सही है; सरकारें हर एक को नौकरी नहीं दे सकतीं, फिर भी..

पिछले सप्ताह भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह ने एक महत्वपूर्ण बयान दियाः “ हमने रोजगार को एक नया स्वरूप प्रदान करने की कोशिश की है; क्योंकि 125 करोड़ लोगों वाले देश में हर एक को नौकरी प्रदान कर पाना संभव नहीं है। हम स्व-रोजगार को बढ़ावा दे रहे हैं और इस क्रम में सरकार ने 8 करोड़ लोगों को स्व-रोजगार प्रदान किया है।”

अमित शाह ने चाहे जो कहना चाहा हो, मगर इसमें दो राय नहीं है कि केंद्र में किसी-की भी सरकार हो, देश में जितनी बड़ी तादाद में नौकरियों की जरूरत है, उतनी नौकरियाँ मुहैया कर पाना उसके लिए संभव नहीं है। लेकिन, यहाँ पर एक बात और भी कही जा सकती है कि आमतौर पर भारतीय नेता अपनी साफगोई के लिए नहीं जाने जाते। इस तरह, अमित शाह ने जो भी कहा, उसके लिए वे तारीफ के हकदार हैं।

केंद्रीय सार्वजनिक-क्षेत्र के उद्यमों में विगत सालों में नौकरियों की संख्या में कमी आयी है। तालिका-1 पर नजर डालते हैं....

तालिका-1: Employment and Average Annual Emoluments in CPSEs

तालिका-1 से पता चलता है कि विगत दशक के दौरान केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों में नौकरियाँ पाने वालों की संख्या में गिरावट आयी है। वर्तमान में केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों की स्थिति क्या है ? एक जनवरी, 2016 को केंद्रीय सरकार ने 38.3 लाख कर्मचारियों के आकार को मंजूरी दी थी। लेकिन उसके कर्मचारियों की संख्या 31.7 लाख थी। 1 जनवरी 2010 तक कर्मचारियों की स्वीकृत संख्या 38.9 हो गयी; मगर कर्मचारियों की वास्तविक संख्या गिर कर 32.3 लाख पर आ गयी।

1 जनवरी 2014 को स्वीकृत संख्या एक बार फिर बढ़ते हुए 40.5 लाख हो गयी, लेकिन वास्तविक संख्या मामूली वृद्धि के साथ 33 लाख हुई। इस तरह देखते हैं कि साल 2006 और 2014 के बीच केंद्रीय सरकार के कर्मचारियों के बेड़े में लगभग 28,000 कर्मचारी जोड़े गये।

इन सबसे अलग, विभिन्न राज्य सरकारों के कर्मचारियों की संख्या करीब 72 लाख है। इस प्रकार देखते हैं कि सरकार द्वारा नौकरियों के निर्माण की क्षमता सिमित है। इससे बात नहीं बनती, जब देखते हैं कि लगभग 10 लाख भारतीय हर माह देश के कामकाजी वर्ग का हिस्सा हो रहे हैं। जबकि हर साल देश की अर्थ-व्यवस्था को 1.2 करोड़ नौकरियों का निर्माण करने की आवश्यकता है।

बेरोजगार लोगों की दुर्दशा के बारे में मैंने अपनी नयी किताब ‘India’s Big Government—The Intrusive State and How It is Hurting’ में लिखा है। एक गौर करनेवाली पंक्ति हैः “ नौकरियों की तलाश में लगे केवल 60.6% लोगों को ही पूरे साल के लिए काम मिल पाता है। ग्रामीण इलाकों में यह आँकड़ा मात्र 52.7 % का है। इसका मतलब यह है कि ग्रामीण इलाकों में काम ढूँढ़ने वालों में लगभग आधे पूरे साल बेरोजगार रहते हैं।”

यह आँकड़ा साल 2015-16 का है। पिछला सर्वे 2013-14 का है। इस तरह दोनों में खास फर्क नहीं है। पिछले सर्वे के अनुसार काम ढूँढ़ने वालों में 60.5 % पूरे साल के लिए काम पाने में सफल रहे। ग्रामीण इलाकों में यह आँकड़ा 53.2% का रहा। बाकी आँकड़े ताजातरीन सर्वे के आँकड़ों के समान ही हैं।

शाह की बात

पिछले सप्ताह अमित शाह ने स्व-रोजगार के बारे में जानकारी दी। उन्होंने बताया कि केंद्रीय सरकार ने 8 करोड़ लोगों को स्व-रोजगार प्रदान किया है। इसके साथ ही उन्होंने यह भी कहाः “ देश में उपलब्ध नौकरियों की सटीक जानकारी देने वाली कोई प्रणाली नहीं है।” हमें आश्चर्य होता है कि फिर 8 करोड़ का आँकड़ा कहाँ से आया ?

शाह ने अपने बयान में स्व-रोजगार को ऐसा दर्शाया जैसे मौजूदा सरकार के लिए कोई अद्भुत चीज हो। दरअसल जिस किसी भारतीय को नौकरी नहीं मिलती, वह स्व-रोजगारी हो जाता है। जैसा कि अभिजीत बनर्जी और इस्थर डफ्लो ‘Poor Economics’ में लिखते हैं: “ गरीबों में अपना खुद का व्यवसाय करनेवालों की मात्र संख्या ही विस्मय में डाल देती है। क्यों न हो, ऐसा लगता है कि हर चीज गरीबों के विरोध में खम ठोंक कर खड़ी हो, जिससे कि वे उद्यमी बन जाते हैं। उनके पास अपनी खुद की पूँजी ( परिभाषा के अनुसार लगभग) तो होती नहीं है , और ...उनके पास औपचारिक बीमा, बैंक और महँगे फाइनेंस की सुविधा मामूली-सी होती है....औसतन देखा जाये तो वे खास कमाई नहीं कर पाते।”

मुद्दे की बात ये है कि कामकाजी-वर्ग का बड़ा हिस्सा स्वेच्छा से स्व-रोजगारी नहीं बना है; वह स्व-रोजगारी यानी एक उद्यमी इसलिए बन बैठा है कि उसके पास दूसरा कोई विकल्प नहीं है। बनर्जी और डफ्लो इन्हें ‘अनिच्छुक उद्यमी’ (Reluctant Entrepreneurs) कह कर बुलाते हैं। इसे इस तथ्य से समझा जा सकता है कि भारतीय कामकाजी-वर्ग का लगभग 46-47% स्व-रोजगार करता है।

एक सचाई है कि भारतीय ‘अनिच्छुक उद्यमी’ हैं। इसकी पुष्टि National Manufacturing Policy- 2011 में उजागर किये गये आँकड़ों से भी होती है। अनुमानों के अनुसार देश में कुल 2.60 करोड़ लघु और मध्यम उद्यम [Small and Medium Enterprises (SMEs)] थे। इनमें 5.90 करोड़ लोग काम कर रहे थे। इसका मतलब कि औसतन एक SME ने 2.27 व्यक्तियों को रोजगार दिया। The Boston Consulting Group के अनुमान के अनुसार 3.60 करोड़ SME (ग्रुप के शब्दों में micro-SMEs) ने 8 करोड़ से अधिक व्यक्तियों को रोजगार दिया। इसका मतलब कि SME से औसतन 2.22 व्यक्तियों को रोजगार प्राप्त हुआ। इन कंपनियों की देश के विनिर्माण उत्पादन (Manufacturing Output) में 45% की हिस्सेदारी है।

इससे एक बात स्पष्ट हो जाती है कि औसत भारतीय विनिर्माण कंपनियों का आकार बहुत छोटा होता है। यह इस बात का एक जीता-जागता उदाहरण है कि अधिकतर भारतीय इसलिए उद्यम शुरू करते हैं कि उन्हें नौकरी नहीं मिलती। वे छोटे उद्यम आरंभ करते हैं, और छोटा ही बनाये रखते हैं।

इसकी एक वजह है कि उन्हें अपने उद्यम से पर्याप्त पूँजी नहीं निर्मित होती है, जिससे कि उसका विस्तार कर सकें। दूसरी वजह है कि देश में कारोबार करना आसान नहीं है। अगर कोई कंपनी तेजी से विकास करना चाहती है तो ढेर उसे सारे नियमों और शर्तों के साथ केंद्र और राज्यों की भ्रष्ट नौकरशाही के मकड़जाल से गुजरना होता है।

नौकरियाँ तो तब पैदा होती हैं, जब छोटी कंपनियों का आकार बढ़ता है और वे अधिक लोगों की नियुक्ति करती हैं। OECD (Organisation for Economic Co-operation and Development) के शोध-पत्र में लिखा हैः “ अधिकतर OECD देशों में नौकरियाँ देने में छोटे और मध्यम आकार के उद्यमों ( SMEs) की 60 से 70% हिस्सेदारी होती है। खास कर इटली और जापान में हिस्सेदारी बड़ी, जबकि अमेरिका में अपेक्षाकृत छोटी होती है। इसके अलावा नयी नौकरियाँ प्रदान करने में इनकी छोटे उद्यमों की भागीदारी विषम ढंग से भारी होती है। खासकर ऐसे देशों में, जहाँ रोजगार का बढ़िया रिकॉर्ड रहा हो, इसमें अमेरिका और नीदरलैंड का नाम शामिल है। कुछ उदाहरणों में नौकरियों के निर्माण में कंपनी के आकार की जगह उसकी उम्र का महत्व नजर आता है-रोजगार की हिस्सेदारी की तुलना में नयी कंपनियाँ अधिक उत्पादन करती हैं।”

इस प्रकार देखते हैं कि छोटी कंपनियों का आकार जब बढ़ता है; तो नौकरियों का निर्माण होता है। लेकिन जहाँ तक भारत की बात है, यहाँ पर ऐसा नहीं हो रहा है। श्रम-कानून जकड़े हुए हैं। इसी तरह कारोबार करना आसान नहीं है। इस मोर्चे पर अमित शाह की पार्टी की केंद्र सरकार ने बमुश्किल कदम उठाये हैं। नौकरियों के निर्माण में सरकार अधिक-से-अधिक सुविधाएं उपलब्ध कराने और निजी-क्षेत्र व व्यक्तियों को नौकरियाँ निर्मित करने में मदद करने का काम कर सकती है। लेकिन कहना जितना आसान है, करना उतना नहीं है।

उपसंहारः ‘प्रगति’ पत्रिका के संपादक और लेखक अमित वर्मा के साथ हाल ही में मैंने The Coming Jobs Crisis विषय पर एक पोडकॉस्ट (Podcast) तैयार किया है। यहाँ पर, मैंने जो कुछ भी कहा है अधिकतर बातें मेरी नयी किताब ‘India’s Big Government—The Intrusive State and How It is Hurting Us’ में हैं। आप पोडकॉस्ट को यहाँ पर सुन सकते हैं।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

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