सरकारी बैंकों का खराब-ऋण हुआ बेलगाम ?

भारतीय रिजर्व बैंक दो साल में एक बार वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट (एफएसआर) जारी करता है। इस सिलसिले में जून-2017 के लिए एफएसआर अभी पिछले सप्ताह जारी किया गया।

कुछ साल पहले तक रिजर्व बैंक द्वारा सालाना प्रकाशित दस्तावेजों में एफएसआर एक ऐसा दस्तावेज हुआ करता था, जिसका उपयोग केवल गंभीर किस्म के संवाददाता और विश्लेषक किया करते थे। समय बीतने के साथ, जैसे-जैसे बैंकों के खराब-ऋणों की समस्या गहराती गयी, एफएसआर का महत्व बढ़ता गया है। अब इसका उपयोग पहले से अधिक लोगों द्वारा किया जाने लगा है। क्योंकि रिजर्व बैंक एफएसआर में बैंकों के खराब-ऋणों की ताजातरीन जानकारी देता है। रिजर्व बैंक की नवीनतम रिपोर्ट कैसी है ? सिर्फ इतना ही कहा जा सकता है कि बहुत अच्छा तो नहीं है।

मार्च 2017 तक बैंकों के खराब-ऋणों का अनुपात 9.6% था। इसका मतलब यह है कि बैंकों द्वारा प्रदत्त हर 100 रुपये में कर्जदारों ने 9.6 रुपये नहीं लौटाये।

[ खराब-ऋणः वह ऋण खराब-ऋण कहलाता है, जब कर्जदार 90 या इससे अधिक दिन तक भुगतान नहीं करता है।]

इसकी तुलना में सितंबर 2016 में खराब-ऋणों का अनुपात 9.2% था। मात्र छह माह में अनुपात में 40 बेसिस पॉइंट का इजाफा हो गया है।

[ एक बेसिस पॉइंट एक प्रतिशत का सौवाँ हिस्सा होता है।]

गौरतलब है कि बैंकों द्वारा दिये गये ऋण का लगभग 1/10 हिस्सा खराब-ऋण की श्रेणी में जा चुका है, ऐसे में यह कहना उचित होगा कि कुल मिलाकर भारतीय बैंकों की हालत बड़ी नाजुक है। सरकारी बैंकों की स्थिति पर नजर डालें तो तस्वीर और धुँधली नजर आने लगती है।

चित्र-1 पर एक नजर डालते हैं। पट्टी का नीला भाग विगत वर्षों के खराब-ऋणों के अनुपात को दर्शाता है। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का अनुपात लगभग 12.5 % प्रदर्शित है ( मुझे आश्चर्य होता है कि रिजर्व बैंक ने ठीक-ठीक आँकड़ा क्यों नहीं दिया है)। यह मार्च 2016 में उछलकर लगभग 10% पर पहुँच गया । 30 सितंबर , 2016 को यह 11.8% पर था।

चित्र-1 : सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का खराब-ऋण

बैंकों द्वारा उद्योग-क्षेत्र को वितरित ऋणों पर नजर डालते हैं, तो हालात और खराब होने का पता चलता है। चित्र-2 पर नजर डालें। बायाँ भाग उद्योग क्षेत्र को दिये गये खराब-ऋणों के अनुपात को दर्शाता हैः-

चित्र-2: उद्योगों को दिये गये ऋणों में खराब-ऋण

31 मार्च, 2017 तक सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंकों द्वारा उद्योग जगत को दिये गये ऋण में खराब-ऋणों का अनुपात 22.3% था। इसका कुल मतलब यही हुआ कि सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंकों द्वारा उद्योग जगत को दिये गये हर 100 रुपये के ऋण में 22.3 रुपया खराब-ऋण साबित हुआ है। इसकी तुलना में निजी बैंकों का खराब-ऋण मात्र 6.6 % रहा है। विदेशी बैंकों का प्रतिशत 6.1% रहा।

31 मार्च 2017 तक बैंकों द्वारा प्रदत्त कुल बकाया ऋण में औद्योगिक-ऋण की हिस्सेदारी लगभग 38% थी। जहाँ तक इस मामले में सार्वजनिक-क्षेत्र के बैंकों का हाल है, तो 31 मार्च, 2016 तक कुल बकाया-ऋण लगभग 15% थी। तब से इसमें नाटकीय रूप से 700 बेसिस पॉइंट से अधिक की वृद्धि हुई है।

सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के खराब-ऋण में इस भारी-भरकम ऋण वृद्धि की संभावित वजह यही हो सकती है कि खराब-ऋणों की मौजूदगी तो पहले-से ही थी, लेकिन अब जाकर बैंकों ने इसकी मौजूदगी को स्वीकारा है। यह एक अच्छी बात कही जा सकती है। लेकिन परेशानी की बात यह है कि खराब-ऋणों का यह सिलसिला कहाँ जाकर खत्म होनेवाला है, किसी को नहीं पता।

जून, 2016 की ‘वित्तीय स्थिरता रिपोर्ट’ में भारतीय रिजर्व बैंक ने लिखा हैः “मूल परिदृश्य में कुल खराब-ऋण मार्च 2016 के 7.6% से बढ़ कर मार्च 2017 में 8.5% तक हो सकता है। यदि भविष्य में व्यापक आर्थिक हालात में गिरावट आती है, तो मार्च 2017 तक 9.3% तक बढ़ सकता है।“ वास्तविक आँकड़ा 9.6% सामने आया।

यह भी गौर करने वाली बात है कि खराब-ऋण के गड़बड़झाले के लिए बड़े कर्जदार सबसे अधिक जिम्मेदार हैं।

[ भारतीय रिजर्व बैंक के अनुसार 5 करोड़ रुपये या उससे अधिक उधार लेने वाले बड़े कर्जदार की श्रेणी में आते हैं।]

कुल उधारी में बड़े कर्जदारों की हिस्सेदारी 56% और खराब-ऋण में 86.5% होती है। चित्र-5 से यह स्पष्ट हो जाता है।

चित्र-3:

शीर्ष के 100 सबसे बड़े कर्जदारों की कुल वितरित ऋण में हिस्सेदारी 15.2% और खराब-ऋण में 25.6% है। विभिन्न कारणों से सालों से बैंक इन ऋणों की वसूली करने में विफल साबित हुए हैं। आशा की जा रही है कि आने वाले सालों में बैंकों का प्रदर्शन अच्छा रहेगा। अभी तक हमें इस समस्या का समाधान होता नजर नहीं आया है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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