रियल-इस्टेट की गिरती कीमतें, हताश बिल्डर, कालेधन की वापसी

प्रिय पाठक,

यहाँ पर हम आज बात करेंगे कि नोटबंदी के बाद के छह महीनों में भारतीय रियल-इस्टेट यानी जमीन-जायदाद के बाजार की दशा और दिशा क्या रही। साथ में पता लगायेंगे कि आवास की कीमतों में गिरावट आयी है कि नहीं ।

यह आलेख पहले पहल 5 मई, 2017 को मेरे Weekly Letter में प्रकाशित हुआ था। आप इस Weekly Letter को सब्सक्राइब कर सकते हैं।

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[ भारत में, आवास और रियल-इस्टेट एक ऐसा क्षेत्र है; जिस पर, आँकड़ों की कमी के कारण कुछ भी लिखना बहुत कठिन है। फिर भी, जो थोड़े-बहुत आँकड़े उपलब्ध हैं, उनके आधार पर कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं।] Weekly Letter के पिछले संस्करण में हमने Indian Economic Thermometer (IET) पर से पर्दा उठाया था। IET में रिटले लोन ग्रोथ की नयी जानकारी दी गयी थी। रिटेल लोनों में एक प्रमुख हिस्सा हाउसिंग लोनों का होता है। मार्च 2017 में बैंकों द्वारा वितरित कुल रिटेल लोनों में हाउसिंग लोनों की हिस्सेदारी लगभग 53 % थी।

बैंकों द्वारा दिये गये कुल हाउसिंग लोनों पर गौर करते हुए भारत में रियल-इस्टेट की दशा-दिशा के बारे में हम कुछ निष्कर्ष निकाल सकते हैं । इस क्रम में हम तालिका-1 पर नजर डाल सकते हैः इस तालिका में विगत वर्षों में बैंकों द्वारा बाँटे गये होमलोन की कुल रकम दर्शायी गयी है।

तालिका-1 :
  Total Home Loans Given by Banks (in Rs crore) Increase/Decrease with respect to the previous year
2012-13 59,647  
2013-14 81,900 37.3%
2014-15 89,935 9.8%
2015-16 118,245 31.5%
2016-17 113,323 -4.2%

Source: Centre for Monitoring Indian Economy.

तालिक-1 से बहुत मजेदार जानकारी प्राप्त होती हैः पिछले पाँच सालों में पहली बार एक साल की अवधि में बैंकों द्वारा दिये गये होमलोन की कुल रकम में गिरावट दर्ज की गयी है। वर्ष 2016-17 में दिया गया कुल होमलोन वर्ष 2015-16 में दिये गये कुल होमलोन की तुलना में लगभग 4.2 % कम था। यह, वह अन्य आँकड़ा है, जो भारत में रियल-इस्टेट की मृतप्राय दशा को बयान करता है।

यहाँ पर दिमाग में एक बात रखी जानी चाहिए कि हाउसिंग फाइनेंस कंपनियाँ भी होमलोन प्रदान करती हैं। इसमें परेशानी की बात ये है कि इन कंपनियों द्वारा प्रदत्त होमलोन के बारे में नियमित आँकड़े उपलब्ध नहीं हैं। यह एक बड़ी विडंबना है; क्योंकि हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों को नेशनल हाउसिंग बैंक (एनएचबी) नियंत्रित करता है; जोकि 100 प्रतिशत भारतीय रिजर्व बैंक की मातहत है। यह सवाल पूछने लायक है कि जब रिजर्व बैंक माह-दर-माह बैंकों द्वारा दिये गये लोनों का आँकड़ा पेश कर सकता है, तो फिर ऐसा करने से एनएचबी को कौन रोक रहा है ?

एनएचबी की तरफ से जो नवीनतम आँकड़ा उपलब्ध है, वह 31 मार्च 2015 का है। सचमुच में, अधिकतम दो साल के बाद यह किसी काम का नहीं रह जायेगा, यह देखते हुए कि हम होमलोन की वर्तमान स्थिति जानने की कोशिश कर रहे हैं। वर्ष 2014-15 में, हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने 75,488 करोड़ रुपये का होमलोन दिया। इसी अवधि में बैंकों ने 89,935 करोड़ रुपये का होमलोन बाँटा। इसका मतलब हुआ कि 2014-15 के दौरान हाउसिंग फाइनेंस कंपनियों ने कुल वितरित होमलोन का लगभग 45.6 % लोन दिया। आदर्श रूप में देखा जाये, तो इस आँकड़े की उपेक्षा नहीं की जा सकती है। लेकिन यह देखते हुए कि इन आँकड़ों तक हमारी पहुँच नहीं है, फिर इस बारे में कुछ नहीं कह सकते।

पाँच सालों में पहली बार, बैंकों द्वारा एक साल की अवधि में वितरित कुल होमलोन की रकम में गिरावट दर्ज की गयी है।

अब असल बात पर वापस लौटते हैः शेड्युल्ड कॉमर्शियल बैंकों द्वारा 2016-17 में दिये गये होमलोनों के बारे में थोड़ा विस्तार से जानने का प्रयास करते हैं। मार्च 2017 में बैंकों ने 39,952 करोड़ रुपये का होमलोन दिया। इसका मूल-अर्थ यही हुआ कि एक साल की पूरी अवधि में दिये जाने वाले कुल होमलोन का 35.3 % मात्र एक माह में वितरित हो गया। मार्च वित्तीय वर्ष का अंतिम महीना भी होता है।

यहाँ पर हो क्या रहा है ? मार्च 2017 के पूर्व, सितंबर 2016 में 18,900 करोड़ रुपये का होमलोन वितरित किया गया। एक पूरे साल की अवधि में वितरित कुल होमलोन का यह 17% था। इस प्रकार देखते हैं कि पूरे साल में वितरित होने वाले होमलोन का आधे-से-अधिक होमलोन , मात्र दो माह में वितरित हो गया।

यह जगजाहिर-सी बात है कि बिल्डरों के पास अनबिके आवासों की पूरी फेहरिश्त है। ये आवास निर्माण के विभिन्न चरणों में हैं। साथ ही, बिल्डर कुछ समय से इनको बेचने की कोशिश भी कर रहे हैं। इसके लिए वे बेहतर कीमत के साथ तमाम तरह के आकर्षक प्रस्ताव ला कर रहे हैं।

फेहरिश्त में शामिल कुछ आवास निर्माण के अंतिम चरण में हैं। आवास खरीदारों के लिए यह थोड़ा आकर्षक हो गया है, यह देखते हुए कि निर्माणधीन की तुलना में निर्मित आवास खरीदना लोग अधिक पसंद करने लगे हैं। इसके अलावा बिल्डर साल का अंत सुखद ढंग से करना चाहते हैं, इसलिए मार्च 2017 में वे आवास की कीमतों को लेकर नरम रहे हैं, ऐसा बैंकरों ने हमें बताया।

एक अलग चीज देखने को मिल रही हैः आजकल लोग किसी आवास के चयन या खरीदने के मुहाने पर आकर होमलोन के लिए अर्जी नहीं दे रहे हैं। वे होमलोन को एडवांस में सिर्फ पास कराकर रख लेते हैं। अच्छी कीमत पर आवास मिलने के बाद ही इस रकम का उपयोग खरीदने में करते हैं। मार्च 2017 में होमलोन में उछाल आने की एक वजह यह भी है।

एक बार घर खरीदकर उसमें रहना शुरू करने के साथ लोग सेकेंडरी होम मार्केट में भी सक्रिय होने लगते हैं। मतलब कि जिस घर में वे रह रहे होते हैं, उसको बेचने की सुगबुगाहट भी उनमें पैदा होने लगती है। इसके कारण भी होमलोन लेने वालों की संख्या बढ़ जाती है। आनेवाले महीनों में इसमें और तेजी आने की संभावना है, अगर जिस बात पर मैं जोर दे रहा हूँ सही साबित होती है।

एक अन्य बिंदु का जिक्र मैं यहाँ कर रहा हूँ कि नवंबर 2016 और फरवरी 2017 के बीच बैंकों ने बमुश्किल कोई होमलोन दियाः इस अवधि में मात्र 8,851 करोड़ रुपये का लोन दिया; मार्च 2017 में बैंकों ने कुल 39,952 करोड़ रुपये का दिया। पिछले चार माह में दिये गये होमलोन का यह 4.5 गुणा था।

साल का अंतर बिल्डर अच्छे ढंग से करना चाहते थे, इसलिए मार्च 2017 में उन्होंने आवास की कीमतों में नरमी दिखायी।

नोटबंदी के कारण नवंबर 2016 और फरवरी 2017 के बीच लोगों ने होमलोन नहीं लिया। सरल-सी बात थी कि इस दौरान सिस्टम में मुद्रा की भारी कमी थी। इसकी वजह से रियल-इस्टेट ट्रॉन्जैक्शन ठप पड़ गया। पर्याप्त मुद्रा के अभाव में रियल-इस्टेट ट्रॉन्जैक्शन में काले धन के हिस्से की माँग को पूरा कर पाना संभव नहीं था। आवासों के स्वामी ( बिल्डर ओर निवेशक) अपना आवास बेचने को तैयार नहीं थे। क्योंकि लेने-देन का एक हिस्सा उन्हें काले धन के रूप में चाहिए ही था।

मार्च 2017 तक तीन-चौथाई प्रतिबंधित मुद्रा की जगह नयी मुद्रित मुद्रा प्रचलन में आ गयी थी।

इसका मतलब यह कि मार्च 2017 तक देश की वित्तीय-प्रणाली में इतनी मुद्रा आ गयी थी कि रियल इस्टेट ट्रॉन्जैक्शन में काले धन की माँग को पूरा किया जा सकता था। यही नहीं, 2000 रुपये के नोट ने तो इसे और आसान बना दिया।

मुद्रा की इस पर्याप्त उपलब्धता से एक बात पक्की हो गयी कि किसी भी रियल-इस्टेट ट्रॉन्जैक्शन में जो कालाधन लगता है, उसका भुगतान आसानी से हो सकता है; लेकिन नवंबर 2016 से जनवरी 2017 के बीच असंभव हो गया था। एक बार ट्रान्जैक्शन में काले धन का इस्तेमाल संभव हो गया, तो रियल-इस्टेट की खरीदी-बिक्री फिर से आरंभ हो गयी। इसी के साथ होमलोन का लेन-देन भी शुरू हो गया।

एक तरफ बिल्डर वित्तीय वर्ष का अंत सुखद देखना चाहते थे और दूसरी तरफ वित्तीय-प्रणाली में मुद्रा की उपलब्धता सामान्य हो रही थी। इसको देखते हुए आवास खरीदने के लिए लोगों ने फिर से होमलोन लेना शुरू कर दिया। एक रोचक सवाल पूछा जा सकता है कि होमलोन की यह दोबारा माँग क्या आगे भी जारी रहेगी? यह तभी पता चलेगा जब अप्रैल 2017 के होमलोन के आँकड़े प्राप्त होंगे।

यहाँ पर एक बड़ा सवाल यह है कि क्या रियल-इस्टेट की कीमतें गिर रही हैं ? यदि रियल इस्टेट इंडस्ट्री की बातों पर यकीन करें, तो आपको लगेगा कि रियल-इस्टेट की कीमतें या तो गिर नहीं रही हैं, या फिर इसमें और गिरावट नहीं आने जा रही है।

आशुतोष लिमये, हेड-रिसर्च & आरईआइएस, जेएलएल, ने ईटी नाउ को बताया कि “ कीमतें गिरी हैं, लेकिन कुल मिलाकर कीमतें ठहरी हुई हैं।” दूसरी तरफ गेटंबर आनंद ने मनीकंट्रोल.कॉम को बताया: “ मेरा मानना है कि अधिकतर बाजारों में कीमतें निम्नतन बिंदु पर और स्थिर हो गयी हैं। अब इसमें कम या फिर नाममात्र की कमी आने की संभावना बची है।”

इसकी सचाई जानने के लिए कुछ आँकड़ों पर एक नजर डालते हैं। जैसा कि मैंने पहले उल्लेख किया है कि भारत में रियल-इस्टेट संबंधी आँकड़े हासिल करना उतना आसान नहीं है। आवास या फ्लैट की कीमतों में कमी आ रही है या नहीं इसका पता लगाने का एक सबसे आसान तरीका है यह मालूम करना कि सौदे किन कीमतों पर हो रहे हैं। लेकिन कोई एकत्रित आँकड़ा न होने के कारण हमें इसको एक भिन्न तरीके से देखना होगा।

बड़ा सवाल है कि क्या रियल-इस्टेट की कीमतें गिर रही हैं ?

हर बैंक को रिजर्व बैंक के निर्देश के अनुसार प्राथमिकता आधारित सेक्टरों को लोन (Priority Sector Housing Loan ) देना होता है। होमलोन के मामले में किस तरह के लोन को प्राथमिकता आधारित सेक्टर लोन की श्रेणी में रखा जाता है? 23 अप्रैल 2015 के भारतीय रिजर्व बैंक के सर्क्युलर के अनुसार प्राथिमकता आधारित सेक्टर की परिभाषा हैः-

    “महानगरीय केंद्रों (10 लाख से अधिक जनसंख्या) में प्रति परिवार एक आवास खरीदने/निर्माण के लिए 28 लाख रुपये और दूसरी जगहों पर 20 लाख रुपये तक का व्यक्तिगत लोन, बशर्ते कि महानगरों और दूसरी जगहों में कुल लागत क्रमशः 35 लाख और 25 लाख रुपये से अधिक नहीं होनी चाहिए।”

प्राथमिकता आधारित सेक्टर होमलोन को इसी तरह से परिभाषित किया जा रहा है। इस तरह देखते हैं कि 10 लाख या इससे से अधिक जनसंख्या वाले महानगरों में 35 लाख रुपये की अधिकतम लागत वाले और अन्य जगहों पर आवास की खरीदी के लिए 28 लाख रुपये तक के आवास लोन को प्रॉइआरिटी सेक्टर हाउसिंग लोन की श्रेणी में रखा जाता है। दूसरी जगहों पर 25 लाख रुपये तक के आवास की खरीदी के लिए 20 लाख रुपये तक लोन को प्रॉइआरिटी सेक्टर हाउसिंग लोन कहा जाता है।

तालिक-2 पर नजर डालते हैं: इस तालिका में बैंकों द्वारा कुल होमलोन के अनुपात में प्रदत्त प्रॉइआरिटी सेक्टर लोन को दर्शाता है।

आखिरकार तालिका-2 हमें क्या बताती है ? हमारी रुचि सिर्फ वर्ष 2015-16 और 2016-17 को लेकर है, जब प्रॉइआरिटी सेक्टर हाउसिंग लोन की परिभाषा समान थी। हम देख सकते हैं कि 2016-17 में कुल दिये गये लोन के लगभग 23 % प्रॉइआरिटी सेक्टर होम लोन थे। वर्ष 2015-16 में यह आँकड़ा सिर्फ 16.8 % का था। कोरे आँकड़ों में कहें तो 2015-16 की तुलना में वर्ष 2016-17 में 31.1% प्रॉइआरिटी सेक्टर होम लोन बाँटे गये।

इसका क्या मतलब हुआ ? इसका यह मतलब हुआ कि महानगरों में 35 लाख रुपये या कमतर की अधिकृत पंजीकृत कीमत या दूसरी जगहों पर 25 लाख रुपये या कमतर कीमत के दायरे में बैंकों ने अधिक होमलोन दिये। हम अधिकृत पंजीकृत कीमत का प्रयोग सिर्फ इसलिए कर रहे हैं; क्योंकि ट्रान्जैक्शन में कालाधन वाला हिस्सा हमेशा नकदी में चुकाया जाता है।

तालिका-2 :
  Total Home Loans (in Rs Crore) Priority Sector Home Loans (in Rs Crore) Proportion
2012-13 59,647 1,349 2.3%
2013-14 81,900 34,800 42.5%
2014-15 89,935 20,386 22.7%
2015-16 118,245 19,890 16.8%
2016-17 113,323 26,082 23.0%

Source: Centre for Monitoring Indian Economy.

उपर्युक्त आँकड़ों से एक बात और साफ होती है कि या तो आवासों की कीमतें गिरी हैं या फिर उस सेगमंट ( इसे बिल्डर अक्सर अफार्डेबल हाउसिंग कहना पसंद करते हैं) में अधिक आवासों का निर्माण किया गया । पिछले वित्तीय वर्ष के बाकी महीनों की तुलना में मार्च 2017 में सर्वाधिक होमलोन प्रदान किया गया। इसी माह में कुल होमलोन में , 28% लोन, प्रॉइआरिटी सेक्टर होम लोन थे।

इसको ध्यान में रखें तो होमलोन डाटा से जरूर संकेत मिलता है कि आवास कीमतों में गिरावट आयी है। बेशक, कीमतों में कितनी गिरावट आयी है, इसका पता लगाने का कोई उपाय नहीं है। देश के विभिन्न हिस्सों में फर्क हो सकता है।

आँकड़ों से लगता है कि आवास की कीमतें कम हुई हैं।

लेकिन सवाल यह है कि व्यक्तिगत तौर पर कीमतों में कमी लाने का तरीका क्या है ? एक तरीका है कि कुछ समय तक बिल्डरों के प्रतिनिधियों से बात करते रहें। अपने में उनकी रुचि बनाये रखें और कीमतों में कमी करने की कोशिश करते रहें। बेशक, इसके लिए काफी धीरज रखने की जरूरत होती है। यह इस बात भी निर्भर है कि एक बिल्डर अपना तैयार आवास/फ्लैट बेचने के लिए कितना उत्सुक या अधीर है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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