसा कि जॉन एलन पौलोस A Mathematician Reads the Stock Market में लिखते हैः ”हम...हर सुने-सुनाये आँकड़ों से बंध जाते हैं। इस प्रवृत्ति को ‘एंकरिंग इफेक्ट’ कहा जाता है।“

श्री डेविस अपनी ‘एंकर’ कीमत ( निश्चित कीमत) को पकड़ कर बैठे रहे। इसलिए उन्हें अपने मकान का कोई खरीदार नहीं मिला। थार्प ने लिखा हैः “अगले 10 सालों में उनके मकान की कीमत गिरकर 22 लाख डालर रह गयी। फिर भी डेविस अपनी हास्यास्पद ‘एंकर’ प्राइस पर बेचने की कोशिश करते रहे। अंत में, फिर से उठ खड़ा हुए शेयर बाजार और डॉट काम-संचालित लक्ज़री होम की बढ़ती कीमतों का शुक्रिया कहें कि श्री डेविस 32 लाख 50 हजार डालर में आखिरकार बेचने में कामयाब रहे।“

आखिर में श्री डेविस अपना मकान कुल मिलाकर अपनी एंकर प्राइस पर बेचने में सफल रहे। लेकिन इस पूरी कसरत में या कहें कि अपनी एंकर प्राइस को पकड़ कर बैठे रहने की अवधि में शायद वे भूल गये कि रुपये-पैसे की अपनी एक निश्चित टाइम वैल्यू होती है। थार्प ने लिखा हैः “डेविस के मामले में, जैसा कि प्रायः होता है, ‘एंकरिंग’ को लेकर सोच गलत थी। इसके कारण भले ही डेविस को अपना मकान बेचने में सफलता मिली ,लेकिन और तरीके से बेचने में जितना मिलता, उससे काफी कम कीमत मिली।“

यहाँ पर गौर करनेवाली बात यह है कि अगर डेविस ने मकान अपनी एंकर प्राइस से थोड़ी कम कीमत पर ही बेच दिया होता, और उससे प्राप्त पैसा कहीं और जगह लगा दिया होता, उन्हें साल वर्ष 2000 तक मकान बेचने से प्राप्त 32 लाख 50,000 डालर से कहीं अधिक पैसा मिला होता।

अब विचार करें कि भारतीय संदर्भ में यह ‘एंकरिंग’ की अवधारणा कितनी संगत है ? एक कमजोर रियल-इस्टेट मार्केट में किसी मकान विक्रेता का एंकरिंग के खतरे का सामना करना पड़ता है। वर्तमान में, भारत में, बिलकुल ऐसे ही हालात हैं। पिछले कुछ समय से देश के विभिन्न मार्केटों की रियल इस्टेट कीमतों में गिरावट आयी है। इसके बावजूद कई विक्रेता अपने मकान की वह सबसे ऊँची कीमत पकड़ कर बैठे हुए हैं, जो कुछ साल पहले थी। यानी वे एंकर-कीमत से चिपके हुए हैं। यह विचित्र स्थिति दिल्ली के आसपास काफी देखने को मिलती है।

एंकरिंग अवधारणा अपना असर दिखा रही है। इसी कारण विक्रेता मौजूदा मार्केट कीमत पर अपना मकान बेचने को तैयार नहीं हैं। कुछ मामलों में देखने को मिला कि मकान की कीमतें पिछले कुछ सालों से एकदम ठहरी हुई हैं। निवेशक ( इनवेस्टर) ज्यादा कीमत चाहते हैं यानी एक निश्चित कीमत (एंकर कीमत) से नीचे आने को तैयार नहीं हैं। वे रियल इस्टेट में अपने निवेश से अच्छा लाभ चाहते हैं। यह स्थिति पुणे में मुझे साफ दिखायी दे रही है। यहाँ पर रियल इस्टेट में पैसा लगाने वाले कम कीमत पर बेचने के मूड में नहीं दिखते हैं।

इसी वजह से ऐसे हालात पैदा हुए हैं कि देश के कई बाजारों में रियल इस्टेट खरीदारियाँ ठप हो गयी हैं,, लेकिन कीमतों में कोई गिरावट नहीं आयी है। यह रियल इस्टेट मार्केट के लिए अच्छा नहीं कहा जा सकता है। क्योंकि पहले से ही निर्मित मकान निवेश के लिए नहीं, बल्कि रहने की चाह रखनेवाले खरीदारों को जब तक बिकते नहीं हैं, तो निर्मित मकान की संख्या बढ़ती जायेगी और वे अनबिके रहेंगे।

जब तक निर्मित मकानों की यह फेहरिश्त खत्म नहीं होती, कोई नया मकान नहीं बनेगा या फिर कहें कि पहले की रफ्तार से मकान नहीं बनेंगे। जो नये मकान बनेंगे वे सिर्फ अनबिके मकानों की फेहरिश्त ही बढ़ायेंगे। साफ है समस्या है। यही नहीं मकान मालिक एक कीमत पर अटके हुए हैं यानी एंकर प्राइस से नीचे जाना नहीं चाहते हैं, इसलिए आने वाले सालों में उन्हें पैसे का नुकसान उठाना पड़ेगा। इसलिए इस बात की संभावना बहुत कम है कि रियल इस्टेट की कीमतें ऊपर जायेंगी या फिर ऊपर जायेंगी भी तो पहले की रफ्तार से नहीं।

इस बीच मकान मालिकों को रखरखाव ( मेंटिनेंस), प्रॉपर्टी टैक्स, आदि की लागत का भार वहन करना पड़ेगा।

इस तरह पाते हैं कि उन्हें अपने रियल इस्टेट निवेश पर आर्थिक नुकसान होगा। सचाई यह है कि वे अपना मकान बेचकर बेहतर स्थिति में होंगे और इससे प्राप्त पैसा सावधि जमा (फिक्स्ड डिपॉजिट) में लगा सकते हैं।

उपसंहारः लेकिन मुझे यह पता है कि ऐसा कोई नहीं करने जा रहा है, क्योंकि हम भारतीयों के दिमाग में यह एकदम से बैठा हुआ है कि ( बल्कि कहना चाहिए कि हम रियल इस्टेट की कीमत बढ़ते जाने संबंधी एंकर प्राइस से बंधे हुए हैं) रियल इस्टेट की कीमतें केवल बढ़ती हैं। इस सोच में जल्दी बदलाव नहीं होने जा रहा है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल’स डॉयरी’ और ‘द विवेक कौल लेटरके संपादक है। विवेक कौल एक लेखक हैं । वे पूर्व में ‘डेली न्यूज एंड अनैलिसिस’ (डीएनए) और ‘द इकोनॉमिक्स टॉइम्स’ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। वे ‘द इजी मनी ट्रिलॉजी’ के लेखक हैं। ट्रिलॉजी की नवीनतम किताब ‘इजी मनीः द ग्रेटेस्ट पोंजी स्कीम एवर एंड हाउ इट इज सेट टू डिस्ट्रॉय द ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम’ मार्च 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब एमजॉन की बेस्ट सेलर साबित हुई । विवेक कौल ने ‘द टॉइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द हिंदू’, ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’, ‘बिजनेस वर्ल्ड’, ‘बिजनेस टुडे’, ‘इंडिया टुडे’, ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’, ‘फोर्ब्स इंडिया’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘द एशियन एज’, ‘म्युचुअल फण्ड इंनसाइट’, ‘वेल्द इनसाइट’, ‘स्वराज्य’, ‘बंगलौर मिरर’ और अन्य के लिए भी लिखा है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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