सरकारी बैंकः खराब-ऋणों की वसूली बिलकुल अच्छी नहीं

केंद्र सरकार और भारतीय रिजर्व बैंक सालों से सरकारी क्षेत्र के बैंकों के खराब-ऋणों की वसूली की समस्या का समाधान करने की कोशिश करते रहे हैं। लेकिन इसमें खास सफलता हाथ नहीं लगी है; ऊपर से खराब-ऋणों का ढेर बढ़ता ही जा रहा है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन ऋणों की वसूली की हमेशा से उपेक्षा हुई है।

[* खराब-ऋण* (Bad Loan) खराब-ऋण वह ऋण है, जिसका भुगतान ऋण लेने वाले ने 90 या उससे अधिक समय से नहीं किया है।) बैंक, अधिकतर ऋण गिरवी रखी सम्पत्ति आदि पर देते हैं। इस तरह, एक लिहाज से ऋण सुरक्षित समझा जाता है। ऋण का भुगतान न हो पाने की स्थिति में गिरवी रखी सम्पत्ति बेच कर ऋण की रकम वसूल ली जाती है। लेकिन व्यवस्थाएं इतनी आसान होती नहीं हैं।

साल बीतने के साथ खराब-ऋणों की कुलमात्रा बेहिसाब ढंग से बढ़ी है। इसके साथ नाटकीय रूप से ऋणों की वसूली की दर कम होती गयी है। तालिका-1 , उक्त मापदण्ड पर सबसे पहले हम साल 2016-17 में सार्वजनिक-क्षेत्र के पाँच सबसे बड़े बैंकों पर एक नजर डालते हैं। 31 मार्च 2016 को सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंकों के स्वामित्व की कुल संपत्ति (असेट्स) में इन बैंकों की हिस्सेदारी 52.5% थी। इस प्रकार, सार्वजनिक-क्षेत्र के बारे में कुल भावी तस्वीर का अच्छा संकेत देते हैं।

तालिका-1: साल 2016-17 में रिकवरी की दर।
बैंक का नाम साल के आरंभ में खराब-ऋण साल में ऋणों की रिकवरी रिकवरी की दर
भारतीय स्टेट बैंक 98,173 5,197 5.29%
बैंक ऑफ बड़ौदा 40,521 4,088 10.09%
पंजाब नेशनल बैंक 55,818 10,677 19.13%
बैंक आफ इंडिया 49,879 4,598 9.22%
केनरा बैंक 31,638 4,162 13.16%
कुल 276,029 28,722 10.41%

Source: websites of Various banks.

तालिका-1 से हमें क्या पता चलता है ? इस तालिका के अनुसार साल 2016-17 में शीर्ष के पाँच सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंकों ने 10.4% की दर से खराब-ऋणों की रिकवरी की। इसका मतलब की साल के आरंभ में ये बैंक हर 100 रुपये में से 10 रुपये से थोड़े-से अधिक की रिकवरी कर सके थे। रिकवरी की यह निराशाजनक दर है।

अब जरा तालिका-2 पर नजर डालते हैं। इसमें साल 2015-16 में सार्वजनिक-क्षेत्र की शीर्ष 5 बैंकों की खराब-ऋणों की रिकवरी-दर दर्शायी गयी है।

तालिका-2: साल 2015-16 में रिकवरी की दर।
बैंक का नाम साल के आरंभ में खराब-ऋण साल में ऋणों की रिकवरी रिकवरी की दर
भारतीय स्टेट बैंक 56,725 4,389 7.74%
बैंक ऑफ बड़ौदा 16,261 1,481 9.11%
पंजाब नेशनल बैंक 25,695 4,262 16.59%
बैंक आफ इंडिया 22,193 3,555 16.02%
केनरा बैंक 13,040 3,976 30.49%
कुल 133,914 17,663 13.19%

Source: websites of Various banks.

तालिका-2 से हमें क्या पता चलता है ? हमें पता चलता है कि साल 2015-16 में सरकारी क्षेत्र की शीर्ष पाँच बैंकों की रिकवरी दर लगभग 13.2% थी। इसका मतलब हुआ कि ये बैंक इस साल के आरंभ में खराब-ऋण के हर 100 रुपये में से 13 रुपये से थोड़े-से अधिक की रिकवरी कर पाये।

तालिका-2 और तालिका-1 की तुलना से हमें जानकारी मिलती है कि साल के दौरान शीर्ष के उक्त पाँच बैंकों द्वारा खराब-ऋण की रिकवरी की दर में लगभग 280 बेसिस पॉइंट्स की गिरावट आयी है। [वन बेसिस पॉइंट (One basis point) का मतलब एक प्रतिशत का सौवाँ।]

हालात बद-से-बदतर होते गये हैं। जब तक सरकार खराब-ऋणों की रिकवरी दर में सुधार के लिए कोई कदम नहीं उठाती, कोई उल्लेखनीय वृद्धि संभव नहीं हो सकती है। ऐसी समस्याओं से निबट रहे वकील जिस एक खास बिंदु पर लगातार जोर दे रहे हैं, वह है ऋण रिकवरी ट्रिब्यूनलों की कमी और जो हैं, वहाँ पर्याप्त कर्मचारियों का न होना। यह ऐसी चीज है, जिसे आसानी से ठीक किया जा सकता है। ऐसे मसले को सुलझाये बगैर, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की खराब-ऋण की समस्या के समाधान के लिए किसी भी अन्य कदम से कुछ खास हासिल नहीं होगा। ये अन्य कदम दरअसल समस्या के समाधान को टाल ही सकते हैं। अब तक यही होता रहा है।

इकॉनमिक सर्वे में उल्लेख है : “Stressed debt बड़ी कंपनियों में सर्वाधिक देखा जा रहा है। बड़ी स्ट्रेस्ड कंपनियों में नकदी का प्रवाह पिछले कुछ समय से घटा है। इतना कि 50 प्रतिशत से अधिक की ऋण-कटौती सामान्य विकास और वृद्धि लाने के लिए जरूरी होगी। इसका एक ही विकल्प है- ऋण को इक्विटी में बदलना, कंपनी को हस्तगत कर लेना और नुकसान में बेच देना। ”

इसका कुल मतलब यही हुआ कि सरकार को सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंकों को बड़े पैमाने पर आर्थिक खैरात के जरिए संकट से बाहर लाना होगा ( विगत आठ सालों से चुपचाप ऐसा ही करती आ रही है )। चूँकि सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंक सरकारी स्वामित्व में हैं, इसलिए जितना संभव हो सरकार को इकॉनमिक सर्वे के प्रावधानों के अनुसार काम करना चाहिए। बड़ी कंपनियों ने ऋण लिया हुआ है और डिफाल्टर साबित हुई हैं, उन्हें बच कर निकल जाने नहीं देना चाहिए। ऐसे में यह बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है कि संस्थागत-तंत्र को मजबूत करके ही खराब-ऋणों की रिकवरी दरों को सुधारा जा सकता है। बैंकों को जिस तरीके से भी संभव हो बड़ी कंपनियों और खास कर एक-थाली-के-चट्टे-बट्टे पूँजीपतियों से खराब-ऋण वसूलने की पूरी छूट मिले।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

कानूनी स्पष्टीकरणः उपर्युक्त प्रस्तुत विचार लेखक के अपने हैं। आलेख में प्रयुक्त आँकड़े और चार्ट उपलब्ध सूचनाओं से लिए गये हैं और ये किसी संवैधानिक प्राधिकरण (अथारिटी) द्वारा प्रमाणित नहीं हैं। लेखक और इक्विटीमास्टर इनकी शुद्धता का न तो दावा करते हैं, न ही इनको स्वीकार करते हैं। व्यक्त विचार केवल एक मत भर हैं। ये पाठकों के लिए कोई दिशा-निर्देश या अनुशंसा नहीं हैं। वेबसाइट के उपयोग के विस्तृत नियम-शर्तें पढ़ें।

Comments