रिटेल इन्वेस्टर आज भी आसानी से झाँसे में आ जाता है

नेशनल स्टॉक एक्सचेंज के निफ्टी इंडेक्स ने हाल ही में पहली बार 10,000 के अंकों का आँकड़ा पार किया। इसको लेकर काफी जश्न मनाया गया। इनसान सचमुच में बड़े आँकड़ों से काफी प्यार करता है। यही वजह है कि जब शेयर मार्केट (शेयर बाजार) संबंधी सूचकांकों के एक निश्चित सीमा पार जाने के बाद की खबरें आती हैं, तो हम लट्टू हो जाते हैं।

पिछले 10 दिनों से बीएसई सेंसेक्स भी 32,000 से ऊपर रहा है।

सबसे बड़ा सवाल यह है कि खुदरा यानी छोटे निवेशक ने स्टॉक मार्केट में पैसा कमाया है या नहीं? इसका पता लगाने का एक अच्छा तरीका है कि म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो की कुल संख्या पर ध्यान दें:-
चित्र-1 पर एक नज़र डालें। इसमें मार्च 2008 के बाद से म्युचुअल फंड फोलियो की कुल संख्या के साथ-साथ खुदरा म्युचुअल फंड फोलियो को प्रदर्शित किया गया है।

चित्र-1 :

चित्र-1 म्युचुअल फंड फोलियो प्रदर्शित है।

पहली दो प्रविष्टियाँ मार्च 2008 और मार्च 200 9 की हैं। इसके बाद सितंबर 2014 तक छमाही आंकड़े प्रदर्शित हैं। फिर म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो के त्रैमासिक आँकड़े हैं। नीली रेखा म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो की कुल संख्या को दर्शाती है और नारंगी रेखा खुदरा म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो की कुल संख्या का ब्यौरा देती है।

चित्र-1 को पढ़ना काफी दिलचस्प है: सितंबर 2009 तक खुदरा म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो की कुल संख्या 4.69 करोड़ थी। सितंबर 2014 के अंत में यह संख्या 1 9 .1 % घटकर 3.8 करोड़ के पोर्टफोलियो पर आ गयी। इसी अवधि में सेंसेक्स ने 55.5 % ( या 9.2 % सालाना ) का रिटर्न दिया; लेकिन यह रिटर्न इतना नहीं था कि इक्विटी म्युचुअल फंडों में पैसा लगाने के लिए खुदरा निवेशकों को प्रेरित कर सके।

इसकी एक सामान्य-सी वजह है : इक्विटी में प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष तौर पर पैसा लगाने वाले खुदरा निवेशकों को 2008-2009 की शेयर बाजार के तबाही में भारी नुकसान उठाना पड़ा था और उससे अभी तक वे उबर नहीं पाये थे।
सितंबर 2014 से खुदरा म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो की कुल संख्या में फिर से वृद्धि होने लगी।

चित्र-2 पर एक नज़र डालें। इसमें मार्च 2011 के बाद से रिटेल म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो में सालाना वृद्धि को दर्शाया गया है:-

चित्र-2 :

चित्र- 2 से हमें क्या पता चलता है? यह हमें बताता है कि पिछले दो सालों में रिटेल म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो की वृद्धि दर बढ़ गई है। मार्च 2016 और मार्च 2017 के बीच बड़े आधार पर 15.2% की वृद्धि हुई। चित्र-3 पर एक नज़र डालें: इसमें दिसंबर 2014 से यह रिटेल म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो में त्रैमासिक वृद्धि दर्शायी गयी है।

चित्र-3 :

चित्र-3 से हमें क्या पता चलता है? यह हमें बताता है कि म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो में त्रैमासिक वृद्धि दर अप्रैल-जून 2017 की अंतिम तिमाही में सबसे ज्यादा रही है।

सितंबर 2014- जून 2017 के बीच खुदरा म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो में नाटकीय रूप से वृद्धि हुई है। पर देखना होगा कि इस अवधि में शेयर बाजार का प्रदर्शन कैसा रहा ? सेंसेक्स ने 16.1 % ( लगभग 5.6 % सालाना) का कोरा रिटर्न दिया है। अब इसकी तुलना सितंबर 200 9- सितंबर 2014 के बीच की स्थिति से करें; जब सेंसेक्स 55.5 % चढ़ा और खुदरा म्युचुअल फंड पोर्टफोलियो 20% की गिरावट आयी।

यह हमें क्या जताता है? यह हमें बताता है कि खुदरा निवेशकों को शेयर बाजार में पैसा लगाने के लिए तैयार करना काफी आश्वस्त करना पड़ता है। हमें यह भी बताता है कि अर्थव्यवस्था के बारे में केंद्र सरकार देश की अर्थ-व्यवस्था के सम्मानजनक हालत काम करने की बात जो प्रचारित कर रही है, उसका असर निवेशकों पर पड़ रहा है। इस तरह वे पैसा लगा रहे हैं।

इसके अलावा, हमें इस बात की भी जानकारी मिलती है कि सावधि जमाओं (फिक्स्ड डिपॉजिट), रियल इस्टेट, गोल्ड आदि जैसा निवेश करने के दूसरे तरीकों से रिटर्न निराशाजनक ढंग से कम रहा है। इस कारण से लोग अच्छे रिटर्न की तलाश में शेयर बाजार में पैसा लगा रहे हैं।

इसका भी अर्थ यह है कि जिन निवेशकों ने सितंबर 2014 के बाद निवेश किया है, उन्होंने शेयर बाजार में आयी तेजी का फायदा नहीं मिला। खुदरा निवेशक रिटर्न के पूर्व इतिहास के बजाय, स्टॉक मार्केट के उतार-चढ़ाव को देख कर पैसा लगाते हैं।

बेशक, शेयर बाजारों में बढ़ोतरी हो सकती है और देर से आने वाले सभी निवेशकों को भी जश्न मनाने का मौका मिल सकता है। हम फटा-फट पैसा बनाने की चाहत रखने वाले युग में रहते हैं। पश्चिमी देशों के सेंट्रल बैंकों की चकाचौंध करनेवाली बेशुमार धन से स्टॉक मार्केट बुलबुला निर्मित होता रह सकता है। जब तक ऐसा संभव है, तब तक चलता रहेगा।

लेकिन अगर शेयर बाजार में तेजी कायम नहीं रहती है, तो दुनिया को फिर से निवेश के पुराने तौर-तरीके से एक सबक सीखने की आवश्यकता होगीः खुदरा निवेशक भोला-भाला बना रहता है और आसानी से झाँसे में आ जाता है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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