सिर्फ ब्याज-दर नहीं, आवास की कीमत कम हो तो बात बने

देश की अग्रणी हाउसिंग फाइनेंस कंपनी एचडीएफसी के चेयरमैन केकी मिस्त्री ने हाल ही में देश के प्रमुख आर्थिक समाचार पत्र The Economic Times को बतायाः “ मेरे विचार में प्रॉपर्टी खरीदने का यह सबसे बढ़िया समय है। सर्वप्रथम, इसलिए कि ब्याज दर काफी कम है। वर्ष 2008 के बाद से ब्याज दरों में इतनी कमी नहीं देखी गयी। मेरा मानना है कि ब्याज दरें अब इससे नीचे नहीं जायेंगी। दूसरी बात, इधर प्रॉपर्टी की कीमतों में वृद्धि नहीं दर्ज की गयी है, इनमें ठहराव देखने को मिला है। ”

मिस्त्री से आवास खरीदने के सही समय के बारे में पूछना वैसा ही है, जैसे नंदन नीलकेणी से ‘आधार’ को लेकर निजता की चिंताओं के बारे में या फिर रिजर्व बैंक के गवर्नर उर्जित पटेल से नोटबंदी की सफलता के बारे में पूछना।

उक्त तीनों मामलों में जवाब निश्चित तौर पर ‘हाँ’ होगा। मिस्त्री आवास ऋण देने के कारोबार में हैं। उनके लिए आवास-ऋण देने का काम करना ही अच्छा रहेगा। वे इस बात का खयाल रखें कि दिया गया ऋण सुरक्षित रहे और ऋण, आवास की कीमत का एक निश्चित भाग हो।

मिस्त्री ने अपने कार्य-क्षेत्र से बाहर निकलकर बात की है, फिर भी उन्होंने जो कहा है उसके वास्तविक अर्थ को समझने की जरूरत हैः वे पहली बात यह कह रहे हैं कि ब्याज दरें कम हैं और इनके और-नीचे जाने की संभावना नहीं है। हो सकता है मिस्त्री सही कह रहे हों। ब्याज दरें इसलिए कम हैं; क्योंकि नोटबंदी के बाद ढेर सारा पैसा बैंकों में जमा हो गया है। मिस्त्री आगे कहते हैं कि इधर आवास की कीमतों में वृद्धि नहीं हुई है और कीमतों में ठहराव देखने को मिला है। इसलिए प्रॉपर्टी खरीदने का यह सही समय है।

मिस्त्री जब कहते हैं कि कीमतों में ठहराव हुआ है , तो इसका मतलब क्या है ? समझने की कोशिश करें – माना कि कुछ साल पहले किसी महानगर के उपनगर में एक आवास 50 लाख रुपये में बिक रहा था। आज भी उसकी कीमत उतनी ही है। इस बीच बाकी दूसरी चीजों की कीमतें बढ़ी हैं। यहाँ पर अगर हम इस महँगाई को ध्यान में लायें, तो कहेंगे कि आवास को कीमतों में ठहराव हुआ है यानी कीमतें गिरी हैं। क्यों कि 50 लाख रुपये की क्रय क्षमता जो आज है, उतनी ही नहीं है, जितनी की 50 लाख रुपये की कुछ साल पहले थी।

कीमतों में इस ठहराव को देखते हुए खरीदारों को ज्यादा इंतजार नहीं करना चाहिए और आवास खरीद लेना चाहिए। मूलरूप से मिस्त्री यही बात कहना चाहते हैं।

लेकिन परेशानी की बात ये है कि इसके कोई मायने नहीं हैं। क्योंकि ऐसे मामलों में हमेशा कई बारीक चीजों की अपनी भूमिका होती है। सर्वप्रथम, सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि देश के अधिकतर हिस्सों में आवास-खरीदी का एक हिस्सा काले धन में होता है, जिसका भुगतान करना होता है। यह बताना मुश्किल है कि काले धन की हिस्सेदारी कितनी होती है, क्योंकि देश भर में प्रॉपर्टी की दरें अलग-अलग होती हैं। एक अंदाजा लगायें तो किसी आवास का लगभग 20 प्रतिशत भुगतान काले धन में होता है। इस तरह 10 लाख रुपये ( 50 लाख रुपये का 20 प्रतिशत) हुआ।

इस प्रकार पाते हैं कि आवास की अधिकृत कीमत 40 लाख रुपये ( 50 लाख रुपये में से 10 लाख घटा दें) बैठती है। एचडीएफसी जैसी हाउसिंग फाइनेंस संस्थान आवास की पूरी कीमत के लिए पैसा नहीं मुहैया कराती हैं। एचडीएफसी का औसत ऋण और आवास कीमत का अनुपात 64 प्रतिशत है। इसका मतलब कि मौजूदा मामले में एचडीएफसी कुल 25.6 लाख रुपये ( 40 लाख रुपये का 64 %) का ऋण देगा। इस तरह यह राशि मोटे तौर पर एचडीएफसी की औसत होम लोन की राशि 25.7 लाख रुपये के बराबर है।

कहने का मतलब यह हुआ कि आवास की कीमत 50 लाख रुपये है, तो एचडीएफसी लगभग 25.6 लाख रुपये का ऋण उपलब्धल करायेगी। खरीदार को बाकी 24.6 लाख रुपये खुद जुटाने होंगे। यानी उसको आधी रकम अपने पास से देनी होगी। इसी समीकरण को उसे ध्यान में रखना है।

इस तरह कहा जा सकता है कि यदि एक खरीदार की जेब में 25 लाख रुपये पहले से ही है, तो वह 50 लाख रुपये का आवास खरीद सकता है। बात दरअसल यही है कि अगर खरीदार के पास अपना खुद का पैसा नहीं है, तो वह आवास नहीं खरीद सकता है। ऐसे में अगर होम लोन पर ब्याज दर कम है तो क्या हुआ- वह नहीं खरीद सकता। ऐसे में जिस कम ब्याज दर की बात मिस्त्री कर रहे थे, उसका क्या हुआ ? 25.6 लाख रुपये के होम लोन पर 20 साल की अवधि के लिए 10 प्रतिशत की सालाना दर से ईएमआइ 24, 801 रुपये होगी। कुछ साल पहले नये आवास पर यह स्थिति होती। अब 8.4 प्रतिशत की दर से ईएमआइ 22,303 रुपये माह यानी लगभग 10 प्रतिशत कम।

इस प्रकार, कमतर ईएमआइ जरूर राहत देती है। लेकिन मूल सवाल तो वही-का-वही हैः संभावित खरीदार के पास लगभग 25 लाख रुपये की बचत है या नहीं। यदि ब्रोकरेज, स्थानांतरण, आवास में पर्याप्त सुविधाओं आदि की लागत को भी हिसाब में लायें, तो जेब में और रकम होनी चाहिए। लेकिन हिसाब-किताब की सुविधा के लिए बाकी चीजों को बाहर रखते हैं और सिर्फ आवास की कीमत पर ध्यान केंद्रित करते हैं।

इस परिदृश्य की तुलना उससे करें, जहाँ पर पिछले कुछ सालों में आवास की कीमत 20 प्रतिशत गिरकर इस समय 40 लाख रुपये पर आ गयी है। अगर काले धन की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत मानें, तो आवास की अधिकृत कीमत 32 लाख रुपये बैठती है। एचडीएफसी लगभग 20.5 लाख रुपये ( 32 लाख रुपये का 64 प्रतिशत) का लोन देगी। इस प्रकार खरीदार को सौदे को सफल बनाने के लिए लगभग 20 लाख रुपये की जरूरत होगी।

मतलब यह है कि अगर किसी के पास वर्तमान में अपना खुद का लगभग 20 लाख रुपया है, तो वह आवास खरीद सकता है। पहले के मुकाबले उसे 5 लाख रुपये कम रकम की जरूरत होगी। ऐसी स्थिति में पहले की तुलना में आवास खरीदी की संभावना अधिक है।

मैं पूर्व में अक्सर कहता रहा हूँ, और फिर कह रहा हूँ कि लोग आवास फिर से खरीदना तभी शुरू करेंगे , जब आवास की कीमतें कम होंगी। सिर्फ होम लोन पर ब्याज की दरें कम होना ही काफी नहीं है। इसके कोई मायने नहीं हैं। मिस्त्री को यह बात ध्यान में रखनी चाहिए।

आखिर में, यह कहना ठीक रहेगा कि अगर किसी आवास की कीमत का 20 प्रतिशत काले धन के रूप में भुगतान किया जाना है, तो एक खरीदार की जेब में आवास की कीमत की आधी रकम होनी चाहिए-तभी वह आवास खरीद सकता है।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल , ‘द विवेक कौल् ’स डायरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक हैं। विवेक मार्च 2015 में प्रकाशित Easy Money: The Greatest Ponzi Scheme Ever and How It Is Set to Destroy the Global Financial System नामक पुस्तक-त्रयी (ट्रिलॉजी) के लेखक हैं। उनकी ये पुस्तकें ई-कॉमर्स वेबसाइट ऐमज़ान पर बेस्टसेलर रह चुकी हैं। विवेक की नवीनतम किताब India’s Big Government - The Intrusive State and How It is Hurting Us है।

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