सच रिजर्व बैंक बता रहा, सरकार नहीं


आर्थिक भविष्यवाणी के बिज़नेस में हमने जो एक बात सीखी है, वह यह कि जब भविष्यवाणी सही हो तो उसकी तरफ लोगों का ध्यान आकर्षित करें और उसका खूब ढोल पीटें। इसी संदर्भ में बात करें, तो भारतीय रिजर्व बैंक के नये डिप्टी गवर्नर विरल आचार्य ने कुछ सप्ताह पहले ऐसी चंद चीजें बतायीं, लगता है, हमारा ध्यान उस पर नहीं गया। ( आपको मालूम है जिस दर से मीडिया विस्तार कर रहा है, उसमें हर चीज पर नजर रख पाना मुश्किल हो गया है।)

चलिए कोई बात नहीं। हम बताते हैः "विरल आचार्य ने 6 मार्च, 2017 को यानी अपने जन्म-दिन के कुछ दिनों बाद कहा : “मेरी समझ से हर कोई इस बात को ध्यान में रखे कि रीमनिटाइजेशन का काम बड़ी तेजी से आगे बढ़ रहा है। हमें अभी थोड़ा रास्ता तय करना है। हमें उम्मीद है कि आगामी दो-तीन माह में संपूर्ण करेंसी सर्क्युलेशन में आ जायेगी। यह थोड़ी कमतर मात्रा में होगी, लेकिन यह लगभग उसी संख्या के आसपास होगी।"

आचार्य दरअसल यह कहना चाहते थे कि मई 2017 तक देश में करेंसी का सर्क्युलेशन- 500 और 1,000 रुपये के नोटों पर प्रतिबंध लगाने के पहले के स्तर के करीब पहुँच जायेगा। हम यही बात शुरू से कहते आ रहे हैं- इसके बावजूद कि हमारा कई बार मजाक बनाया गया।

सचमुच में, यदि नरेंद्र मोदी सरकार पर भरोसा करें, तो नोटबंदी के कारण देश में नोटों की कभी कमी थी ही नहीं । फरवरी के आरंभ में वित्त मंत्री अरुण जेटली ने तो यहाँ तक कह दिया : *“किसी भी समय, एक भी दिन करेंसी की कोई कमी नहीं थी। ” * इसी के आसपास जेटली को रिपोर्ट करने वाले आर्थिक मामलों के सचिव शक्तिकांत दास ने कुछ जेटली की ही तर्ज पर ही कहा-“ रीमनिटाइजेशन की प्रक्रिया पूरी हो चुकी है।”

[ रीमनिटाइजेशन- रीमनिटाइजेशन का अर्थ है मुद्रा की छपाई और वित्तीय प्रणाली में इसको डालना।]

हम मुंबई में रहते हैं- दिल्ली में नहीं। हम दास के बारे में नहीं जानते। लेकिन अगर हम जानते भी होते तो निश्चित तौर पर उनसे पूछते कि यदि रीमनिटाइजेशन फरवरी में ही लगभग पूरा हो गया था, तो क्यों भारतीय रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर, जिन्हें ऐसी चीजों के बारे में थोड़ी-बहुत जानकारी होती है, कहते हैं कि रीमनिटाइजेशन मई 2017 में ही जाकर पूरा होगा।

अब विरल आचार्य के कथन के मतलब को समझते हैं। तालिका-1 देखें। इसमें नवीनतम आँकड़ों के अनुसार करेंसी के साप्ताहिक सर्क्युलेशन को दर्शाया गया है- जनवरी 2016 के आखिर से 10 मार्च 2017 तक।

Figure 1


तालिका-1 में हमें क्या दिखायी देता है ? तालिका से पता चलता है कि नोटबंदी के बाद करेंसी के सर्क्युलेशन में नाटकीय रूप से कमी आयी। यह आश्चर्य की बात नहीं है, यह देखते हुए कि सर्क्युलेशन में मौजूद 86 प्रतिशत करेंसी रातोंरात बेकार हो गयी। जनवरी 2017 के आरंभ से करेंसी के सर्क्युलेशन में इजाफा हो रहा है। क्योंकि भारतीय रिजर्व बैंक नयी करेंसी की छपाई की मात्रा बढ़ाने के साथ वित्तीय-प्रणाली में इसको डाल रही है। 6 जनवरी 2017 से हर सप्ताह सर्क्युलेशन में करेंसी की औसत वृद्धि 38 हजार 645 करोड़ रुपये रही है।

इस चाल से 10 सप्ताह की अवधि अर्थात ढाई माह ( आचार्य के कहे अनुसार औसतन 2-3 माह ) में 19 मई 2017 तक ( 10 मार्च 2017 के बाद 10 सप्ताह ) कुल 16.32 लाख करोड़ रुपये ( 10 मार्च 2017 को 12.46 लाख करोड़ रुपये + 10 सप्ताह में जोड़ा गया 3.86 लाख करोड़ रुपये ) सर्क्युलेशन में होंगे। यदि पूरे तीन माह का हिसाब लगायें, तो 2 जून 2017 ( 10 मार्च, 2017 के बाद 12 सप्ताह ) को कुल 17.10 लाख करोड़ रुपये सर्क्युलेशन में होंगे।

नोटबंदी की घोषणा के पूर्व ( 4 नवंबर 2016 को ) 17.98 लाख करोड़ रुपये सर्क्युलेशन में थे। यदि *रीमनिटाइजेशन *का काम पूरा होने के बाद 17.10 लाख करोड़ रुपये सर्क्युलेशन में होता है, तो कुल सर्क्युलेशन में लगभग 4.9% की कमी होती है। यदि सर्क्युलेशन में 16.32 लाख करोड़ रुपये होते हैं, तो इसका मतलब सर्क्युलेशन में लगभग 9.2% की कमी होती है।

यदि सर्क्युलेशन में जारी करेंसी में लगभग 5-9 % की कमी आने का अंदेशा है, तो फिर अर्थ-व्यवस्था को इतने बड़े पैमाने पर अस्त-व्यस्त करने की जरूरत क्या थी- यह एक वाजिब सवाल है। वास्तविकता यह है कि आजकल चीजें जिस तरह काम कर रही हैं, उसमें हमें जवाब नहीं मिलेगा। हमें कुल-जमा यही बताया जायेगा कि लंबी अवधि में नोटबंदी फायदेमंद होगी।

इसके अलावा, मीडिया के शोर-शराबे के बीच लोग अब तक भूल गये हैं कि नोटबंदी के मूल उद्देश्यों में डिजिटल होने की कहानी शामिल नहीं थी। इसे एकदम बारीकी से पेश किया गया, जब कालेधन और नकली नोट को सुलझाने का मूल लक्ष्य जाता रहा। विरल आचार्य की टिप्पणी और इसके साथ हमारा विश्लेषण हमें क्या बताता है ? यह हमें बताता है, जो हम इधर कहने लगे हैं कि भारतीय नकदी लेन-देन की तरफ वापस मुड़ने लगे हैं। डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन में थोड़ी देर का आया झोंका पलटा खा गया है और समय के साथ यह साफ नजर आयेगा। इसका मतलब यह भी है कि भारतीय रिजर्व बैंक को और नोट छापने पड़ेंगे। यदि ऐसा नहीं किया जाता है, तो अर्थ-व्यवस्था में पर्याप्त करेंसी नहीं होगी और इसका आर्थिक ट्रॉन्जैक्शन की कुल संख्या पर असर पड़ेगा।

भारतीय रिजर्व बैंक को इस बात का एहसास है। उसे इस सचाई का पता है कि अर्थ-व्यवस्था में पर्याप्त करेंसी का होना बहुत जरूरी है। उसे इस बात का भी पता है कि डिजिटल ट्रॉन्जैक्शन का बढ़ा-चढ़ाकर प्रचार करने के बावजूद बात नहीं बनी। ऐसी दशा में ज्यादा-से-ज्यादा करेंसी जारी करनी पड़ेगी।

उर्जित पटेल राज में इस बात को बिलकुल सीधे तरीके से नहीं कह सकते हैं। इसके बावजूद हमें कही जाने वाली बातों के वास्तविक या गुप्त अर्थ को समझना पड़ता है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल’स डॉयरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ * के संपादक है। विवेक कौल एक लेखक हैं । वे पूर्व में ‘डेली न्यूज एंड अनैलिसिस’ (डीएनए) और ‘द इकोनॉमिक्स टॉइम्स’ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। वे ‘द इजी मनी ट्रिलॉजी’ के लेखक हैं। ट्रिलॉजी की नवीनतम किताब ‘इजी मनीः द ग्रेटेस्ट पोंजी स्कीम एवर एंड हाउ इट इज सेट टू डिस्ट्रॉय द ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम’ मार्च 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब एमजॉन की बेस्ट सेलर साबित हुई । विवेक कौल ने ‘द टॉइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द हिंदू’, ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’, ‘बिजनेस वर्ल्ड’, ‘बिजनेस टुडे’, ‘इंडिया टुडे’, ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’, ‘फोर्ब्स इंडिया’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘द एशियन एज’, ‘म्युचुअल फण्ड इंनसाइट’, ‘वेल्द इनसाइट’, ‘स्वराज्य’, ‘बंगलौर मिरर’ और अन्य के लिए भी लिखा है।*

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