उप्र में कृषि-ऋण माफी नेक विचार तो नहीं, फिर भी ....


उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनावों को ध्यान में रखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने राज्य के छोटे और सीमांत किसानों द्वारा उठाए गए फसल-ऋणों को माफ कर देने का वादा किया था। ( अब राज्य की योगी आदित्यनाथ सरकार ने पूरा भी कर दिया है।) राजनीतिक दलों द्वारा फसल-ऋणों को माफ करन देने के वादे करना कोई नयी बात नहीं है।

वर्ष 2009 के लोकसभा चुनाव के पूर्व कांग्रेस के नेतृत्व वाले संयुक्त प्रगतिशील गठबंधन(यूपीए) ने भी ऐसा ही वादा किया था।

हमेशा की तरह, यही सवाल उठता है कि फसल-ऋणों को माफ करने की लागत कितनी होगी और इसके लिए पैसा कहाँ से आयेगा ?

भारतीय स्टेट बैंक के एक रिसर्च पेपर के अनुसार फसल-ऋणों की माफी से सरकारी खजाने को लगभग 27 हजार 419.7 करोड़ रुपये की चपत लग सकती है। बैंक इस आँकड़े पर कैसे पहुँचा ? फिलहाल बैंकों ने उत्तर प्रदेश में कुल 86 हजार 241 करोड़ रुपये का कृषि-ऋण दिया हुआ है।

भारतीय स्टेट बैंक की रिपोर्ट में लिखा हैः “* रिजर्व बैंक के आँकड़ों ( 2012) के अनुसार प्रत्यक्ष कृषि वित्त का 31 % पैसा सीमांत और छोटे किसानों ( 2.5 एकड़ तक की जोत ) को कर्ज रूप में दिया गया। अगर इसके आधार पर उत्तर प्रदेश में किसानों को दिये गये कृषि-ऋण को माफ किया जाता है; तो अनुसूचित बैंकों,सहकारी बैंकों और प्राथमिक कृषि सहकारी सोसाइटियों द्वारा वितरित लगभग 27 हजार 419.70 करोड़ रुपये माफ करना होगा*।“

जिन बैंकों ने ये कर्ज दिये हैं उनको फसल-ऋण की माफी के लिए सरकार द्वारा क्षतिपूर्ति की जायेगी। केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह 17 मार्च को ट्विट के माध्यम से एकदम साफ कर दिया कि कर्ज की माफी केंद्र सरकार नहीं करेगी। लेकिन अगर कोई राज्य सरकार कर्ज माफी का भार अपने खजाने पर डालती है, तो उसका स्वागत किया जाना चाहिए। इसका मतलब कि अगर किसानों का कर्ज माफ किया जाता है, तो उत्तर प्रदेश सरकार को उसका भार उठाना पड़ेगा।

तालिका-1 देखें। इसमें उत्तर प्रदेश सरकार के पिछले वर्षों का वित्तीय घाटा प्रदर्शित किया गया है।

[ वित्तीय घाटा – जब किसी सरकार की आय, उसके व्यय से कम होती है, तो कहा कहा जाता है कि सरकार वित्तीय घाटे में है। इसकी भरपायी उधार लेकर की जाती है। ]

तालिका-1 से पता चलता है कि राज्य का वित्तीय घाटा विगत सालों में इसके सकल घरेलू उत्पाद की तुलना में ज्यादा तेजी से बढ़ा है। वर्ष 2011-2012 और 2015-2016 की अवधि में राज्य की जीडीपी में जहाँ 59.3 प्रतिशत का उछाल दर्ज हुआ, वहीं वित्तीय घाटा कहीं अधिक तेजी से राज्य के जीडीपी के 2.13 प्रतिशत से बढ़ कर 5.57 प्रतिशत हो गया।

तालिका 1:
Year Gross Fiscal Deficit State GDP at current prices (in Rs crore) Fiscal Deficit as a percentage of GDP
2016-2017* 49,961 12,36,655^^ 4.04%^
2015-2016** 64,317 11,53,795 5.57%
2014-2015 32,513 10,43,371 3.12%
2013-2014 23,680 9,44146 2.51%
2012-2013 19,240 8,22,903 2.34%
2011-2012 15,430 7,24,049 2.13%

budget estimate
*
revised estimate
Source: /or GSDP, the RBI's Database on Indian Economy.
For deficit, budget.up.nic.in and RBI Reports on State Finances
^Source: www.business-standard.com
^^ Calculated on the basis of 4.04 per cent and Rs 49,961 crore fiscal deficit estimates.

चालू वित्तीय वर्ष ( 2016-2017) में राज्य सरकार का वित्तीय घाटा राज्य जीडीपी का 4.04 प्रतिशत रहने का अनुमान है। कोरे आँकड़ों में इसके 49 हजार 961 करोड़ रुपये होने का अंदेशा जताया गया है। अगर उत्तर प्रदेश सरकार फसल-ऋण की माफी चालू वित्तीय वर्ष में लागू करती है, तो कोरे आँकड़ों में वित्तीय घाटा 77 हजार 381 करोड़ रुपया हो जायेगा ( 49,961 करोड़ रुपये और माफ किया गया ऋण- 27, 420 करोड़ रुपये)। यह उस दशा में होगा अगर हम यह मान कर चलें कि व्यय और राजस्व की आय वर्ष की शुरुआत में किये गये अनुमान के अनुसार रहती है। इस तरह वित्तीय घाटा कुल सकल घरेलू उत्पाद का 6.26 प्रतिशत बैठता है, जो कि सचमुच में बहुत अधिक है।

इस तरह सवाल उठता है कि क्या उत्तर प्रदेश सरकार इस आर्थिक दबाव को झेल सकती है ? स्पष्ट है, जबाव नहीं है। क्या नयी दिल्ली में केंद्र सरकार इसका खर्च वहन कर सकती है ? जवाब है- हाँ । केंद्र सरकार के लिए 27 हजार 420 करोड़ रुपये की रकम अधिक नहीं है।

लेकिन यदि केंद्र सरकार उत्तर प्रदेश सरकार की कर्जमाफी का खर्च वहन करने का फैसला करती है, तो दूसरे राज्य भी माँग कर सकते हैं, कि उनके द्वारा अपने किसानों की कर्ज माफियों का भार केंद्र सरकार उठाये। चूँकि देश के अधिकतर राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं, तो केंद्र में सत्तासीन भाजपा के लिए इन माँगों को इनकार करना बहुत मुश्किल होगा।

एक तरफ जहाँ केंद्र सरकार द्वारा अपने राज्य सरकार की कर्जमाफी का खर्च वहन करने की बात आती है, वहीं पर दूसरी तरफ नैतिकता का सवाल भी खड़ा होता है। अर्थशास्त्री एलन ब्लाइंडर अपनी किताब After the music stopped में लिखते हैं, “नैतिकता की बात तो तभी आती है, जब इसके खोने का खतरा हो। लेकिन जो इससे बिलकुल सुरक्षित हैं, तो उनको किसी बात का डर नहीं होता और वे खर्च वहन करने की स्थिति में होते हैं। "

‘सौ बात की एक बात’ यह है कि एक बार किसान को जब यह बात समझ में आ जाती है कि किस तरह उसका कर्ज माफ हो जाता है, तो फिर भविष्य में चुनाव को ध्यान में रखते हुए नया कर्ज ले लेता है, यह सोचते हुए कि सरकार उसको फिर माफ कर देगी। सारांश यह है कि किसान को कर्ज का भुगतान करने के लिए कोई प्रोत्साहन नहीं नजर आता है।

भारतीय स्टेट बैंक की चेयरपर्सन अरुंधती राय ने इसी सिलसिले में हाल ही में कहा : ”हमारा मानना है कि (फसल) ऋण माफी के कारण हमेशा कर्ज लेन-देन संबंधी साख अनुशासन भंग होता है। क्योंकि जिन लोगों का कर्ज माफ हो जाता है, वे भविष्य में भी माफी की उम्मीद करने लगते हैं। इसलिए भविष्य में दिये गये कर्ज का भी भुगतान नहीं किया जाता है....कर्ज का पैसा बैंकों को मिल जाता है, क्योंकि सरकार उनका भुगतान कर देती है। लेकिन हम जब दोबारा कर्ज देते हैं, तो किसान अगले चुनाव का इंतजार करते हैं कि उनका कर्ज माफ कर दिया जायेगा।“

इन चीजों के काफी मायने हैं। हम ऐसे समय में रह रहे हैं, जहाँ आसानी से बात का बतंगड़ बना दिया जाता है। आप पलट कर हमसे सवाल कर सकते हैं : “उन बैंकों के बारे में क्या कहेंगे; जिन्होंने बड़ी कंपनियों के लाखों करोड़ रुपये माफ कर दिये। यदि वे कार्पोरेट का लोन माफ कर सकते हैं, तो किसानों के 27 हजार 420 करोड़ रुपये क्यों नहीं ?”

यह बहुत बढ़िया सवाल है, जिसका सचमुच में मेरे पास कोई सीधा जवाब नहीं है। ऐसे हालात में प्यारे पाठकों मैं आपको जार्ज आरवेल को पढ़ने का सुझाव दूँगा। उनकी अपनी किताब Animal Farm में प्रसिद्ध पंक्ति है : “सभी जानवर समान हैं, लेकिन कुछ जानवर, बाकियों से अधिक समान है।“ गौर करनेवाली बात यहाँ यह है कि किसानों के सामने नैतिकता का सवाल है- कार्पोरेट के लिए भी है। बात को यहीं पर खत्म करते हैं।

यह आलेख मूल रूप से यहाँ पर (अंग्रेजी में ) प्रकाशित हुआ है।

विवेक कौल, ‘द विवेक कौल’स डॉयरी’ और ‘द विवेक कौल लेटर’ के संपादक है। विवेक कौल एक लेखक हैं । वे पूर्व में ‘डेली न्यूज एंड अनैलिसिस’ (डीएनए) और ‘द इकोनॉमिक्स टॉइम्स’ में वरिष्ठ पदों पर काम कर चुके हैं। वे ‘द इजी मनी ट्रिलॉजी’ के लेखक हैं। ट्रिलॉजी की नवीनतम किताब ‘इजी मनीः द ग्रेटेस्ट पोंजी स्कीम एवर एंड हाउ इट इज सेट टू डिस्ट्रॉय द ग्लोबल फाइनेंशियल सिस्टम’ मार्च 2015 में प्रकाशित हुई थी। यह किताब एमजॉन की बेस्ट सेलर साबित हुई । विवेक कौल ने ‘द टॉइम्स ऑफ इंडिया’, ‘द हिंदू’, ‘द हिंदू बिजनेस लाइन’, ‘बिजनेस वर्ल्ड’, ‘बिजनेस टुडे’, ‘इंडिया टुडे’, ‘बिजनेस स्टैण्डर्ड’, ‘फोर्ब्स इंडिया’, ‘डेक्कन क्रॉनिकल’, ‘द एशियन एज’, ‘म्युचुअल फण्ड इंनसाइट’, ‘वेल्द इनसाइट’, ‘स्वराज्य’, ‘बंगलौर मिरर’ और अन्य के लिए भी लिखा है।

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